मनुष्य का मुख्य उद्देश्य क्या है? (चार्ल्स स्पर्जन प्रश्नोत्तरी-1)

1. मनुष्य का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर: मनुष्य का मुख्य उद्देश्य सदा के लिए परमेश्वर की महिमा करना और उसमे आनंदित रहना है। (1 कुरिन्थियों 10:31; भजन 73:25-26)

साक्षी आयतें:
इसलिये तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो। (1 कुरिन्थियों 10:31)

स्वर्ग में मेरा और कौन है?
तेरे संग रहते हुए मैं पृथ्वी पर और कुछ
नहीं चाहता।
मेरे हृदय और मन दोनों तो हार गए हैं,
परन्तु परमेश्वर सर्वदा के लिये मेरा भाग
और मेरे हृदय की चट्टान बना है। (भजन 73:25-26)

व्याख्या: हम इस उत्तर की व्याख्या करने के लिए इन पांच वाक्यांशों (phrases) के बारे में बात करेंगे:

  • हमारा उद्देश्य
  • परमेश्वर की महिमा
  • परमेश्वर में आनंद
  • हमारा परमेश्वर में आनंदित होने का उसकी महिमा से सम्बन्ध
  • सदा के लिए

हमारा उद्देश्य

हम परमेश्वर के लिए अस्तित्त्व में लाएं गए हैं।

ये ब्रहम्माण्ड आपके और मेरे लिए लिए नहीं बनाया गया। परमेश्वर के लिए बनाया गया है। इस सृष्टि का केंद्र मनुष्य नहीं, परमेश्वर है। सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए है। चुने हुए लोग स्वर्ग में आकर उसके प्रेम और अनुग्रह की महिमा करेंगे और नरक में सजा काटने वाले लोग उसके न्याय के लिए उसकी महिमा करेंगे।

क्योंकि उसी की ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिये सब कुछ है। उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे : आमीन। (रोमियों 11:36)

क्योंकि उसी में सारी वस्तुओं की सृष्‍टि हुई, स्वर्ग की हों अथवा पृथ्वी की, देखी या अनदेखी, क्या सिंहासन, क्या प्रभुताएँ, क्या प्रधानताएँ, क्या अधिकार, सारी वस्तुएँ उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं। (कुलुस्सियों 1:16)

इस प्रजा को मैं ने अपने लिये बनाया है कि वे मेरा गुणानुवाद करें। (यशायाह 43:1)

तो इसमें कौन सी आश्‍चर्य की बात है कि परमेश्‍वर ने अपना क्रोध दिखाने और अपनी सामर्थ्य प्रगट करने की इच्छा से क्रोध के बरतनों की, जो विनाश के लिये तैयार किए गए थे, बड़े धीरज से सही; और दया के बरतनों पर, जिन्हें उसने महिमा के लिये पहले से तैयार किया, अपने महिमा के धन को प्रगट करने की इच्छा की? (रोमियों 9:22-23)

यहोवा ने सब वस्तुएँ विशेष उद्देश्य के लिये
बनाई हैं, वरन् दुष्‍ट को भी विपत्ति भोगने
के लिये बनाया है। (नीतिवचन 16:4)

 

परमेश्वर की महिमा

सभी मसीही परमेश्वर की महिमा के बारे में दिन में दस बार बात करते तो हैं, लेकिन सभी समझते नहीं की परमेश्वर की महिमा का मतलब क्या होता है। आइए हम उसकी महिमा के विषय में बात करें।

परमेश्वर स्वयं में और स्वयं के द्वारा ही समस्त जीवन, महिमा, धन्यता (आनंद) का धनी है, स्वयं में और स्वयं के लिए अकेला, सर्व-पर्याप्त है जिसको अपने बनाये किसी प्राणी की आवश्यकता नहीं है; नाही वो उनसे महिमा को प्राप्त करता है, बल्कि अपनी स्वयं की महिमा को उनमें, उनके द्वारा, उनके प्रति, और उन पर प्रकट करता है। (1689 लन्दन बैप्टिस्ट विश्वास का अंगीकार)

1689 लन्दन बैप्टिस्ट विश्वास परमेश्वर के वचन के प्रति वफादार रहते हुए हमें बताता है कि परमेश्वर अपनी सृष्टि से महिमा नहीं लेता, बल्कि अपनी स्वयं की महिमा को उनमें, उनके द्वारा, उनके प्रति, और उन पर प्रकट करता है। इस उद्धरण में हम परमेश्वर की दो तरह की महिमाओं को देखते हैं।

  • तात्विक महिमा (Essential Glory)
  • प्रकटीकृत महिमा (Manifestative Glory)

तात्विक महिमा (Essential Glory)

परमेश्वर की तात्विक महिमा वो महिमा है जो उसके अनादि-अनंत अस्तित्व में पाई जाती है, उसे कोई काम या ज्यादा नहीं कर सकता। ए. डब्ल्यू. पिंक इस महिमा के विषय में कहते हैं :

जब परमेश्वर ने (इनकी) सृष्टि की तो उसमे तत्वतः (या उसके अस्तित्व में) कुछ जुड़ा नहीं। वह नहीं बदलता (मला. 3:6), इसलिए उसकी तात्त्विक महिमा को न तो बढ़ाया जा सकता है और न ही कम किया जा सकता है। -ए. डब्ल्यू. पिंक

नहे. 9:5 कहता है कि परमेश्वर सब धन्यवाद और स्तुति से परे है। उसे हम क्या देंगे जो सब को सब कुछ देता है (प्रेरितों 17:25) ?

 “खड़े हो, अपने परमेश्‍वर यहोवा को अनादिकाल से अनन्तकाल तक धन्य कहो। तेरा महिमायुक्‍त नाम धन्य कहा जाए, जो सब धन्यवाद और स्तुति से परे है।” (नहे. 9:5)।

मनुष्यों कि धार्मिकता या अधार्मिकता सिर्फ उनके जैसे मनुष्यों को प्रभावित करती है, परमेश्वर सृष्टि से अप्रभावित रहता है।

यदि तू ने पाप किया है तो परमेश्‍वर का
क्या बिगड़ता है?
यदि तेरे अपराध बहुत बढ़ जाएँ तौभी तू
उसका क्या कर लेगा?
यदि तू धर्मी है तो उसको क्या दे देता है;
या उसे तेरे हाथ से क्या मिल जाता है?
तेरी दुष्‍टता का फल तुझ जैसे पुरुष के लिये है,
और तेरे धर्म का फल भी मनुष्य मात्र
के लिये है। (अय्यूब 35:6-8)

प्रभु येशु मसीह ने स्वयं ने हमें सिखाया कि हम सब वफ़ादारी के साथ अपनी सेवा पूरी करने के बाद भी उसके लिए तो निकम्मे ही हैं। हम से उसे कोई लाभ नहीं पहुँचता।

तुम भी जब उन सब कामों को कर चुको जिसकी आज्ञा तुम्हें दी गई थी, तो कहो, ‘हम निकम्मे (अलाभप्रद) दास हैं” (लूका 17:10)

यहाँ तक कि येशु मसीह के देहधारण और उसके द्वारा किये उद्धार के कार्य के द्वारा भी उसकी तात्विक महिमा में कुछ जुड़ा नहीं, क्योंकि उसकी तात्विक महिमा तो अनंत है। परमेश्वर अपरिवर्तनशील है। हम फिर से ए. डब्ल्यू. पिंक को उद्धृत करेंगे :

हम और आगे बढ़ते हैं: हमारे प्रभु यीशु मसीह ने जो किया या सहा, उसके द्वारा उसने परमेश्वर के तात्विक अस्तित्व ओर महिमा (essential being and glory) में कुछ भी नहीं जोड़ा। यह सत्य है, महिमावान रूप से  सत्य है कि  उसने परमेश्वर की महिमा को हम पर प्रकट किया, लेकिन उसने परमेश्वर में कुछ जोड़ा नहीं। वह स्वयं स्पष्ट रूप से ऐसा घोषित करता है, “मेरी भलाई तुझ तक नहीं पहुँचती” (भजन 16:2)। वह पूरा भजन मसीह का भजन है। मसीह की भलाई या धार्मिकता पृथ्वी पर उसके संतों तक पहुँची (भजन 16:3), परन्तु परमेश्वर इस सबसे ऊपर और परे था। -ए. डब्ल्यू. पिंक

प्रकटीकृत महिमा (Manifestative Glory): 

धन्यवाद के बलिदान का चढ़ानेवाला मेरी महिमा करता है। (भजन संहिता 50:23)

उसने बड़े शब्द से कहा, “परमेश्‍वर से डरो, और उसकी महिमा करो (प्रकाशितवाक्य 14:7)

इसलिये तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो। (1 कुरिन्थियों 10:31)

जब बाइबिल हमें परमेश्वर की महिमा करने की या उसको महिमा देने की आज्ञा देती है, तो उसका अर्थ यह नहीं की हम परमेश्वर को कुछ दे सकते हैं। वो ग्लोरी डेफिशियंसी सिंड्रोम से ग्रसित नहीं है कि अपनी कमी को पूरा करने के लिए हमसे महिमा पाने का इंतज़ार कर रहा हो। दुर्भाग्य की बात है छिछले मसीही ऐसा ही कुछ सोचते हैं। उसको महिमा देने का अर्थ यह नहीं की हम उसे दे रहें हैं, बल्कि यह कि उसकी इस सृष्टि में और उसके कार्यों में और पवित्र शास्त्र में प्रकट महिमा को हम पहचान कर अपने घुटने उसके सामने टेक देते हैं, उसकी अतुलनीयता का अंगीकार करते हैं और उसके वचन के अनुसार चलने के लिए उसके सामने समर्पण कर देते हैं। ए. डब्ल्यू. पिंक फिर से हमारी मदद करेंगे:

यह सत्य है कि परमेश्वर का आदर और अपमान मनुष्य द्वारा किया जाता है- उसके तात्विक अस्तित्व (essential being) में नहीं, लेकिन उसके आधिकारिक/प्रशासकीय चरित्र (official character) में। यह भी उतना ही सच है कि परमेश्वर सृष्टि, इसकी देखभाल और उद्धार के काम के द्वारा महिमान्वित होता है। हम एक पल के लिए भी इस सत्य के खिलाफ होने की हिम्मत नहीं कर सकते। लेकिन इन सबका संबंध उसकी प्रकट महिमा (manifestative glory) और हमारे द्वारा इसको पहचानने जाने से है।  यदि परमेश्वर चाहता तो अनंत काल तक अकेला ही रहता और प्राणियों (को बना कर उन) पर अपनी महिमा प्रकट नहीं करता। उसे ऐसा करना चाहिए था या नहीं- यह उसने केवल अपनी ही इच्छा से निर्धारित किया। वह पहले प्राणी को अस्तित्व में लाने से पहले भी अपने आप में पूरी तरह से धन्य (परम आनंदित और परम संतुष्ट) था। -ए. डब्ल्यू. पिंक

 

परमेश्वर में आनंदित

परमेश्वर में आनंदित होने का अर्थ होता है :

  • परमेश्वर की लालसा करना; उसके लिए तड़पना।
  • परमेश्वर को अपनी मुख्य भलाई जानकार उसमें विश्राम पाना।
  • परमेश्वर को परम आनंद और पूर्ण संतुष्टि का सोता जानकार उसमे से पीना।

स्वर्ग में मेरा और कौन है?
तेरे संग रहते हुए मैं पृथ्वी पर और कुछ
नहीं चाहता।
मेरे हृदय और मन दोनों तो हार गए हैं,
परन्तु परमेश्वर सर्वदा के लिये मेरा भाग
और मेरे हृदय की चट्टान बना है। (भजन 73:25-26)

हे मेरे प्राण, तू अपने विश्रामस्थान में लौट आ (भजन संहिता 116:7)

तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है,
तेरे दाहिने हाथ में सुख सर्वदा बना
रहता है। (भजन संहिता 16:11)

 

हमारा परमेश्वर में आनंदित होने का उसकी महिमा से सम्बन्ध

मसीहियत बाहरी धार्मिक गतिविधियों का धर्म नहीं है, बल्कि दिल का धर्म है। अर्थात एक सच्चा मसीही परमेश्वर से अपने दिल से, अपनी भावनाओं से, अपने अंतर्मन से, अपने आत्मा से प्रेम करता है और उसमे आनंदित होता है, उसमे मगन रहता है, उसमे घमंड करता है, उसके बारे में डींग भरता है, उसकी प्रशंसा करता है, उसके गीत गाता है, उसको निहारता है, उस पर मनन करता है, उसकी लालसा करता है, उसके बिना बेक़रार रहता है, उसके साथ समय बिताता है, उसके बारे में सोचता रहता है, उसके बारे मैं दूसरों से बातें करता है और उसको प्रसन्न करने और उसका सम्मान करने के लिए अपने प्राण तक बिछा कर रखता है। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि बाइबल सम्मत बाहरी गतिविधियों का अपना महत्तव नहीं होता, परन्तु मैं यह कह रहा हूँ यदि बाहरी गतिविधियां दिल से और हर्ष से नहीं है तो व्यर्थ है। फरीसियों का धर्म व्यर्थ था, क्योंकि वो मंदिर जाते थे, प्रार्थना-उपवास करते थे, दान देते थे और अन्य धार्मिक क्रिया कलाप करते थे, लेकिन उनके दिल में परमेश्वर के लिए कोई लालसा और प्यार नहीं था, वे परमेश्वर में आनंदित नहीं थे, वे परमेश्वर में घमंड नहीं करते थे। वो ऐसे थे जैसे आत्मा बिना शरीर। हमको धार्मिक क्रिया-कलाप फरीसियों कि तरह नहीं करना चाहिए, बल्कि हमारे बाहरी क्रिया-कलाप हमारे दिल, हमारे आत्मा, परमेश्वर के लिए हमारी लालसा, परमेश्वर में हमारे आनंद और परमेश्वर में हमारे घमंड की अभिव्यक्ति होने चाहिए। इसको इस तरह समझने कि कोशिश करें:

यदि मेरी पत्नी मेरे घर आते ही रोबोट कि तरह मुझसे गले मिले, मुझे चुम्बन करे, मुझे पानी पिलाये और खाना खिलाये, लेकिन उसका दिल मेरे घर आने पर हर्षित ना हो, तो क्या उसका मेरे प्रति समर्पण असली होगा? क्या उसके क्रिया कलापों से मुझे सम्मान मिलेगा? क्या मैं इससे प्रसन्न होऊंगा ? नहीं, क्योंकि उसका दिल इन सब गतिविधियों में नहीं है।

यदि मैं अपनी पत्नी के लिए एक गुलाब का फूल लेकर आऊं और उसको गले लगाऊं और चुम्बन करूँ और जब वह पूछे कि मैं ये सब क्यों कर रहा हूँ और मेरा जवाब हो, क्योंकि ये मेरा कर्त्तव्य है, तो क्या मेरा मेरी पत्नी के प्रति मेरा समर्पण और प्यार असली है ? क्या इससे उसको सम्मान मिल रहा है ? क्या मेरे बाहरी क्रिया कलाप से वो प्रसन्न होगी ? नहीं कदापि नहीं, क्योंकि यद्यपि मैं कुछ गतिविधियां कर रहा हूँ पर मेरा दिल और मन और आनंद मेरी पत्नी मैं नहीं है।

पति पत्नी एक दूसरे से क्या चाहते हैं ? एक दूसरे का दिल। परमेश्वर हमसे क्या चाहता है? हमारा दिल, हमारी भावनाएं, हमारी लालसा, हमारा आनंद, हमारा प्यार :

हे मेरे पुत्र, मुझे अपना दिल दे दे। (नीतिवचन  23:26)

तू अपने परमेश्‍वर यहोवा से अपने सारे मन, और सारे जीव, और सारी शक्‍ति के साथ प्यार कर । (व्यवस्थाविवरण 6:5)

यहोवा में आनंदित हो। (भजन सहिंता  34:4)

याद रहे परमेश्वर हममे सिर्फ उतनी महिमा पाता है, जितना हम उसमें आनंदित होते हैं। यदि हम उसमे आनंदित नहीं हैं तो उसे तुच्छ जानते हैं और उसका निरादर करते हैं।

 

सदा के लिए

हमारा उत्तर था: मनुष्य का मुख्य उद्देश्य सदा के लिए परमेश्वर की महिमा करना और उसमे आनंदित रहना है। हम मनुष्य के उद्देश्य, परमेश्वर की महिमा करने और उसमे आनंदित रहने के विषय में बात कर चुके हैं। लेकिन एक चीज़ बची है, अर्थात क्रिया विशेषण: सदा के लिए। पापी मनुष्य जो पाप में मरे हुए हैं और परमेश्वर को नहीं खोजते, वो कैसे सदा के लिए परमेश्वर की महिमा कर सकते हैं और उसमे आनंदित रह सकते हैं ? यीशु मसीह के द्वारा। जो कोई परमेश्वर के बेटे यीशु मसीह के पास आएगा वो सदा के लिए परमेश्वर का बच्चा बन जायेगा और सदा के लिए परमेश्वर कि महिमा करेगा और उसमे सुखी रहेगा:

यदि कोई प्यासा हो तो मेरे पास आए और पीए। जो मुझ पर विश्‍वास करेगा, जैसा पवित्रशास्त्र में आया है, ‘उसके हृदय में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी’ (यूहन्ना 7:37-38)

परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।” (यूहन्ना 4:14)

 

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