परमेश्वर क्या है? (चार्ल्स स्पर्जन प्रश्नोत्तरी-4)

4. परमेश्वर क्या है?

उत्तर: परमेश्वर आत्मा है  (यूहन्ना 4:24), जो कि अपने अस्तित्व (निर्गमन 3:14), बुद्धि, सामर्थ (भजन सहिंता 147:5) , पवित्रता  (प्रकाशितवाक्य 4:8), न्याय, भलाई और सच्चाई (निर्गमन 34:6-7) में अनंत (अय्यूब 11:7), अनादि, अमर (भजन 90:2; 1 तीमुथियुस 1:17), और अपरिवर्तनशील (याकूब1:17)  है।

साक्षी आयतें:

परमेश्‍वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसकी आराधना करनेवाले आत्मा और सच्‍चाई से आराधना करें। (यूहन्ना 4:24)

परमेश्‍वर ने मूसा से कहा, “मैं जो हूँ सो हूँ।” फिर उसने कहा, “तू इस्राएलियों से यह कहना, ‘जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है’।” (निर्गमन 3:14)

हमारा प्रभु महान् और अति सामर्थी है;

उसकी बुद्धि अपरम्पार है। (भजन 147:5)

 चारों प्राणियों के छ: छ: पंख हैं, और चारों ओर और भीतर आँखें ही आँखें हैं; और वे रात दिन बिना विश्राम लिये यह कहते रहते हैं,

पवित्र, पवित्र, पवित्र प्रभु परमेश्‍वर,

सर्वशक्‍तिमान,

जो था और जो है और जो आनेवाला

है।” (प्रकाशितवाक्य 4:8)

 यहोवा उसके सामने होकर यों प्रचार करता हुआ चला, “यहोवा, यहोवा, ईश्‍वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करुणामय और सत्य, हज़ारों पीढ़ियों तक निरन्तर करुणा करनेवाला, अधर्म और अपराध और पाप का क्षमा करनेवाला है, परन्तु दोषी को वह किसी प्रकार निर्दोष ठहराएगा; वह पितरों के अधर्म का दण्ड उनके बेटों वरन् पोतों और परपोतों को भी देनेवाला है।” (निर्गमन 34:6-7)

 क्या तू परमेश्‍वर का गूढ़ भेद पा सकता है?

क्या तू सर्वशक्‍तिमान का मर्म पूरी रीति से

जाँच सकता है?” (अय्यूब 11:7)

 इससे पहले कि पहाड़ उत्पन्न हुए,

या तू ने पृथ्वी और जगत की रचना की,

वरन् अनादिकाल से अनन्तकाल तक

तू ही परमेश्‍वर है। (भजन 90:2)

 अब सनातन राजा अर्थात् अविनाशी, अनदेखे, एकमात्र परमेश्वर का आदर और महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।  ( 1 तीमुथियुस 1:17)

क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।   (याकूब 1:17) 

व्याख्या: 

“परमेश्वर क्या है?” प्रश्न का उत्तर हम परमेश्वर के गुणों के बारे में चर्चा करके देंगे, क्योंकि परमेश्वर स्वयं अपने गुण है। कहने का अर्थ है कि परमेश्वर का हर गुण अनंत है और उन गुणों का अध्ययन करके हम जान जायेंगे कि परमेश्वर क्या है।

परमेश्‍वर आत्मा है।

मनुष्यों का सबसे बड़ा पाप यह हैं कि उन्होंने अपनी समानता और स्वरुप में अपने लिए बहुतेरे ईश्वर गढ़ लिए। परमेश्वर मनुष्यों सा नहीं है। परमेश्वर के हमारे सामान शरीर नहीं होता। नाहीं उसके हमारे समान भावनाएं होती हैं। परमेश्वर हमारे समान समय, स्थान और पदार्थ के द्वारा बंधा हुआ नहीं है। वह तो आत्मा है।

परमेश्‍वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसकी आराधना करनेवाले आत्मा और सच्‍चाई से आराधना करें। (यूहन्ना 4:24)

 

परमेश्वर अस्तित्व में अनंत, अनादि, अमर है।

इससे पहले कि पहाड़ उत्पन्न हुए,

या तू ने पृथ्वी और जगत की रचना की,

वरन् अनादिकाल से अनन्तकाल तक

तू ही परमेश्‍वर है। (भजन 90:2)

अब सनातन राजा अर्थात् अविनाशी, अनदेखे, एकमात्र परमेश्‍वर का आदर और महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।  ( 1 तीमुथियुस 1:17)

परमेश्वर अनंत आत्मा हैं। उसकी कोई शुरुआत नहीं और उसका कोई अंत नहीं। वो अनादि काल से अनंत काल तक परमेश्वर है। परमेश्वर ने मूसा को अपना नाम बताया- “मैं हूँ वो हूँ।” इस नाम का अर्थ है कि परमेश्वर अनादि काल से अनंत काल तक अपने आप से अस्तित्व में रहता है। उसे किसी कि जरुरत नहीं है।

परमेश्‍वर ने मूसा से कहा, “मैं जो हूँ सो हूँ।” फिर उसने कहा, “तू इस्राएलियों से यह कहना, ‘जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है’।” (निर्गमन 3:14)

ये परमेश्वर अनंत और अगम हैं और उसके बनाए हर प्राणी के और उसके बीच में अनंत दूरी है। तथापि मनुष्य परमेश्वर को उसके आत्मा के द्वारा मिलने वाले प्रकाश में एक सीमा तक जान सकता है।

क्या तू परमेश्‍वर का गूढ़ भेद पा सकता है?

क्या तू सर्वशक्‍तिमान का मर्म पूरी रीति से

जाँच सकता है?” (अय्यूब 11:7)

परमेश्वर बुद्धि और सामर्थ  में अनंत है। 

परमेश्वर अनंत सामर्थी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सब कुछ कर सकता है। वो पाप नहीं कर सकता। वो किसी को पाप करने का प्रलोभन नहीं दे सकता। वो अन्याय नहीं कर सकता। वो सिर्फ वही सब कुछ कर सकता है जो उसके अनंत पवित्र स्वाभाव के अनुरूप है।

प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है, जो सर्वशक्‍तिमान है (प्रकाशितवाक्य 1:8)

परमेश्वर की बुद्धि अनंत है। वो कभी कोई गलती नहीं कर सकता। वो कभी नहीं पछता सकता। उसने सब चीज़ों को अपनी असीम बुद्धि में अपनी महिमा के लिए बनाया है। उसने स्वर्गदूतों और मनुष्य के पतन का और उनके पापों की, नरक की, यीशु मसीह के द्वारा उद्धार की जो योजना बनाई- उसके पीछे उसका अनंत पवित्र और अनंत बुद्धिमान उद्देश्य है।

हमारा प्रभु महान् और अति सामर्थी है;

उसकी बुद्धि अपरम्पार है। (भजन 147:5)

 

परमेश्वर पवित्रता में अनंत है।

बाइबल बहुत चीज़ों को पवित्र कहती है। स्वर्गदूतों को, संतों को, परमेश्वर के मंदिर में इस्तेमाल आने वाली चीज़ों को। परन्तु परमेश्वर की जो पवित्रता है वो ऐसी पवित्रता है कि सिर्फ उसी को पवित्र कहा जा सकता है। वह अपने जैसा एक ही है। उसके जैसा कोई नहीं। वो एक मात्र अनादि अनंत परमेश्वर है जो अपने आप से ही अस्तित्व में है, जिसे किसी की जरुरत नहीं, जो परम धन्य और अगम ज्योति में रहने वाला अनंत अच्छा परमेश्वर है।

यहोवा के तुल्य कोई पवित्र नहीं,
क्योंकि तुझ को छोड़ और कोई है ही नहीं;
और हमारे परमेश्‍वर के समान कोई
चट्टान नहीं है। (1 शमूएल 2:2)

चारों प्राणियों के छ: छ: पंख हैं, और चारों ओर और भीतर आँखें ही आँखें हैं; और वे रात दिन बिना विश्राम लिये यह कहते रहते हैं,
“पवित्र, पवित्र, पवित्र प्रभु परमेश्‍वर,
सर्वशक्‍तिमान,
जो था और जो है और जो आनेवाला
है।” (प्रकाशितवाक्य 4:8)

परमेश्वर न्याय, भलाई और सच्चाई में अनंत है।

परमेश्वर सच्चा है। वो स्वयं ही सत्य है। चूँकि परमेश्वर अनंत है, उसका सत्य भी अनंत है। उसकी सच्चाई की शुरुआत नहीं और अंत भी नहीं है। सब सत्य का सौता वही है। उसने कभी किसी को झूठ नहीं बोला; ना ही बोल सकता है।

ईश्‍वर मनुष्य नहीं कि झूठ बोले, और
न वह आदमी है कि अपनी इच्छा बदले।
क्या जो कुछ उसने कहा उसे न करे?
क्या वह वचन देकर उसे पूरा न करे? ( गिनती 23:19)

परमेश्वर भला है, अच्छा है। जैसे ज्योति कभी अँधेरा नहीं कर सकती वैसे ही परमेश्वर कभी किसी के साथ बुरा नहीं कर सकता। वो सब के साथ वही करता है जो अच्छा, भला और न्यायोचित है। उसकी भलाई का अर्थ यह भी है कि वह अनंत उदार है और अपने सब प्राणियों को विशेष करके अपने चुने हुओं को दया दिखाता है और उनको अनगिनत आशीषें देता है।

यहोवा सभों के लिये भला है,
और उसकी दया उसकी
सारी सृष्‍टि पर है। (भजन संहिता 145:9)

क्योंकि यहोवा भला है, उसकी करुणा
सदा के लिये,
और उसकी सच्‍चाई पीढ़ी से पीढ़ी तक
बनी रहती है। (भजन संहिता 100:5)

यहोवा का धन्यवाद करो,
क्योंकि वह भला है;
और उसकी करुणा सदा की है! (भजन संहिता 107:1)

परमेश्वर कि भलाई और अच्छाई ऐसी है कि सिर्फ वही भला कहला सकता है। उसकी भलाई अनंत और अद्वितीय है।

यीशु ने उससे कहा, “तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? कोई उत्तम नहीं, केवल एक, अर्थात् परमेश्‍वर। (लूका 18:19)

परमेश्वर अनंत न्यायी है। उसके सिंहासन का मूल न्याय और धार्मिकता है।

तेरे सिंहासन का मूल, धर्म और न्याय है;
करुणा और सच्‍चाई तेरे आगे आगे
चलती है। (भजन संहिता 89:14)

अनंत काल का नरक उसके अनंत न्याय का स्मारक है। पर उससे भी ज्यादा गहराई से उसका न्याय के प्रति प्रेम हम क्रूस पर देखते हैं वह न्याय से इतना प्रेम करता है कि वो बिना अपने बेटे कि कुर्बानी के किसी के पाप क्षमा नहीं कर सकता। क्रूस पर धार्मिकता और दया ने चुम्बन किया।

करुणा और सच्‍चाई आपस में मिल गई हैं;
धर्म और मेल ने आपस में चुम्बन किया है। (भजन संहिता 85:10)

 

परमेश्वर अपरिवर्तनशील है।

परमेश्वर कभी परिवर्तित नहीं सकता। परिवर्तन समय के भीतर होता है कि कोई पिछले पल ऐसा था और अब ऐसा हो गया। परमेश्वर तो समय की सीमा से परे है। वो कैसे परिवर्तित होगा ? परिवर्तन सृष्टि में होता है, परमेश्वर तो सृष्टि से परे है। परिवर्तन में या तो कोई बेहतर बन जाता है या बद्दतर। परमेश्वर बुरा हो नहीं सकता और और उसकी भलाई तो अनंत है। वो कैसे परिवर्तित होगा ? परिवर्तन तो भावनाओं में होता है जैसे ख़ुशी से दुःख और दुःख से ख़ुशी। लेकिन परमेश्वर के तो भावनाएं होती ही नहीं है, वो कैसे परिवर्तित होगा ? वो अनादि काल से अनंत काल तक परम धन्य और परम सुखी है।

निम्नलिखित आयत स्पष्ट रूप से कहती है कि सृष्टिकार परमेश्वर अपरिवर्तनशील है। सृष्टि में जो कुछ भी होता है उससे परमेश्वर में कोई परिवर्तन नहीं आता।

क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।  (याकूब 1:17)

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