यूहन्ना 3:16 का दुष्प्रयोग (Abuse of John 3:16) साप्ताहिक शैक्षणिक भक्ति सन्देश- 16 (Weekly Doctrinal Devotional-16)


क्योंकि परमेश्‍वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्‍वास करे वह नष्‍ट न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। (यूहन्ना 3:16)

यूहन्ना 3:16 मसीही जगत में सबसे ज्यादा दुरुपयोग और दुष्प्रयोग में लायी जाने वाली आयत है। झूठे या भ्रमित शिक्षक इस आयत को लेकर आपको ये बातें बोलते हैं :
1) परमेश्वर सारे जगत से अर्थात आदम से लेकर इस पृथ्वी पर आने वाले अंतिम मनुष्य तक- सबसे अनंत प्रेम करता है।
2) यीशु मसीह सब मनुष्यों के लिए मरा।
3) सब मनुष्यों के पास यीशु मसीह के पास आने की स्वतंत्र इच्छा है ।
4) मनुष्य यीशु मसीह में विश्वास करने में समर्थ है।

ये चारों धारणाएं जो कि आपस में ओवरलैप करती हैं गलत है। हम इन चारों धारणाओं को बाइबल के प्रकाश में जाचेंगे और गलत पाएंगे:

1) परमेश्वर सारे जगत से अर्थात आदम से लेकर इस पृथ्वी पर आने वाले अंतिम मनुष्य तक- सबसे अनंत प्रेम करता है।
पहली बात तो परमेश्वर मजबूर नहीं है अपनी सम्पूर्ण सृष्टि से प्रेम करने के लिए। परमेश्वर ने गिरे हुए स्वर्गदूतों अर्थात शैतान और दुष्टात्माओं से प्रेम नहीं किया। उसने उनके उद्धार के लिए कोई कुर्बानी नहीं की।

उपर्युक्त धारणा में विश्वास करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि बाइबल यह भी कहती है कि परमेश्वर पापियों से नफरत करता है। क्या आपको धक्का लगा ? क्या आपको विश्वास नहीं हुआ ? ध्यान दीजिए “परमेश्वर पाप से नफरत करता है, पर पापियों से प्रेम करता है” जैसी कोई आयत बाइबल में नहीं है। परन्तु आपने बहुत से शिक्षकों से यह पंक्ति सुनी होगी। आप ही सोचिये क्या परमेश्वर पाप को नरक में डालेगा ? नहीं ? वो पापियों को नरक में डालेगा। देखिये वो पापियों से घृणा करता है :

घमंडी तेरे सम्मुख खड़े होने न पाएँगे;
तुझे सब अनर्थकारियों से घृणा है।
तू उनको जो झूठ बोलते हैं नष्‍ट करेगा;
यहोवा तो हत्यारे और छली मनुष्य से
घृणा करता है। (भजन 5:56)

परन्तु वह उनसे जो दुष्‍ट हैं और उपद्रव
से प्रीति रखते हैं अपनी आत्मा में घृणा
करता है। (भजन 11:5)

छ: वस्तुओं से यहोवा बैर रखता है,
वरन् सात हैं जिन से उसको घृणा है :
अर्थात् घमण्ड से चढ़ी हुई आँखें,
झूठ बोलनेवाली जीभ,
और निर्दोष का लहू बहानेवाले हाथ,
अनर्थ कल्पना गढ़नेवाला मन,
बुराई करने को वेग दौड़नेवाले पाँव,
झूठ बोलनेवाला साक्षी
और भाइयों के बीच में झगड़ा उत्पन्न
करनेवाला मनुष्य। (नीतिवचन 6:16-19)

मैं ने याक़ूब से प्रेम किया परन्तु एसाव को अप्रिय जानकर उसके पहाड़ों को उजाड़ डाला, और उसकी पैतृक भूमि को जंगल के गीदड़ों का स्थान बना दिया है। (मलाकी 1:3)

आधुनिक मसीहियत ने हमे यह सिखा दिया कि हम परमेश्वर के प्रेम के योग्य हैं और परमेश्वर हमसे प्रेम करने को मजबूर है। हम ऐसी झूठीं मसीहियत में फंस गए हैं जिसमे हम ये मानते हैं कि यदि परमेश्वर सम्पूर्ण जगत से अनंत प्रेम न करें तो, वो परमेश्वर हो ही नहीं सकता। लेकिन ऊपर आपने देखा कि परमेश्वर पापियों से नफरत करता हैं। मेने उन आयतों की व्याख्या भी नहीं की, क्योंकि वो स्वतः स्पष्ट हैं।

परमेश्वर सिर्फ अपने चुने हुओं से अनंत प्रेम करता है। तो क्या परमेश्वर बाकी लोगों से किसी भी तरह का प्रेम नहीं करता ? करता है। उस प्रेम को कहते हैं सामान्य प्रेम। परमेश्वर ने याकूब से अनंत प्रेम किया और उसका उद्धार किया और एसाव से घृणा की- उसके पाप के कारण। परन्तु परमेश्वर ने एसाव से सामान्य प्रेम किया था। परमेश्वर ने उसके लिए भी सूरज उगाया था और बारिश भेजी थी और जीने के लिए जो चाहिए वो सब दिया था।

क्या कोई प्रेम करे और दया ना करे, ऐसा संभव है ? प्रेम तो स्वाभाव से ही दयालु होता है। लेकिन फिर भी परमेश्वर अपने मुँह से स्वीकारता है कि उसने कुछ लोगों पर दया नहीं की।इसका अर्थ यह हुआ कि परमेश्वर ने उनसे (अनंत) प्रेम नहीं किया। प्रेम के वश में अगर किसी को बचाना हो और फिर भी ना बचाये ऐसा हो सकता है क्या? फिर भी परमेश्वर सब को नहीं बचाता। उल्टा, अपने मुँह से स्वीकारता है की उसने कुछ लोगों से घृणा की। पुराने नियम में परमेश्वर ने कम से कम पंचानवे प्रतिशत से ज्यादा दुनिया में वचन नहीं भेजा। उल्टा, इज़राइलियों को आदेश देकर कई जातिंयों को उजड़वा दिया और उनका नाश करवा दिया। नए नियम में सम्पूर्ण जगत में सुसमाचार प्रचार पर बहुत जोर डाला है, लेकिन फिर भी परमेश्वर यह निश्चित नहीं करता (does not ensure) कि सब लोग मरने से पहले एक बार गोस्पल सुन ले। ये आयतें पढ़िए :

जैसा लिखा है, “मैं ने याकूब से प्रेम किया, परन्तु एसाव को अप्रिय जाना।”
इसलिये हम क्या कहें? क्या परमेश्‍वर के यहाँ अन्याय है? कदापि नहीं। क्योंकि वह मूसा से कहता है,
“मैं जिस किसी पर दया करना चाहूँ उस
पर दया करूँगा,
और जिस किसी पर कृपा करना चाहूँ
उसी पर कृपा करूँगा।”
अत: यह न तो चाहनेवाले की, न दौड़नेवाले की परन्तु दया करनेवाले परमेश्‍वर की बात है। क्योंकि पवित्रशास्त्र में फ़िरौन से कहा गया, “मैं ने तुझे इसी लिये खड़ा किया है कि तुझ में अपनी सामर्थ्य दिखाऊँ, और मेरे नाम का प्रचार सारी पृथ्वी पर हो।” इसलिये वह जिस पर चाहता है उस पर दया करता है, और जिसे चाहता है उसे कठोर कर देता है। (रोमियों  9:13-18)

आपको बहुत अजीब लग रहा होगा। ये क्या है ? हमने आज तक जो सुना, ये उससे बिल्क़ुल भिन्न है। आपने सिर्फ ये सुना है कि परमेश्वर प्रेमी है। ये एक सत्य है। परमेश्वर (पवित्र) क्रोधी और (पवित्र) घृणा करने वाला भी है -ये दूसरा सत्य है और इस विषय में बाइबल में कम से कम उतनी आयतें तो है जितनी कि परमेश्वर के प्रेम के विषय में है। बस आपको आधुनिक मसीहियत ने ये बताया नहीं। बिना घृणा के कोई प्रेम संभव नहीं ? क्या आप पाप से घृणा किये बिना धार्मिकता से प्रेम कर सकते हैं?

आप भौचक्के रह गए होंगे। बहुत प्रश्न उठ रहे होंगे। मैं आपको बताता हूँ। ये ब्रहम्माण्ड आपके लिए नहीं बनाया गया। परमेश्वर के लिए बनाया गया है। इस सृष्टि का केंद्र मनुष्य नहीं, परमेश्वर है। सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए है। परमेश्वर सब से सामान्य प्रेम करता है। सब के लिए सूरज उगाता है और बारिश भेजता है। परन्तु परमेश्वर ने अनंत में कुछ लोग को चुन लिया कि उनसे अनंत प्रेम करे और बाकी लोगों को उनके पापों के परिणाम भोगने अर्थात नरक जाने के लिए छोड़ दिया। परमेश्वर कुछ लोगों का उद्धार करके अपने अनुग्रह के लिए महिमा पायेगा और बाकियों को नरक में दंड देकर अपने न्याय, पवित्र क्रोध, पवित्र घृणा और पवित्र जलन के लिए महिमा पायेगा।

क्या कुम्हार को मिट्टी पर अधिकार नहीं कि एक ही लोंदे में से एक बरतन आदर के लिये, और दूसरे को अनादर के लिये बनाए? तो इसमें कौन सी आश्‍चर्य की बात है कि परमेश्‍वर ने अपना क्रोध दिखाने और अपनी सामर्थ्य प्रगट करने की इच्छा से क्रोध के बरतनों की, जो विनाश के लिये तैयार किए गए थे, बड़े धीरज से सही; और दया के बरतनों पर, जिन्हें उसने महिमा के लिये पहले से तैयार किया, अपने महिमा के धन को प्रगट करने की इच्छा की? (रोमियों 9:21-23)

यहोवा ने सब वस्तुएँ विशेष उद्देश्य के लिये
बनाई हैं, वरन् दुष्‍ट को भी विपत्ति भोगने
के लिये बनाया है। (नीतिवचन 16:4)

आहा! परमेश्‍वर का धन और बुद्धि और ज्ञान क्या ही गंभीर है! उसके विचार कैसे अथाह, और उसके मार्ग कैसे अगम हैं!
“प्रभु की बुद्धि को किसने जाना? या
उसका मंत्री कौन हुआ?
या किसने पहले उसे कुछ दिया है जिसका
बदला उसे दिया जाए? ”
क्योंकि उसी की ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिये सब कुछ है। उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे : आमीन। (रोमियों 11:33-36)

फिर क्यों लिखा है कि “परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि”?

अगर मैं कहूँ कि सारे जगत को मालूम पड़ गया कि मुझे कोविड -19 हो गया, तो क्या इसका मतलब ये है कि सारे जगत के हर व्यक्ति को मालूम पड़ गया ? नहीं । इन आयतों को देखिये:

पहले मैं तुम सब के लिये यीशु मसीह के द्वारा अपने परमेश्‍वर का धन्यवाद करता हूँ, क्योंकि तुम्हारे विश्‍वास की चर्चा सारे जगत में हो रही है। (रोमियों 1:8)

क्या रोमी विश्वासियों के विश्वास की चर्चा बिना अपवाद दुनिया का हर व्यक्ति कर रहा था ? नहीं। आप जानते हैं यहाँ दुनिया के हर व्यक्ति के बारे में बात नहीं हो रही है। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि उनका विश्वास प्रसिद्द हो चुका था।

इससे अब केवल इसी बात का ही डर नहीं है कि हमारे इस धन्धे की प्रतिष्‍ठा जाती रहेगी, वरन् यह कि महान् देवी अरतिमिस का मन्दिर तुच्छ समझा जाएगा, और जिसे सारा आसिया और जगत पूजता है उसका महत्व भी जाता रहेगा।” (प्रेरितों 19:27)

क्या अरतिमिस देवी को सारा जगत पूजता था। नहीं। आपको मालूम हैं यहाँ जगत का मतलब सम्पूर्ण जगत नहीं हो सकता। अधिकतर देश के लोग इस देवी को जानते भी नहीं थे।

यदि तू यह काम करता है, तो अपने आप को जगत पर प्रगट कर। (यूहन्ना 7:4)

क्या यहाँ जगत का मतलब सारे संसार के सारे लोग हैं ? नहीं।

मैं …………संसार के लिये विनती नहीं करता (यूहन्ना 17:9)

क्या यीशु मसीह पूरे संसार में किसी के लिए भी विनती नहीं कर रहा। अगर नहीं कर रहा, तो वो आपका महायाजक कैसे हुआ?

आप समझ गए होंगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ। यूहन्ना 3:16 में जगत को इसके व्यापक (generic) अर्थ में इस्तेमाल किया गया है। इसका मतलब सम्पूर्ण जगत का हर एक व्यक्ति नहीं, परन्तु सम्पूर्ण जगत के या सब देशों के चुने हुए लोग हैं। आप सन्दर्भ देखिये। यीशु मसीह एक यहूदी से बात कर रहे थे। यहूदी लोग इस भ्रान्ति में थे कि मसीहा सिर्फ उन्हीं के लिए आएगा। वे लोग अन्यजातियों से सम्बन्ध तक नहीं रखते थे। योना नीनवे नगर के उद्धार से कितना अप्रसन्न था आप सब जानते हैं (योना 3:10-4:3)। इसके अलावा, पतरस कुर्नीलियस से कहता है कि अन्यजाति की संगति करना या उसके यहाँ जाना यहूदी के लिये अधर्म है (प्रेरितों 10:28)। जब पतरस कुर्नीलियस के घर से यरूशलेम वापस आया तो बाकी यहूदी लोग उससे वाद विवाद करने लगे क्योंकि वो अन्य जातियों के यहाँ खाना खा के आया था (प्रेरितों 11:2)। यहूदियों को बड़ा आश्चर्य हुआ जब परमेश्वर ने अन्य जातियों को उद्धार के लिए पश्चाताप का दान दिया और पवित्र आत्मा उन पर उंडेला (प्रेरितों 11:17-18)। यीशु मसीह यहूदी निकुदिमस से कह रहे थे कि परमेश्वर ने सिर्फ यहूदियों से अनंत प्यार नहीं किया, उसने सारी दुनिया से अनंत प्यार किया अर्थात सारी दुनिया के चुने हुए लोगों से चाहे वो यहूदी हो, चाहे अन्यजातीय। अनंत प्यार जिसके तहत उसने अपना इकलौता बेटा दे दिया। निम्न आयत को देखिये:

और मैं यदि पृथ्वी पर से ऊँचे पर चढ़ाया जाऊँगा, तो सब को अपने पास खीचूँगा।” (यूहन्ना 12:32)

क्या यीशु मसीह ने सब को अपने पास खींच लिया ? अरे वो तो ये भी निश्चित नहीं कर रहा कि सब लोग सुसमाचार सुने। आज भी बड़ी संख्या में लोग प्रतिदिन बिना यीशु मसीह के बारे में सुने मर रहे हैं। यूहन्ना 3:16 की तरह यहाँ भी मतलब है कि यीशु मसीह सिर्फ यहूदियों में से नहीं लेकिन पूरी दुनिया में से अपने चुने हुए लोगों को अपने पास खींच लेगा। इस आयत को देखिये :

अर्थात् परमेश्‍वर ने मसीह में होकर अपने साथ संसार का मेलमिलाप कर लिया, और उनके अपराधों का दोष उन पर नहीं लगाया । (2 कुरिन्थियों 5:19)

क्या परमेश्वर ने बिना अपवाद सम्पूर्ण संसार के सारे लोगों से मेलमिलाप कर लिया और उनका दोष दूर कर दिया ? नहीं, साफ़ है, यहाँ संसार का मतलब संसार नहीं है। ये एक व्यापक शब्द (generic word) है, जिसका अर्थ है संसार भर में से चुने हुए लोग।

 

2) यीशु मसीह सब मनुष्यों के लिए मरा।

यहुन्ना 3:16 की गलत व्याख्या के आधार पर  दूसरी गलत अवधारणा यह है कि यीशु मसीह सब मनुष्यों के लिए मरा। यदि यीशु मसीह सारी दुनिया के लिए मरा और उसने सबके पापों के लिए सजा भोग ली, तो कोई भी नरक में नहीं जा सकता। लेकिन हम जाते हैं कि अधिकतर लोग नरक जाएंगे। यदि यीशु मसीह ने उनकी सजा उठा ली और वो फिर भी नरक जाकर दुबारा सजा पाएंगे, तो यह परमेश्वर पिता की और से अन्याय होगा। जो हो नहीं सकता। यीशु मसीह यूहन्ना की किताब में ही कहता है कि वो सिर्फ अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण देता है और जो लोग विशवास नहीं करते वो इसलिए नहीं करते क्योंकि वो उसकी भेड़ें नहीं हैं:

अच्छा चरवाहा मैं हूँ; मैं अपनी भेड़ों को जानता हूँ, और मेरी भेड़ें मुझे जानती हैं। जैसे पिता मुझे जानता है और मैं पिता को जानता हूँ – और मैं भेड़ों के लिये अपना प्राण देता हूँ। (यूहन्ना 10:14-15)

परन्तु तुम इसलिये विश्‍वास नहीं करते क्योंकि मेरी भेड़ों में से नहीं हो। मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं; और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ। वे कभी नष्‍ट न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा। (यूहन्ना 10:26-28)

यूहन्ना 17 में यीशु मसीह महायाजकीय प्रार्थना कर रहा है। महायाजकीय प्रार्थना उनके लिए कि जाती है, जिनके लिए बलिदान चढ़ाया गया है। यीशु मसीह सारी दुनिया के लिए प्रार्थना नहीं करता, बल्कि सिर्फ चुने हुए लोगों के लिए:

मैं उनके लिये विनती करता हूँ; संसार के लिये विनती नहीं करता परन्तु उन्हीं के लिये जिन्हें तू ने मुझे दिया है, क्योंकि वे तेरे हैं। “मैं केवल इन्हीं के लिये विनती नहीं करता, परन्तु उनके लिये भी जो इनके वचन के द्वारा मुझ पर विश्‍वास करेंगे(यूहन्ना 17:9,20)

मैं अक्सर लोगों से कहता हूँ की यीशु मसीह जिनके लिए प्रार्थना तक नहीं कर रहा, उनके लिए मरेगा क्या !

स्वर्गदूत ने युसूफ से कहा:

वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा। (मत्ती 1:21)

किनका उद्धार? अपने लोगों का। दूसरे शब्दों में सिर्फ चुने हुए लोगों का। यूहन्ना 10 कि भाषा में सिर्फ अपनी भेड़ों का, क्योंकि वो सिर्फ अपनी भेड़ों के लिए ही अपने प्राण देता है। बकरियों के लिए नही। ये भेड़ें कौन है ? सारी दुनिया ? नहीं। यहूदियों और अन्यजातियों में से चुने हुए लोग:

मेरी और भी भेड़ें हैं, जो इस भेड़शाला की नहीं। मुझे उनको भी लाना अवश्य है। वे मेरा शब्द सुनेंगी, तब एक ही झुण्ड और एक ही चरवाहा होगा। (यूहन्ना 10:16)।

निम्न आयत देखिये:

मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिये दे दिया। (इफिसियों  5:25)

मसीह ने किस से प्रेम किया सारी दुनिया से? नहीं, अपनी कलीसिया से अर्थात चुने हुए लोगों से। किसके लिए अपने आप को दे दिया ? सब के लिए ? नहीं सिर्फ अपनी दुल्हन, कलीसिया के लिए। अगर सब के लिए कुर्बान होता, तो सब का उद्धार हो जाता। एक और आयत जो स्पष्टता से कह रही है कि मसीह ने अपने लहू के द्वारा सिर्फ अपनी कलीसिया को मोल लिया है, अर्थात वह सिर्फ कलीसिया के लिए मरा है :

परमेश्‍वर की कलीसिया की रखवाली करो, जिसे उसने अपने लहू से मोल लिया है। (प्रेरितों 20:28)

आइये अब प्रेरित यूहन्ना जिसने यूहन्ना 3:16 लिखा वही निम्नलिखित आयत में जगत का मतलब भी बता रहा है:

“तू इस पुस्तक के लेने, और इसकी मुहरें
खोलने के योग्य है;
क्योंकि तूने वध होकर अपने लहू से
हर एक कुल और भाषा और लोग और
जाति में से
परमेश्‍वर के लिये लोगों को मोल लिया है, (प्रकाशितवाक्य 5:9)

यीशु मसीह ने अपने लहू के द्वारा किसको ख़रीदा ? इस संसार कि हर एक जाती भाषा और कुल में से चुने हुए लोगों को। यही मतलब है संसार से प्रेम रखने और उसके लिए अपने बेटे को दे देने का। निम्नांकित दो आयतों की तुलना के द्वारा भी स्पष्ट हो जाता है कि यीशु मसीह किस के लिए मरा:

 

 

3) सब मनुष्यों के पास यीशु मसीह के पास आने की स्वतंत्र इच्छा है :

यहुन्ना ३:१६ का दुष्पयोग लोग इस कारण कर पातें है क्योंकि वो इसको कभी भी सन्दर्भ में नहीं लेते। यदि पूरा अध्याय पढ़ा जाए, तो सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा। इस अध्याय में यीशु मसीह निकुदिमस से कहता है :

मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता। (यहुन्ना 3:3)

यीशु मसीह ऐसा क्यों कह रहा है? क्योंकि सब मनुष्य पापों में मरे हुए हैं। वे आत्मिक रूप से मरे हुए हैं। नए सिरे से अर्थात ऊपर से या परमेश्वर से जन्मे बिना वे परमेश्वर के राज्य को नहीं देख सकते।

(तुम) अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे। (इफिसियों 2:1)

कहने का अर्थ है हम परमेश्वर और उसकी धार्मिकता के लिए मरे हुए थे और पाप के प्रति ज़िंदा थे। हम पाप तो कर सकते थे, लेकिन परमेश्वर और उसकी धार्मिकता को चुन कर उसके पीछे नहीं आ सकते थे। ये आयते देखें :

शारीरिक (आत्मिक रूप से मरा हुआ) मनुष्य परमेश्‍वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उसकी दृष्‍टि में मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्हें जान सकता है क्योंकि उनकी जाँच आत्मिक रीति से होती है। (1 कुरिन्थियों 2:14)

क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो परमेश्‍वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्‍वर की व्यवस्था के अधीन है और न हो सकता है; और जो शारीरिक दशा में (आत्मिक रूप से मरे हुए) हैं, वे परमेश्‍वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। (रोमियों 8:7-8)

हम अपने आप को ज़िंदा नहीं कर सकते थे। परमेश्वर ही यह कर सकता था। यीशु मसीह ने यूहन्ना 3:8 में स्पष्ट कर दिया कि जैसे हम हवा को नियंत्रित नहीं कर सकते, परन्तु सिर्फ उसका प्रभाव देखते हैं। वैसे ही हम पवित्र आत्मा को नियंत्रित नहीं कर सकते, वो जिसको चाहता है, नया जन्म दे देता है और उद्धार को क्रियान्वित कर देता है:

हवा जिधर चाहती है उधर चलती है और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।” (यूहन्ना 3:8)

यूहन्ना 3:16 को सही सन्दर्भ में अर्थात यहुन्ना 3:5 और 3:8 के प्रकाश में देखा जाए तो कोई भी यह मतलब नहीं निकाल सकता कि मनुष्य में यीशु मसीह के पास आने की अन्तर्निहित काबिलियत (inherent ability) है। आइये एक और आयत देखते हैं :

इनमें हम भी सब के सब पहले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे, और शरीर और मन की इच्छाएँ पूरी करते थे, और अन्य लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे। परन्तु परमेश्‍वर ने जो दया का धनी है, अपने उस बड़े प्रेम के कारण जिस से उसने हम से प्रेम किया, जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे तो हमें मसीह के साथ जिलाया (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है)। ((इफिसियों 2:3-5)

इस आयत के अनुसार हम तो मरे हुए थे। परमेश्वर ने अपनी मर्जी के द्वारा हम को आत्मिक रूप से जीवित कर दिया। इस आयत को फिर से ध्यान से पढ़िए, परमेश्वर ने हमे क्यों नया जन्म दिया ? अपने महान प्रेम के कारण। अर्थ यह हुआ कि जिससे परमेश्वर ने प्रेम किया, उसको जिला भी दिया। तो यूहन्ना 3:16 में पमेश्वर सारे जगत के सारे लोगों से अनंत प्रेम नहीं कर रहा। अगर करता तो सब को आत्मिक रूप से पुनर्जीवित कर देता और सब का उद्धार कर देता।

उपर्युक्त आयतों से स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य के पास परमेश्वर को चुनने की स्वतंत्र इच्छा नहीं है।

 

4) मनुष्य यीशु मसीह में विश्वास करने में समर्थ है।

यूहन्ना 3:16 के बारे में चौथी गलत अवधारणा यह है कि हर मनुष्य विश्वास करने में समर्थ है। आइये देखते हैं :

यूहन्ना 3:16 में लिखा है कि जो कोई उस पर विश्‍वास करेगा वह अनन्त जीवन पाएगा। इसमें यह नहीं लिखा कि विश्वास कौन कर सकता है। यूहन्ना 3 इस बात को स्पष्ट रीति से कहता है कि जो पवित्र आत्मा से जन्मे वही विश्वास कर सकता है और मैं ऊपर इसका जिक्र कर भी चुका हूँ। आइये हम और आयतें देखते हैं :

परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्‍वर से उत्पन्न हुए हैं। (यूहन्ना 1:12-13)

जो विश्वास करता है, वो इसलिए करता है क्योंकि वो परमेश्वर से जन्म ले चूका है। साफ़ साफ़ लिखा है के इस नए जन्म में ना तो लहू का, ना शरीर की इच्छा का, ना मनुष्य की इच्छा का हाथ है। ये परमेश्वर खुद ही अपनी सम्प्रभुता में करता है।

आइये एक और आयत देखते हैं, जो साफ़ साफ़ कहती है कि परमेश्वर अपनी मर्ज़ी से नया जीवन देता है :

उसने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया। (याकूब 1:18)

जैसे आपके शारीरिक जन्म में आपका हाथ नहीं था, वैसे ही आत्मिक जन्म में भी आपका हाथ नहीं है और ये जीवन पाने पर ही आप विश्वास कर सकते हैं। तो इससे सिद्ध हो जाता है कि यूहन्ना 3:16 ये नहीं कह रहा कि मनुष्य अपने आप में विश्वास करने में समर्थ है। आइये और आयतों पर गौर करें :

जितने अनन्त जीवन के लिये ठहराए गए थे, उन्होंने विश्‍वास किया। (प्रेरितों 13:48)

किसने विश्वास किया ? जितने अनन्त जीवन के लिये ठहराए गए थे। कौन विश्वास कर सकता है ? जिसको परमेश्वर ने चुन कर अनंत जीवन के लिए ठहराया है।

उसी विश्वास ने जो उसके द्वारा है, इसको तुम सब के सामने बिलकुल भला चंगा कर दिया है। (प्रेरितों 3:16)

इस आयत के अनुसार यीशु मसीह पर विश्वास करने पर छुटकारा मिलता है, लेकिन यह भी लिखा है उस विश्वास का स्रोत कौन है । “विश्वास जो उसके द्वारा है” अर्थात यीशु मसीह के द्वारा है। यीशु मसीह ही विश्वास का दान देता है। आप को कुछ संदेह है क्या? ये देखिये :

और विश्‍वास के कर्ता और सिद्ध करनेवाले यीशु की ओर ताकते रहें। (इब्रानियों 12:2)

यीशु मसीह आपके विश्वास की शुरुवात करने वाला और उसको पूर्ण करने वाला है। विश्वास उसकी ओर से आपको दान है, आपकी ओर से उसको दान नहीं है।

जिन्होंने अनुग्रह के कारण विश्‍वास किया था। (प्रेरितों 18:27)
क्योंकि मसीह के कारण तुम पर यह अनुग्रह हुआ कि न केवल उस पर विश्‍वास करो पर उसके लिये दु:ख भी उठाओ। (फिलिपियों 1:29)

आपके विश्वास करने से अनुग्रह नहीं मिला। अनुग्रह मिलने के द्वारा आपने विश्वास किया। आपके विश्वास का जनक परमेश्वर है। आपने विश्वास इसलिए नहीं किया क्योंकि आप अपने पड़ोसी से ज्यादा धर्मी या बुद्धिमान थे, परन्तु इसलिए क्योंकि आपको विश्वास का दान दिया गया है। इसलिए आप घमंड नहीं कर सकते।

क्योंकि तुझ में और दूसरे में कौन भेद करता है? और तेरे पास क्या है जो तू ने (परमेश्वर से) नहीं पाया? और जब कि तू ने (परमेश्वर से) पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है कि मानो नहीं पाया? (1 कुरिन्थियों 4:7)

 

सारांश:
1) परमेश्वर सारी दुनिया से सामान्य प्रेम करता है पर अनंत प्रेम वह सिर्फ अपने चुने हुओं से ही करता है।
2) यूहन्ना 3:16 में जगत एक व्यापक शब्द है, जिसका अर्थ है – सारी दुनिया में से चुने हुए लोग।
3) यीशु मसीह सिर्फ अपने चुने हुओं के लिए मरा। यदि सबके लिए मरता तो सब स्वर्ग जाते।
4) मनुष्य अपने पापों में मरा हुआ है और पापों का गुलाम है। उसमे परमेश्वर के पास आने की स्वतंत्र इच्छा नहीं है।
5) मनुष्य खुद से विश्वास नहीं कर सकता।
6) इससे पहले की मनुष्य विश्वास करे, परमेश्वर को उसको आत्मिक रूप से जिलाना पड़ता है ओर उसे विश्वास का दान देना पड़ता है।

 

प्रोत्साहन : मैं प्रभु यीशु मसीह के नाम से आप सब को यह प्रोत्साहन देना चाहता हूँ कि अपने पूर्वाग्रहों और अपनी भावनाओं को एक तरफ रख कर गहराई से और सही रीति से परमेश्वर के वचन का अध्ययन करें।

उदहारण प्रार्थना : है पिता परमेश्वर आपका धन्यवाद कि आपने अनंत में हमे आपकी महिमा के लिए चुन लिया। आपका धन्यवाद आपके अनंत प्रेम के लिए जिसकी न तो कोई शुरुवात है और ना ही कोई अंत। आपके प्रेम में हमेशा खोये रहने में आप मेरी मदद कीजिये ।
आपके बेटे यीशु मसीह के नाम से।

शिक्षाएं (Doctrines Involved in this Devotional):
उद्धार कि शिक्षा, सीमित प्रायश्चित कि शिक्षा (Soteriology; Doctrine of Limited Atonement or Particular Redemption)

अधिक अध्ययन करने के लिए: 

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3 thoughts on “यूहन्ना 3:16 का दुष्प्रयोग (Abuse of John 3:16) साप्ताहिक शैक्षणिक भक्ति सन्देश- 16 (Weekly Doctrinal Devotional-16)”

  1. Seema says:

    Thank you so much.. bhaiya..
    Bible ki is verse ko deeply..or bible k hi verses SE smjhne k liye … I’m truly blessed…m har bar …chahe article ho ya bible study…bahut Jada incourage Hoti hu .. bible padne k liye… God bless you

  2. Chanchal says:

    Thanks a lot bhaiya sare confusion ko clear karne . awesome explanation verses s .
    Sach m bhaiya jis tarh s aap hame spiritual food dete h ese kisi ne bhi nahi diya true or only verses s hi .sb chijo k liye god ko mahima mile . We are so blessed .May God bless you abundantly .

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