आपने परमेश्वर को चुना या उसने आपको?


संभवतया मनुष्य की ओर से स्वर्ग के महाराजा और उसके वचन के खिलाफ सबसे ज्यादा उद्धंडता भरा (बत्तमीज़ी भरा) कथन यही होगा की परमेश्वर ने हमे नहीं चुना; बल्कि हमने परमेश्वर को चुना.

आदम की हर संतान प्रभु यीशु मसीह को अस्वीकार करने की इच्छा और सामर्थ रखती है और वो यीशु मसीह को अस्वीकार करेगी, क्योंकि वो पाप में मरी हुई है. मनुष्य के लिए प्रभु यीशु मसीह को अस्वीकार करना उतना ही आसान और स्वाभाविक है जितना कुत्ते के लिए भोंकना.

परन्तु परमेश्वर को चुनने की मनुष्य में ना तो इच्छा है, ना ही सामर्थ. परमेश्वर को चुनने की इच्छा और योग्यता नया जन्म पाने पर आती है. प्रभु यीशु मसीह ने निकुडिमस से कहा:

मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।” (यहुन्ना 3:3)

आप सही बोल रहें हैं यहुन्ना 3:16 तो कहता है की हर कोई जो विश्वास करेगा, उद्धार पायेगा. परन्तु क्या आपने कभी सोचा की कौन विश्वास करेगा? यहाँ देखिये:

परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे तो लोहू से, शरीर की इच्छा से, मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं। (यहुन्ना 1:12-13)

 क्या आपने ये आयतें पढ़ी? कुछ लोगों ने क्यों विश्वास किया? क्योंकि वो ना तो लहू से, ना शरीर से, ना मनुष्य की इच्छा से उत्पन्न हुए. उन्होंने विश्वास किया क्योंकि वो परमेश्वर के द्वारा स्वर्ग से जन्माये गए थे.  उद्धार के लिए नया जन्म पाना आवश्यक  है.

मेरा अब आप से यह प्रश्न है : , “आपको पैदा करने के लिए क्या आपके माता-पिता  ने आप से अनुमति ली थी?” जब आपके शारीरिक जन्म में आपकी कोई स्वेच्छा और योगदान नहीं था, तो आप हिम्मत भी कैसे कर सकते हैं ये कहने की कि आत्मिक जीवन परमेश्वर ने आपको आपकी स्वेच्छा से दिया है?

अगर आज आप वास्तव में यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं यह इस कारण है कि परमेश्वर ने आपको ऊपर से नया जन्म दिया. निम्नांकित आयतों को आप धीरे-धीरे, बार-बार और जोर-जोर से तब तक  पढ़िए, जब तक आप इनके मर्म को ना समझ जाएँ:

और केवल यही नहीं, परन्तु जब रिबका भी एक से अर्थात हमारे पिता इसहाक से गर्भवती थी।और अभी तक तो बालक जन्मे थे, और उन्होंने कुछ भला या बुरा किया था कि उस ने कहा, कि जेठा छुटके का दास होगा। इसलिये कि परमेश्वर की मनसा जो उसके चुन लेने के अनुसार है, कर्मों के कारण नहीं, परन्तु बुलाने वाले के कारण है, बनी रहे।जैसा लिखा है, कि मैं ने याकूब से प्रेम किया, परन्तु एसौ को अप्रिय जाना॥

(रोमियों 9:10-12)

झूंठे शिक्षक कितना भी प्रयास क्यों ना कर ले, वो रोमियों कि इन आयतों से कभी भी ये नहीं कहलवा सकते कि उद्धार में आपका योगदान है. परमेश्वर ने याकूब को पैदा होने से पहले ही अपना घोषित कर दिया था.

प्रभु यीशु मसीह ने क्या कहा?

तुम ने मुझे नहीं चुना परन्तु मैं ने तुम्हें चुना है . (यहुन्ना 15:16)

बाइबल में सैंकड़ो आयतें हैं जो कहती है कि मनुष्य का उद्धार में कोई योगदान नहीं, परन्तु संभवतया यहुन्ना 15:16 सबसे ज्यादा स्पष्ट है. मनुष्य कितना मूर्ख होता है कि इस आयत को पड़ने के बाद भी कहता है कि मेने अपनी स्वेच्छा से यीशु मसीह को चुना है और स्वीकार किया है! प्रभु यीशु मसीह ने जब कहा “तुम ने मुझे नहीं चुना परन्तु मैं ने तुम्हें चुना है.”, तो उसने कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी कि मनुष्य कह सके कि उद्धार में उसका कोई योगदान है, फिर भी खुद कि आराधना करने वाला अहमी और घमंडी मनुष्य ये कहता है, “यीशु मसीह ने मेरे उद्धार के काम में अपने हिस्से का काम किया और मेने अपने हिस्से का.”

यह परमेश्वर के संप्रभु होने और भाग्य विधाता होने के गुणों को  हड़पने कि वैसी ही कोशिश है जैसी लूसिफर और आदम ने की थी. यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे दुष्ट पाप है- अर्थात परमेश्वर के नहीं दिए जा सकने वाले गुणों (incommunicable attributes) को पाने कि कोशिश.  याद रखिये उनका हर पाप  क्षमा है, जो ये विश्वास करते हैं:  “यीशु मसीह ही ने हमे सृष्टि कि उत्पत्ति से पहले चुन लिया था, उसने हम चुने हुओं के लिए कीमत चुकाई और एक दिन मुझे अपने पास बुला लिया, मुझे बदल दिया, मेरा इस में कोई योगदान नहीं.आज में उससे प्यार करता हूँ क्योंकि उसने आप ही मुझे आत्मिक रूप से ज़िंदा किया और अनुग्रह के द्वारा बचा लिया. मेरा उद्धार मेरी स्वेच्छा के द्वारा नहीं पर  परमेश्वर के  स्वतंत्र अनुग्रह के कारण हुआ.” लेकिन जो ये बोले कि परमेश्वर ने मेरी अनुमति से मुझे बचाया, मेने यीशु मसीह को अपनी स्वतंत्र इच्छा के द्वारा चुना, यीशु मसीह ने अपना काम किया, मेने अपना, ऐसे लोग ऐसी स्थिति में मर जाये तो उनका पाप अक्षम्य है, क्योंकि परमेश्वर स्वर्ग में किसी को घमंड का मौका नहीं दे सकता:

 क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है। और कर्मों के कारण, ऐसा हो कि कोई घमण्ड करे। (इफिसियों 2:8-9)

निम्नलिखित आयतों को भी देखिये:

उस ने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया. (याकूब 1:18)

देखिये याकूब 1:18 स्पष्ट है आपका उद्धार आपकी स्वतंत्र इच्छा के द्वारा नहीं परमेश्वर कि स्वतंत्र इच्छा के द्वारा हुआ.

 क्योंकि वह मूसा से कहता है, मैं जिस किसी पर दया करना चाहूं, उस पर दया करूंगा, और जिस किसी पर कृपा करना चाहूं उसी पर कृपा करूंगा। सो यह तो चाहने वाले की, दौड़ने वाले की परन्तु दया करने वाले परमेश्वर की बात है। (रोमियों 9:25-26)

क्या इससे भी ज्यादा सबूत चाहिए आपको इस बात के कि आपकी स्वतंत्र इच्छा के द्वारा नहीं पर परमेश्वर के स्वतंत्र अनुग्रह के द्वारा आपका उद्धार हुआ है? अगर हाँ तो आप अंधे है और किसी और ही आत्मा कि अगुवाई में चल रहे हैं.

फिर उद्धार कैसे होता है?

हम निम्नलिखित बिंदुओं के द्वारा इसको समझेंगे:

  • हम पापों में मरे हुए थे और परमेश्वर के पास आने कि इच्छा और सामर्थ नहीं रखते थे.

कोई समझदार नहीं, कोई परमेश्वर का खोजने वाला नहीं। (रोमियों  3:11)

तुम अपने अपराधों और पापों में मरे हुए थे। (इफिसियों  2:1)

परन्तु शारीरिक  (पापों में मरा हुआ) मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्योंकि वे उस की दृष्टि में मूर्खता की बातें हैं, और वह उन्हें समझ सकता है क्योंकि वो तो आत्मिक रीति से (पवित्र आत्मा के द्वारा) समझी जाती है। (पहला कुरिन्थियों  2:14)

 क्योंकि शरीर पर मन लगाना (ये पाप में मरे हुए व्यक्ति की बात हो रही है) तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि तो परमेश्वर की व्यवस्था के आधीन है, और हो सकता है।  और जो शारीरिक दशा में है, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते (इसके लिए आत्मिक रूप से नया जन्म पाना आवश्यक हैयहुन्ना  3:3) (रोमियों  8:7-8)

  • परमेश्वर ने खुद ने हमे आत्मिक रूप से नया जन्म दिया.

जैसा उस ने हमें जगत की उत्पति से पहिले उस में चुन लिया, कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों।

और अपनी इच्छा की सुमति के अनुसार (आपकी स्वतंत्र इच्छा के द्वारा नहीं) हमें अपने लिये पहिले से ठहराया, कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों,

कि उसके उस अनुग्रह की महिमा (आपकी स्वतंत्र इच्छा की नहीं) की स्तुति हो, जिसे उस ने हमें उस प्यारे में सेंत मेंत दिया। (इफिसियों 1:4-6)

  • नए जन्म में परमेश्वर ने हमें नया स्वाभाव, नई इच्छा (परमेश्वर से प्यार करने की), नए स्नेह (परमेश्वर की बातों के लिए), नई प्रवृत्ति (पवित्रता की ओर), विश्वास (परमेश्वर में) और पश्चाताप (पापों से) का दान दिया.

नया जन्म पाने के द्वारा हमने यीशु मसीह पर विश्वास किया. याद रखिये विश्वास ओर पश्चाताप आपकी ओर से परमेश्वर को दी गई भेंट नहीं है; ये परमेश्वर की ओर से आपको दिए गए दान है.

जितने अनन्त जीवन के लिये ठहराए गए थे, उन्होंने विश्वास किया। (प्रेरितों 13:48),

परमेश्वर ने अन्यजातियों को भी जीवन के लिये मन फिराव का दान दिया है॥(प्रेरितों 11:18)

क्योंकि तुझ में और दूसरे में क्या अंतर है? और तेरे पास क्या है जो तू ने (ऊपर से अर्थात परमेश्वर से) नहीं पाया: और जब कि तु ने (ऊपर से अर्थात परमेश्वर से) पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है, कि मानों नही पाया? (पहला कुरिन्थिओं 4:7).

हाँ आपने विश्वास किया, परन्तु यह इस लिए नहीं की आप विश्वास नहीं करने वाले अपने पडोसी से ज्यादा बुद्धिमान  या धर्मी है, लेकिन इसलिए क्योंकि आपको परमेश्वर ने विश्वास का दान दिया हैं.

उपसंहार:

यह समझिये. परमेश्वर किसी का कर्जदार नहीं है. यदि वो सबको नरक भेज दे, तो भी वो धर्मी ओर न्यायी ही रहेगा, क्योंकि हम अपने पापों के लिए जिम्मेदार हैं ओर नरक के ही योग्य हैं. परमेश्वर ने कुछ लोगों को चुन लिया ओर बाकी को छोड़ दिया.

जो स्वर्ग जातें हैं उनको अनुग्रह मिला (जिसके वो योग्य ना थे).

जो नरक जातें हैं उनको न्याय मिला (जिसके वो योग्य थे)

किसी को भी अन्याय नहीं मिला.

-Pankaj

2 thoughts on “आपने परमेश्वर को चुना या उसने आपको?”

  1. Swarnima says:

    True

  2. Vickey kumar says:

    Ap koshan anser बहुत अच्छा है

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