भाग्यविधाता परमेश्वर और जिम्मेदार मनुष्य


भाग्यविधाता परमेश्वर और जिम्मेदार मनुष्य

परमेश्वर कि सम्प्रभुता और मनुष्य कि जिम्मेदारी

[सुसंगतता की शिक्षा (Compatibilism)]

भाग्यविधाता परमेश्वर और जिम्मेदार मनुष्य

परमेश्वर संप्रभु परमेश्वर हैं. परमेश्वर की सम्प्रभुता का अर्थ होता है की इस सृष्टि में जो कुछ भी होता है वो सब उसी की योजना के अनुसार होता है. आदम ने जब वर्जित फल को खाया तो परमेश्वर को कोई आश्चर्य नहीं हुआ. आदम ने जो किया वो परमेश्वर की योजना के बाहर नहीं था, परन्तु आदम पूरी तरह अपने पाप के लिए जिम्मेदार था. आपको विश्वास नहीं होता तो आप आगे पढ़िए:

हे मनुष्य, भला तू कौन है, जो परमेश्वर का सामना करता है? क्या गढ़ी हुई वस्तु गढ़नेवाले से कह सकती है, “तूने मुझे ऐसा क्यों बनाया है?” क्या कुम्हार को मिट्टी पर अधिकार नहीं कि एक ही लोंदे में से, एक बर्तन आदर के लिये और दूसरे को अनादर के लिये बनाए? कि परमेश्वर ने अपना क्रोध दिखाने और अपनी सामर्थ्य प्रगट करने की इच्छा से क्रोध के बरतनों की, जो विनाश के लिये तैयार किए गए थे बड़े धीरज से सही। और दया के बरतनों पर जिन्हें उस ने महिमा के लिये पहिले से तैयार किया, अपने महिमा के धन को प्रगट करने की इच्छा की.  (रोमियों  9:20–23)

इन आयतों में हम पाते हैं कि परमेश्वर ने यह  ब्रम्हांड और मनुष्य अपनी महिमा के लिए बनाए है (रोमियो 11:36) । वह चाहता है  कि उनकी दया और न्याय दोनों के लिए उसकी महिमा हो। वो अपनी दया के लिए महिमा मुठ्ठी भर लोगों को (जिनको उन्होंने संसार की उत्पति से पहले से ही चुन लिया था) बचाने के द्वारा लेता है और न्याय के लिए महिमा पापियों को उनके पाप की वजह से नरक में सजा देकर लेगा.

और भी आयते देखिये:

 “जो (परमेश्वर) अपनी इच्छा के मत के अनुसार सब कुछ करता है.” (इफिसियों  1:11)

परमेशवर की सम्प्रभुता का मतलब है की वह सब कुछ अपनी अनंत और पवित्र बुद्धि में निर्धारित करता है. वह प्रतिक्रिया नहीं करता; वह सब कुछ निर्धारित करता है.

मैं तो अन्त की बात आदि से और प्राचीनकाल से उस बात को बताता आया हूं जो अब तक नहीं हुई। मैं कहता हूं, मेरी योजना  स्थिर रहेगी और मैं अपनी (संप्रभु) इच्छा को पूरी करूंगा।” (यशायाह 46:10)

परमेश्वर ने अंत की बातों की घोषणा शुरुवात से ही कर दी और उसने कहा मेरी योजना स्थिर रहेगी और मैंअपनी संप्रभु इच्छा को पूरी करूँगा. इस आयत का मतलब यह है कि आदम ने जब फल खाया और मनुष्य परमेश्वर कि महिमा से गिरा तब परमेश्वर कि योजना स्थिर थी और उसी कि संप्रभु इच्छा के अनुसार यह हो रहा था.

क्या यह भाग्य-निर्धारण परमेश्वर को हमारे पापों के लिए जिम्मेदार नहीं बना देता?

नहीं, बिल्कुल नहीं! परमेश्वर पवित्र पवित्र पवित्र हैं ( यशा 6:3 ) वह ज्योति है,  उसमे कुछ भी अंधकार नहीं ( 1 यूहन्ना 1:5 ). पाप करना परमेश्वर के लिए असंभव है.  परमेश्वर की कभी भी पाप ना कर सकने की योग्यता ही उसे झूठे ईश्वरों से पृथक करती है। परमेश्वर ना ही प्रत्यक्ष और ना ही अप्रत्यक्ष रूप से पाप के लिए जिम्मेदार है.  ना तो कोई उसे पाप का प्रलोभन दे सकता ही न ही वो किसी को. हमारे प्रलोभन में पड़ने और पाप करने के लिए शैतान और हम पूरी तरह से जिम्मेदार हैं ( याकूब 1:13)। अगर आपको परमेश्वर की पवित्रता पर जरा भी संदेह है तो क्रूस पर निगाह डालिए। वे धार्मिकता से इतना प्रेम करता है कि उसने अपने कुछ चुने हुओं को न्याय (नरक) से बचाने के लिए अपने इकलौते पुत्र को ही नरक पिला दिया अर्थात चुने हुओं के बजाय की सजा दे दी।

समझने का प्रयास कीजिये: परमेश्वर की संप्रभुता (हर चीज़ का भाग्य निर्धारण करने का गुण) और मनुष्य का जिम्मेदार होना असंगत ( परस्पर विरोधी) नहीं हैं। परमेश्वरीय वास्तविकता में परमेश्वर का किसी चीज का पूर्व निर्धारण करना और फिर भी मनुष्य का अपने पापों के प्रति जिम्मेदार होना संभव है। आईए हम इसे बाइबल में से  कुछ उदाहरणों के द्वारा देखते हैं:

1. यूसुफ़ के भाइयों ने उसे खड्डे में डाला और फिर बेच दिया। बाद में वो पोतीपर के घर में दास बन कर रहा, उस पर झूठा इल्जाम लगाकर उसे कैदखाने में डाल दिया गया और फिर एक दिन परमेश्वर उसे मिश्र देश का दूसरा सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बना देता है और जब अकाल के दौरान उसके भाई मिश्र देश में आते हैं और उसे पहचानने के बाद उस से डर जाते हैं की अब ये हमे मार डालेगा, तब यूसुफ़ कहता है:

परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे आगे इसलिए भेजा कि तुम पृथ्वी पर जीवित रहो, और तुम्हारे प्राणों के बचने से तुम्हारा वंश बढ़े।

(उत्पत्ति 45:7)

युसूफ के अनुसार परमेश्वर ही उसे मिश्र देश में लाया.  तो क्या परमेश्वर ने यूसुफ़ के भाइयों से पाप करवाया? नहीं ! उसने तो सिर्फ पाप को निर्धारित किया कि यह होगा. उसके भाई स्वयं ही जिम्मेदार थे अपने पापों के लिए।

2. और यहोवा का क्रोध इस्राएलियों पर फिर भड़का और उसने दाऊद को इनकी हानि के लिये यह कहकर उभारा कि इस्राएल और यहूदा की जनगणना करवाए। (2 शमूएल 24:1)

हम जानते हैं कि दाऊद के जनगणना करवाने से क्रोधित होकर परमेश्वर ने इज़राइल को भयंकर दंड दिया और बड़ी संख्या में लोग मर गए  थे. परन्तु 2 शमूएल 24:1 हम को अचम्भे में डाल देता है कि दाऊद को भड़काया भी तो परमेश्वर ने ही था. तो क्या परमेश्वर ने दाऊद से पाप करवाया और फिर दंड भी दिया. नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है? परमेश्वर तो ज्योति है उसमे कुछ भी अंधकार नहीं ( 1 यूहन्ना 1:5 ) और वह पाप के लिए न तो प्रत्यक्ष रूप से ना ही अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है ( याकूब 1:13). तो फिर क्यों लिखा है कि यहोवा ने ही उसे भड़काया या उभारा कि वह जनगणना करवाए? क्योंकि परमेश्वर पाप का निर्धारण करता है. कोई पाप भी उसकी योजना के बाहर नहीं कर सकता. निम्न आयतों में देखिये कि दाऊद के जनगणना करवाने के पाप के लिए कौन जिम्मेदार है:

और शैतान ने इस्राएल के विरुद्ध उठ कर, दाऊद को उकसाया कि इस्राएलियों की जनगणना करवाए। (1 इतिहास  21:1)

प्रजा की गणना करने के बाद दाऊद का मन व्याकुल हुआ। और दाऊद ने यहोवा से कहा, यह काम जो मैं ने किया वह महापाप है। तो अब, हे यहोवा, अपने दास का अधर्म दूर कर; क्योंकि मुझ से बड़ी मूर्खता हुई है।(2 शमूएल 24:10)

1 इतिहास  21:1 में हम देखते है कि दाऊद को शैतान ने भड़काया और 2 शमूएल 24:10 में हम देखते है कि दाऊद अपने पाप कि जिम्मेदारी खुद लेता है.

अब आप समझ गए होंगे कि परमेश्वर भाग्य विधाता है और जो कुछ भी हो रहा है उसकी योजना के अंतर्गत हो रहा है, परन्तु मनुष्य स्वयं पूरी तरह जिम्मेदार है.

3.अश्शूर पर हाय, जो मेरे क्रोध का लठ और मेरे हाथ में का सोंटा है! वह मेरा क्रोध है। मैं उसको एक भक्तिहीन जाति के विरुद्ध भेजूंगा, और जिन लोगों पर मेरा रोष भड़का है उनके विरुद्ध उसको आज्ञा दूंगा कि छीन छान करे और लूट ले, और उन को सड़कों की कीच के समान लताड़े। (यशायाह 10:5-6)

इस आयत के अनुसार परमेश्वर ने अश्शूर को इज़राइल को उसके पाप के कारण नाश करने के लिए भेजा. लेकिन निम्न लिखित आयतों को देखिये:

इस कारण जब प्रभु सिय्योन पर्वत पर और यरूशलेम में अपना सब काम कर चुकेगा, तब मैं अश्शूर के राजा के गर्व की बातों का, और उसकी घमण्ड भरी आंखों का पलटा दूंगा।

उसने कहा है, अपने ही बाहुबल और बुद्धि से मैं ने यह काम किया है, क्योंकि मैं चतुर हूं; मैं ने देश देश के सिवानों को हटा दिया, और उनके रखे हुए धन को लूट लिया; मैं ने वीर की नाईं गद्दी पर विराजनेहारों को उतार दिया है। (यशायाह 10:12-13)

पहले तो परमेश्वर खुद भेजता है नाश करने के लिए और फिर दंड भी देता है. ऐसा क्यों? क्योंकि अश्शूर परमेश्वर कि सम्प्रभुता में तो इज़राइल के खिलाफ आता है, परन्तु उसका उद्देश्य परमेश्वर कि महिमा नहीं होता बल्कि अपनी ही बड़ाई होता है. अश्शूर अपने पाप के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है.

4. उसी को जब वह परमेश्वर की ठहराई हुई योजना और पूर्वज्ञान के अनुसार पकड़वाया गया, तो तुम ने अधमिर्यों के हाथ से उसे क्रूस पर चढ़वा कर मार डाला। (प्रेरितों 2:23)

और तुम ने जीवन के कर्ता को मार डाला. (प्रेरितों  3:15)

क्योंकि सचमुच तेरे सेवक यीशु के विरोध में, जिस तू ने अभिषेक किया, हेरोदेस और पुन्तियुस पीलातुस भी अन्य जातियों और इस्त्राएलियों के साथ इस नगर में इकट्ठे हुए।

कि जो कुछ तेरे हाथ (तेरी सामर्थ) और तेरे उद्देश्य ने पूर्वनिर्धारित किया था वही करें। । (प्रेरितों  4:27-28)

उपर्युक्त आयतों के अनुसार, प्रभु यीशु कि मृत्यु परमेश्वर के पूर्व-निर्धारण के द्वारा ही थी, लेकिन मनुष्य खुद उसको मारने के लिए जिम्मेदार थे: “तुम ने जीवन के कर्ता को मार डाला .” (प्रेरितों 3:15).

5. और अभी तक तो बालक जन्मे थे, और उन्होंने कुछ भला या बुरा किया था, इसलिए कि परमेश्वर की मनसा जो उसके चुन लेने के अनुसार है, कर्मों के कारण नहीं, परन्तु बुलानेवाले के कारण बनी रहे। (रोमियों 9:11)

सो वह जिस पर चाहता है, उस पर दया करता है; और जिसे चाहता है, उसे कठोर कर देता है। (रोमियों 9:18)

रोमियों 9:11 में हम देखते हैं कि परमेश्वर याकूब को उद्धार के लिए उसको बनाने से पहले ही चुन लेता है और एसाव को विनाश के लिए छोड़ देता है. रोमियों ९:१८ में हम पातें है कि  जिसको चाहता है उस पर दया करके उद्धार का दान दे देता है और बाकि लोगों को उनके पाप के वश में और कठोर होकर नरक जाने के लिए छोड़ देता है.लेकिन अगले ही अध्याय में वो जिम्मेदार किस को ठहरता है?  देखिये:

मैं सारे दिन अपने हाथ एक आज्ञा मानने वाली और विवाद करने वाली प्रजा की ओर पसारे रहा॥ (रोमियों 10:21)

जी हाँ परमेश्वर ने भाग्य निर्धारण कर रखा है, लेकिन परमेश्वर के निमंत्रण को ना स्वीकारने के लिए और उसके पास न आने के लिए मनुष्य खुद जिम्मेदार है.

6. यदि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य का अपराध करे, तब तो परमेश्वर उसका न्याय करेगा; परन्तु यदि कोई मनुष्य यहोवा के विरुद्ध पाप करे, तो उसके लिये कौन बिनती करेगा? परन्तु उन्होंने (एली के बच्चों ने) अपने पिता की बात मानी; क्योंकि यहोवा की इच्छा उन्हें मार डालने की थी। (एक शमूएल 2:25)

एली के बच्चों ने उनके पिता कि बात क्यों नहीं मानी? क्योंकि यहोवा कि इच्छा उन्हें मार डालने की थी. तो क्या यहोवा उनके पाप के लिए जिम्मेदार है? नहीं, कदापि नहीं. लेकिन यहोवा जिस पर दया करना चाहे उस पर दया करता है और जिसे कठोर करना चाहे उसे उसके पाप के वश में कठोर होने के लिए छोड़ सकता है  (रोमियों ९:१८).तो इसका मतलब यह हुआ कि यहोवा ने उनके पाप को और उनको मार डालना निर्धारित किया, लेकिन वे स्वयं इसके लिए जिम्मेदार थे.

7.जो कुस्रू के विषय में कहता है, वह मेरा ठहराया हुआ चरवाहा है और मेरी इच्छा पूरी करेगा; यरूशलेम के विषय कहता है, वह बसाई जाएगी और मन्दिर के विषय कि तेरी नेव डाली जाएगी॥

अपने दास याकूब और अपने चुने हुए इस्राएल के निमित्त मैं ने नाम ले कर तुझे बुलाया है; यद्यिप तू मुझे नहीं जानता, तौभी मैं ने तुझे पदवी दी है।

मैं यहोवा हूं और दूसरा कोई नहीं, मुझे छोड़ कोई परमेश्वर नहीं; यद्यपि तू मुझे नहीं जानता, तौभी मैं तेरी कमर कसूंगा. (यशायाह 44:28; 45:4-5)

यिर्मयाह 29:10 के अनुसार, परमेश्वर ने इज़राइल से वादा किया था कि सत्तर साल बाद वह उनको फिर से आबाद करेगा. यशायाह कि उपर्युक्त आयतों में हमने देखा कि परमेश्वर कुस्रू राजा के द्वारा यह काम करवाएगा. यशायाह ४५:५-६ के अनुसार, कुस्रू राजा यहोवा परमेश्वर को जानता भी नहीं, लेकिन फिर भी वह वही सब कर रहा है जो यहोवा चाहता है. वह अपने हिसाब से काम कर रहा है परन्तु परमेश्वर कि इच्छा और योजना उसमे पूरी हो रही है. वह अपने काम के लिए जिम्मेदार है परन्तु यह सब परमेश्वर ने ही पूर्वनिर्धारित कर रखा था.

निष्कर्ष

ऐसी और भी सैकड़ों उदहारण बाइबल में से दिए जा सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर की सम्प्रभुता बाइबल कि हर आयत में है, बस देखने कि आँखे होनी चाहिए. निष्कर्ष के लिए दो-तीन आयतें  और देखिये:

मनुष्य के कदम यहोवा की ओर से दृढ़ होतें हैं. (भजन 37:23)

इस आयत के अनुसार मनुष्य जो भी अच्छा या बुरा करता हैं, वो सब यहोवा कि और से पूर्वनिर्धारित है.

 यदि यहोवा ने आज्ञा दी हो, तब कौन है कि वचन कहे और वह पूरा हो जाए?

अच्छा और बुरा, क्या दोनों परमप्रधान की आज्ञा से नहीं होते? (विळपगीत 3:38)

मैं उजियाले का बनाने वाला और अन्धियारे का सृजनहार हूं, मैं अच्छाई और बुराई को रचता हूं, मैं यहोवा ही इन सभों का कर्त्ता हूं। (यशायाह 45:7)

उपर्युक्त दोनों आयतों में भी परमेश्वर भलाई-बुराई और धार्मिकता-अधार्मिकता की जिम्मेदारी ले रहा है. किस अर्थ में? स्पष्ट रूप से इस अर्थ में नहीं कि वो पाप का रचियता है, क्योंकि उसमे से पाप निकलना असंभव है. वह पवित्र पवित्र पवित्र है ( यशा 6:3 ).  वह ज्योति है,  उसमे कुछ भी अंधकार नहीं ( 1 यूहन्ना 1:5 ). वह ना तो प्रत्यक्ष और ना ही अप्रत्यक्ष रूप से पाप के लिए जिम्मेदार है.  ना तो कोई उसे पाप का प्रलोभन दे सकता है, न ही वो किसी को. हमारे प्रलोभन में पड़ने और पाप करने के लिए शैतान और हम पूरी तरह से जिम्मेदार हैं ( याकूब 1:13)। फिर किस अर्थ में परमेश्वर अच्छाई-बुराई और धार्मिकता-अधार्मिकता कि जिम्मेदारी ले रहा है? इस अर्थ में कि वह इन सब को पूर्व निर्धारित करने वाला संप्रभु परमेश्वर है. फिर से याद दिला दूँ, मनुष्य खुद अपने पाप के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है. परमेश्वर की संप्रभुता (हर चीज़ का भाग्य निर्धारण करने का गुण) और मनुष्य का जिम्मेदार होना असंगत (परस्पर विरोधी) नहीं हैं। परमेश्वरीय वास्तविकता में परमेश्वर का किसी चीज का पूर्व निर्धारण करना और फिर भी मनुष्य का अपने पापों के प्रति जिम्मेदार होना संभव है। जैसा कि हमने ऊपर विस्तार से देखा.

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