स्पर्जन प्रश्नोत्तरी (Spurgeon’s Catechism)

मसीही धार्मिक प्रश्नोत्तरी के लाभ

  • मसीही धार्मिक प्रश्नोत्तरी बाइबल की मूल शिक्षाओं का विश्वासयोग्य सार है।
  • मसीही धार्मिक प्रश्नोत्तरी सही शिक्षा को बढ़ावा देती है।
  • मसीही धार्मिक प्रश्नोत्तरी नई और गलत शिक्षाओं से रक्षा करती है।
  • मसीही धार्मिक प्रश्नोत्तरी मसीही जीवन के लिए एक मजबूत नीवं डालती है।
  1. मनुष्य का मुख्य उद्देश्य क्या है ?

उत्तर: मनुष्य का मुख्य उद्देश्य सदा के लिए परमेश्वर की महिमा करना और उसमे आनंदित रहना है। (1 कुरिन्थियों 10:31; भजन  73:25-26)

साक्षी आयतें:

इसलिये तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो। (1 कुरिन्थियों 10:31)

 स्वर्ग में मेरा और कौन है?

तेरे संग रहते हुए मैं पृथ्वी पर और कुछ

नहीं चाहता।

मेरे हृदय और मन दोनों तो हार गए हैं,

परन्तु परमेश्वर सर्वदा के लिये मेरा भाग

और मेरे हृदय की चट्टान बना है। (भजन  73:25-26)

 

  1. परमेश्वर ने कौनसा अधिकृत साधन दिया है जो हमे सिखाता है कि उसकी महिमा कैसे करें और उसमें आनंदित कैसे रहें?

उत्तर: पुराने नियम और नए नियम के पवित्रशास्त्र में निहित परमेश्वर का वचन (इफिसियों 2:20; 2 तीमुथियुस 3:16) ही एक मात्र अधिकृत साधन है जो सिखाता है कि हम कैसे उसकी महिमा करें और उसमें आनंदित रहें (1 यूहन्ना 1:3)।

साक्षी आयतें:

और प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव पर, जिसके कोने का पत्थर मसीह यीशु स्वयं ही है, बनाए गए हो। इफिसियों 2:20)

 सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिये लाभदायक है। (2 तीमुथियुस 3:16)

जो कुछ हम ने देखा और सुना है उसका समाचार तुम्हें भी देते हैं, इसलिये कि तुम भी हमारे साथ सहभागी हो; और हमारी यह सहभागिता पिता के साथ और उसके पुत्र यीशु मसीह के साथ है। (1 यूहन्ना 1:3)

 

  1. पवित्रशास्त्र मुख्य रूप से क्या सिखाता है ?

उत्तर: पवित्र शास्त्र मुख्य रूप से यह सिखाता है कि मनुष्य को परमेश्वर के विषय में क्या विश्वास करना है और मनुष्य के परमेश्वर के प्रति क्या कर्तव्य हैं। (2 तीमुथियुस 1:13; सभोपदेशक 12:13)

साक्षी आयतें:

जो खरी बातें तू ने मुझ से सुनी हैं उनको उस विश्वास और प्रेम के साथ, जो मसीह यीशु में है, अपना आदर्श बनाकर रख। (2 तीमुथियुस 1:13)

सब कुछ सुना गया; अन्त की बात यह है कि परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर; क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्तव्य यही है। (सभोपदेशक 12:13)

 

  1. परमेश्वर क्या है?

उत्तर: परमेश्वर आत्मा है  (यूहन्ना 4:24), जो कि अपने अस्तित्व (निर्गमन 3:14), बुद्धि, सामर्थ (भजन सहिंता 147:5) , पवित्रता  (प्रकाशितवाक्य 4:8), न्याय, भलाई और सच्चाई (निर्गमन 34:6-7) में अनंत (अय्यूब 11:7), अनादि, अमर (भजन 90:2; 1 तीमुथियुस 1:17), और अपरिवर्तनशील (याकूब1:17)  है।

साक्षी आयतें:

परमेश्‍वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसकी आराधना करनेवाले आत्मा और सच्‍चाई से आराधना करें। (यूहन्ना 4:24)

 परमेश्‍वर ने मूसा से कहा, “मैं जो हूँ सो हूँ।” फिर उसने कहा, “तू इस्राएलियों से यह कहना, ‘जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है’।” (निर्गमन 3:14)

हमारा प्रभु महान् और अति सामर्थी है;

उसकी बुद्धि अपरम्पार है। (भजन 147:5)

 चारों प्राणियों के छ: छ: पंख हैं, और चारों ओर और भीतर आँखें ही आँखें हैं; और वे रात दिन बिना विश्राम लिये यह कहते रहते हैं,

पवित्र, पवित्र, पवित्र प्रभु परमेश्‍वर,

सर्वशक्‍तिमान,

जो था और जो है और जो आनेवाला

है।” (प्रकाशितवाक्य 4:8)

 यहोवा उसके सामने होकर यों प्रचार करता हुआ चला, “यहोवा, यहोवा, ईश्‍वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करुणामय और सत्य, हज़ारों पीढ़ियों तक निरन्तर करुणा करनेवाला, अधर्म और अपराध और पाप का क्षमा करनेवाला है, परन्तु दोषी को वह किसी प्रकार निर्दोष ठहराएगा; वह पितरों के अधर्म का दण्ड उनके बेटों वरन् पोतों और परपोतों को भी देनेवाला है।” (निर्गमन 34:6-7)

 क्या तू परमेश्‍वर का गूढ़ भेद पा सकता है?

क्या तू सर्वशक्‍तिमान का मर्म पूरी रीति से

जाँच सकता है?” (अय्यूब 11:7)

 इससे पहले कि पहाड़ उत्पन्न हुए,

या तू ने पृथ्वी और जगत की रचना की,

वरन् अनादिकाल से अनन्तकाल तक

तू ही परमेश्‍वर है। (भजन 90:2)

 अब सनातन राजा अर्थात् अविनाशी, अनदेखे, एकमात्र परमेश्वर का आदर और महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।  ( 1 तीमुथियुस 1:17)

क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है।   (याकूब 1:17) 

 

  1. क्या एक से ज्यादा ईश्वर हैं ?

उत्तर: नहीं, केवल एक ही (व्यवस्थाविवरण 6:4) जीवित और सच्चा परमेश्वर (यिर्मयाह 10:10) है।

साक्षी आयतें:

हे इस्राएल, सुन, यहोवा हमारा परमेश्‍वर है, यहोवा एक ही है (व्यवस्थाविवरण 6:4)

 परन्तु यहोवा वास्तव में परमेश्वर है; जीवित परमेश्वर और सदा का राजा वही है। उसके प्रकोप से पृथ्वी काँपती है, और जाति जाति के लोग उसके क्रोध को सह नहीं सकते। (यिर्मयाह 10:10)

 

  1. परमेश्वरत्व में कितने व्यक्ति हैं ?

उत्तर: परमेश्वरत्व में तीन व्यक्ति हैं: पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा।  ये तीनों एक परमेश्वर है: अस्तित्व में एक समान और सामर्थ और महिमा में बराबर। (1 यूहन्ना 5:7; मत्ती 28:19)

साक्षी आयतें:

स्वर्ग में गवाही देनेवाले तीन हैं, पिता, वचन, और पवित्र आत्मा; और ये तीनों एक हैं। (1 यूहन्ना 5:7)

 इसलिये तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ; और उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो (मत्ती 28:19)

 

  1. परमेश्वर के विधान (decrees) क्या हैं ?

उत्तर: परमेश्वर के विधान उसकी अपनी ही इच्छा के मत के अनुसार अनादि उद्देश्य हैं, जिसके द्वारा उसने जो कुछ भी होता है, उस सब को पूर्वनिर्धारित किया है। (इफिसियों 1:11-12)

साक्षी आयतें:

उसी में जिसमें हम भी उसी की मनसा से जो अपनी इच्छा के मत के अनुसार सब कुछ करता है, पहले से ठहराए जाकर मीरास बने कि हम, जिन्होंने पहले से मसीह पर आशा रखी थी, उसकी महिमा की स्तुति के कारण हों। (इफिसियों 1:11-12)

 

  1. परमेश्वर अपने विधानों (decrees) को कैसे पूरा करता है ?

उत्तर: परमेश्वर अपने विधानों को सृष्टि निर्माण  (प्रकाशितवाक्य 4:11) और उसके   प्रबंधन  (रखरखाव) (दानिय्येल 4:35) के कामों में पूरा करता है ?

साक्षी आयतें:

हे हमारे प्रभु और परमेश्‍वर, तू ही महिमा

और आदर और सामर्थ्य के योग्य है;

क्योंकि तू ही ने सब वस्तुएँ सृजीं और वे

तेरी ही इच्छा से थीं और सृजी गईं।”

 (प्रकाशितवाक्य 4:11)

 

पृथ्वी के सब रहनेवाले उसके सामने

तुच्छ गिने जाते हैं,

और वह स्वर्ग की सेना और पृथ्वी के

रहनेवालों के बीच

अपनी ही इच्छा के अनुसार काम करता है;

और कोई उसको रोककर उस से नहीं

कह सकता है, “तू ने यह क्या किया है?”

 (दानिय्येल 4:35)

 

  1. सृष्टि निर्माण का कार्य क्या है ?

उत्तर: परमेश्वर के द्वारा बिना किसी वस्तु के अपनी सामर्थ के वचन (इब्रानियों 11:3) के द्वारा छः सामान्य निरंतर दिनों में ((उत्पत्ति 1:31) सब कुछ,(उत्पत्ति 1:1) जो बहुत अच्छा (उत्पत्ति 1:31) था बनाये जाने को सृष्टि निर्माण का कार्य कहते हैं।

 साक्षी आयतें:

विश्वास ही से हम जान जाते हैं कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। पर यह नहीं कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो।  (इब्रानियों 11:3)

 आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।  (उत्पत्ति 1:1)

तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार छठवाँ दिन हो गया। (उत्पत्ति 1:31)

 

  1. परमेश्वर ने मनुष्य की रचना कैसे की?

उत्तर: परमेश्वर ने मनुष्य की रचना अपने ही स्वरुप में  पुरुष और स्त्री करके (उत्पत्ति 1:27), ज्ञान, धार्मिकता, और पवित्रता से लैस करके (कुलुस्सियों 3:10; इफिसियों 4:24) और सृष्टि के ऊपर शासक के रूप में की (उत्पत्ति1:28)।

साक्षी आयतें:

तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया; नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।  (उत्पत्ति 1:27) 

 और नए मनुष्यत्व को पहिन लिया है, जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप् करने के लिये नया बनता जाता है। (कुलुस्सियों  3:10)

और नये मनुष्यत्व को पहिन लो जो परमेश्वर के अनुरूप सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है।  (इफिसियों  4:24)

और परमेश्वर ने उनको आशीष दी, और उनसे कहा, “फूलोफलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो।“ (उत्पत्ति 1:28)

 

  1. परमेश्वर के प्रबंधन (सृष्टि के रख-रखाव) के कार्य क्या हैं ?

उत्तर: परमेश्वर के द्वारा उसकी परम पवित्रता  (भजन सहिंता 145:17), बुद्धि (यशायाह 28:29) और सामर्थ (इब्रानियों 1:3) के साथ सब प्राणियों को जीने और उनके सब कार्य करने की शक्ति देने और उन पर प्रभुता करने को प्रबंधन के कार्य कहा जाता है (भजन सहिंता  103:19; मत्ती10:29)।

साक्षी आयतें:

यहोवा अपनी सब गति में धर्मी

और अपने सब कामों में करुणामय है। (भजन सहिंता 145:17)

 यह भी सेनाओं के यहोवा की ओर से नियुक् हुआ है; वह अद्भुत युक्तिवाला और महाबुद्धिमान है।  (यशायाह 28:29)

वह उसकी महिमा का प्रकाश और उसके तत्व की छाप है, और सब वस्तुओं को अपनी सामर्थ्य के वचन से संभालता है। वह पापों को धोकर ऊँचे स्थानों पर महामहिमन् के दाहिने जा बैठा  (इब्रानियों 1:3)

यहोवा ने तो अपना सिंहासन स्वर्ग में

स्थिर किया है,

और उसका राज्य पूरी सृष्‍टि पर है। (भजन सहिंता  103:19)

 क्या पैसे में दो गौरैयें नहीं बिकतीं? तौभी तुम्हारे पिता की इच्छा के बिना उनमें से एक भी भूमि पर नहीं गिर सकती।  (मत्ती 10:29)

 

  1. मनुष्य को बनाने पर उसकी सृष्टिगत अवस्था में परमेश्वर ने उसके सामने क्या विधान या व्यवस्था रखी ?

उत्तर: मनुष्य को बनाने पर परमेश्वर ने उसके साथ सिद्ध आज्ञापालन की शर्त पर जीवन की वाचा बनाई (गलातियों 3:12)  और भले और बुरे के ज्ञान के फल को खाने से मना किया, जिसको ना मानने की सजा मृत्यु ठहराई (उत्पत्ति  2:17)।

साक्षी आयतें:

पर व्यवस्था का विश्वास से कोई सम्बन्ध नहीं; क्योंकिजो उनको मानेगा, वह उनके कारण जीवित रहेगा।” (गलातियों 3:12)

 पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी खाना : क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।”  (उत्पत्ति  2:17)

 

  1. क्या हमारे माता पिता उस अवस्था में बने रहे, जिसमे उनकी सृष्टि हुई थी ?

उत्तर: अपनी स्वतंत्र इच्छा पर छोड़ दिए जाने पर हमारे प्रथम माता-पिता ने वर्जित फल खाकर  (उत्पत्ति 3:6-8) परमेश्वर के खिलाफ पाप किया  (सभोपदेशक 7:29) और उस अवस्था से गिर गए जिसमे उनको बनाया गया था।

साक्षी आयतें:

अत: जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने के लिए अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहनेयोग्य भी है; तब उसने उसमें से तोड़कर खाया, और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया। तब उन दोनों की आँखें खुल गईं, और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे हैं; इसलिए उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिये। तब यहोवा परमेश्वर, जो दिन के ठंडे समय वाटिका में फिरता था, का शब्द उनको सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए। (उत्पत्ति 3:6-8)

 देखो, मैं ने केवल यह बात पाई है कि परमेश्वर ने मनुष्य को सीधा बनाया, परन्तु उन्होंने बहुत सी युक्तियाँ निकाली हैं। (सभोपदेशक 7:29)

 

  1. पाप क्या है ?

उत्तर: पमेश्वर के क़ानून/व्यवस्था को ना मानना या तोड़ना पाप है (1 यूहन्ना 3:4)।

साक्षी आयतें:

जो कोई पाप करता है, वह व्यवस्था का विरोध करता है; और पाप तो व्यवस्था का विरोध है।  (1 यूहन्ना 3:4)

 

  1. क्या आदम के पाप में सम्पूर्ण मनुष्य जाति पतित हो (गिर) गई ?

उत्तर: आदम के साथ बाँधी गई वाचा सिर्फ उसके लिए नहीं थी, परन्तु उसके सम्पूर्ण वंश के लिए भी थी। सामान्य प्रजनन के द्वारा उससे उत्पन्न सम्पूर्ण मनुष्य जाति ने उसमे पाप किया और उसके पाप में पतित हो गए।  (1 कुरिन्थियों 15:22; रोमियों 5:12)

साक्षी आयतें:     

और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसे ही मसीह में सब जिलाए जाएँगे  (1 कुरिन्थियों 15:22)

 इसलिये जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई, और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, क्योंकि सब ने पाप किया। ( रोमियों 5:12)

 

  1. पतन मनुष्य जाति को किस अवस्था में ले आया ?

उत्तर: पतन मनुष्य जाति  को पाप और दुर्गति की अवस्था में ले आया (रोमियों 5:18)।

साक्षी आयतें:

इसलिये जैसा एक अपराध सब मनुष्यों के लिये दण्ड की आज्ञा का कारण हुआ, वैसा ही एक धर्म का काम भी सब मनुष्यों के लिये जीवन के निमित्त धर्मी ठहराए जाने का कारण हुआ।  (रोमियों 5:18)

 

  1. उस अवस्था की पापमयता किन बातों में निहित है, जिसमें मनुष्य गिर गया ?

उत्तर: जिस अवस्था में मनुष्य गिरा, उस अवस्था की पापमयता आदम के प्रथम पाप के दोष (रोमियों 5:19), मूल धार्मिकता की कमी (रोमियों  3:10), सम्पूर्ण स्वभाव की भ्रष्टता, जिसे सामान्य रूप से मूल पाप कहा जाता है (इफिसियों 2:1; भजन सहिंता 51:5)  और वो सारे पाप जो इसमें से निकलते हैं (मत्ती 15:19), में निहित है।

साक्षी आयतें:

क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे। (रोमियों 5:19)

 जैसा लिखा है :

कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं।  (रोमियों  3:10)

 उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे (इफिसियों 2:1)

 देख, मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ,

और पाप के साथ अपनी माता के गर्भ

में पड़ा।  ( भजन सहिंता 51:5) 

 क्योंकि बुरे विचार, हत्या, परस्त्रीगमन, व्यभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्दा मन ही से निकलती है। (मत्ती 15:19)

 

  1. मनुष्य जिस अवस्था में गिरा, उसमे क्या दुर्गति है ?

उत्तर: पतन के कारण सम्पूर्ण मनुष्य जाति का परमेश्वर के साथ रिश्ता टूट गया  (उत्पत्ति 3:8,24), वे उसके क्रोध और शाप के अंतर्गत आ गए (इफिसियों  2:3; गलातियों 3:10) और इस जीवन के सम्पूर्ण दुखों,  मृत्यु और  फिर नरक की सदाकालीन  पीड़ाओं  के भागी हो गए (रोमियों  6:23; मत्ती 25:41)।

साक्षी आयतें:

तब यहोवा परमेश्‍वर, जो दिन के ठंडे समय  में वाटिका में फिरता था, का शब्द उनको सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी वाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्‍वर से छिप गए। (उत्पत्ति 3:8)

 इसलिये आदम को उसने निकाल दिया और जीवन के वृक्ष के मार्ग का पहरा देने के लिये अदन की वाटिका के पूर्व की ओर करूबों को, और चारों ओर घूमनेवाली ज्वालामय तलवार को भी नियुक्‍कर दिया। (उत्पत्ति 3:24)

इनमें हम भी सब के सब पहले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे, और शरीर और मन की इच्छाएँ पूरी करते थे, और अन्य लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे। (इफिसियों  2:3)

इसलिये जितने लोग व्यवस्था के कामों पर भरोसा रखते हैं, वे सब शाप के अधीन हैं, क्योंकि लिखा है, “जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह शापित है।” (गलातियों 3:10)

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्‍वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है। (रोमियों  6:23)

तब वह बाईं ओर वालों से कहेगा, ‘हे शापित लोगो, मेरे सामने से उस अनन्त आग में चले जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है। (मत्ती 25:41)

 

  1. क्या परमेश्वर ने समस्त मानव जाति को पाप और दुर्गति की अवस्था में नाश होने के लिए छोड़ दिया ?

उत्तर: परमेश्वर ने अनंत में अपनी ही सुइच्छा से कुछ लोगों को अनंत जीवन देने के लिए चुन लिया  (2  थिस्सलुनीकियों 2:13) और उन्हें पाप और दुर्गति से निकालने और एक उद्धारकर्ता के द्वारा उद्धार की अवस्था में लाने के लिए उनके साथ अनुग्रह की वाचा में प्रवेश किया (रोमियों 5:21)।

साक्षी आयतें:

हे भाइयो, और प्रभु के प्रिय लोगो, चाहिये कि हम तुम्हारे विषय में सदा परमेश्‍वर का धन्यवाद करते रहें, क्योंकि परमेश्‍वर ने आदि से तुम्हें चुन लिया कि आत्मा के द्वारा पवित्र बनकर, और सत्य की प्रतीति करके उद्धार पाओ, (2  थिस्सलुनीकियों 2:13)

 कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे। (रोमियों 5:21)

 

  1. परमेश्वर के चुने हुओं का उद्धारकर्ता कौन है?

उत्तर: परमेश्वर के चुने हुओं का एक मात्र उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह है (1 तीमुथियस 2:5), जो की परमेश्वर का अनादि बेटा होते हुए भी मनुष्य बन गया (यूहन्ना 1:14)।  वो परमेश्वर और मनुष्य था और है: सदा के लिए एक व्यक्ति में दो भिन्न स्वभाव (1 तीमुथियस 3:16; कुलुस्सियों 2:9)।

 साक्षी आयतें:

क्योंकि परमेश्‍वर एक ही है, और परमेश्‍वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात् मसीह यीशु जो मनुष्य है। (1 तीमुथियस 2:5)

और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्‍चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा।  (यूहन्ना 1:14)

इसमें सन्देह नहीं कि भक्‍ति का भेद गम्भीर है, अर्थात्,

वह जो शरीर में प्रगट हुआ,

आत्मा में धर्मी ठहरा,

स्वर्गदूतों को दिखाई दिया,

अन्यजातियों में उसका प्रचार हुआ,

जगत में उस पर विश्‍वास किया गया,

और महिमा में ऊपर उठाया गया। (1 तीमुथियस 3:16)

 

क्योंकि उसमें ईश्‍वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है ( कुलुस्सियों 2:9)

 

  1. मसीह परमेश्वर का पुत्र होते हुए भी मनुष्य कैसे बन गया ?

उत्तर: परमेश्वर का पुत्र मसीह एक वास्तविक शरीर (इब्रानियों 2:14) और बुद्धिसम्पन्न (rational)  आत्मा (मत्ती 26:38; इब्रानियों 4:15) धारण  करने के द्वारा मनुष्य बना : वो पवित्र आत्मा की सामर्थ से कुवांरी मरियम के गर्भ में पड़ा और उससे जन्म लिया (लूका 1:31,35) (फिर भी) निष्पाप था  (इब्रानियों 7:26)।

साक्षी आयतें:

इसलिये जब कि लड़के मांस और लहू के भागी हैं, तो वह आप भी उनके समान उनका सहभागी हो गया, ताकि मृत्यु के द्वारा उसे जिसे मृत्यु पर शक्‍ति मिली थी, अर्थात् शैतान को निकम्मा कर दे;  (इब्रानियों 2:14)

 तब उसने उनसे कहा, “मेरा जी बहुत उदास है, यहाँ तक कि मेरा प्राण निकला जा रहा है। तुम यहीं ठहरो और मेरे साथ जागते रहो।” (मत्ती 26:38)

 क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दु:खी हो सके; वरन् वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला। (इब्रानियों 4:15)

 देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।  (लूका 1:31)

 स्वर्गदूत ने उसको उत्तर दिया, “पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ्य तुझ पर छाया करेगी; इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्‍वर का पुत्र कहलाएगा। (लूका 1:35)

 अत: ऐसा ही महायाजक हमारे योग्य था जो पवित्र, और निष्कपट, और निर्मल, और पापियों से अलग, और स्वर्ग से भी ऊँचा किया हुआ हो। (इब्रानियों 7:26)

 

  1. हमारे उद्धारकर्ता के रूप में मसीह कौनसे पदों पर कार्य करता है ?

उत्तर: दीनता और महिमा दोनों ही अवस्थाओं में मसीह हमारे उद्धारकर्ता के रूप में नबी (प्रेरितों 3:22), याजक (इब्रानियों 5:6) और राजा (भजन संहिता 2:6) के पदों पर कार्य करता है।

साक्षी आयतें:

जैसा कि मूसा ने कहा, ‘प्रभु परमेश्‍वर तुम्हारे भाइयों में से तुम्हारे लिये मुझ सा एक भविष्यद्वक्‍ता उठाएगा, जो कुछ वह तुम से कहे, उसकी सुनना। (प्रेरितों 3:22)

 इसी प्रकार वह दूसरी जगह में भी कहता है,

“तू मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिये

याजक है।” (इब्रानियों 5:6)

 

“मैं तो अपने ठहराए हुए राजा को अपने

पवित्र पर्वत सिय्योन की राजगद्दी पर बैठा

चुका हूँ।”(भजन संहिता 2:6)

 

  1. मसीह नबी के कार्य को कैसे पूरा करता है?

उत्तर: मसीह नबी के कार्य को हमारे उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को अपने वचन (यूहन्ना  20:31) और आत्मा (यूहन्ना 14:26) के द्वारा हम पर प्रकट करने के द्वारा (यूहन्ना 1:18)  पूरा करता है।

साक्षी आयतें:

परन्तु ये इसलिये लिखे गए हैं कि तुम विश्‍वास करो कि यीशु ही परमेश्‍वर का पुत्र मसीह है, और विश्‍वास करके उसके नाम से जीवन पाओ। (यूहन्ना 20:31)

 परन्तु सहायक अर्थात् पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा। (यूहन्ना 14:26)

 परमेश्‍वर को किसी ने कभी नहीं देखा, एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में है, उसी ने उसे प्रगट किया। (यूहन्ना 1:18) 

 

  1. मसीह याजक के कार्य को कैसे पूरा करता है?

उत्तर: मसीह याजक के कार्य को परमेश्वरीय न्याय को संतुष्ट करने  (इब्रानियों 9:28) और हमारा परमेश्वर से मेल-मिलाप करवाने (इब्रानियों 2:17) के लिए अपने आप को एक ही बार बलिदान होने के लिए देने के द्वारा और हमारे लिए निरंतर मध्यस्थता की प्रार्थना करने (इब्रानियों 7:25) के द्वारा पूरा करता है?

साक्षी आयतें:

वैसे ही मसीह भी बहुतों के पापों को उठा लेने के लिये एक बार बलिदान हुआ; और जो लोग उसकी बाट जोहते हैं उनके उद्धार के लिये दूसरी बार बिना पाप उठाए हुए दिखाई देगा। (इब्रानियों 9:28)

 इस कारण उस को चाहिए था, कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने; जिससे वह उन बातों में जो परमेश्‍वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्‍वासयोग्य महायाजक बने ताकि लोगों के पापों के लिये प्रायश्‍चित करे। (इब्रानियों 2:17)

 इसी लिये जो उसके द्वारा परमेश्‍वर के पास आते हैं, वह उनका पूरा पूरा उद्धार कर सकता है, क्योंकि वह उनके लिये विनती करने को सर्वदा जीवित है।  (इब्रानियों 7:25)

 

  1. मसीह राजा के कार्य को कैसे पूरा करता है?

उत्तर: मसीह राजा के कार्य को हमें अपने अधीन करने (भजन सहिंता 110:3), हम पर राज करने, हमारी रक्षा करने (मत्ती 2:6; यशायाह 33:22) और उसके और हमारे समस्त शत्रुओं को नियंत्रित करने और उनको पराजित करने (कुरुंथियों 15:25) के द्वारा  पूरा करता है।

साक्षी आयतें:

तेरी प्रजा के लोग तेरे पराक्रम के दिन

स्वेच्छाबलि बनते हैं;

तेरे जवान लोग पवित्रता से शोभायमान,

और भोर के गर्भ से जन्मी हुई ओस

के समान तेरे पास हैं। (भजन सहिंता 110:3)

 हे बैतलहम, तू जो यहूदा के प्रदेश में है, तू किसी भी रीति से यहूदा के अधिकारियों में सबसे छोटा नहीं; क्योंकि तुझ में से एक अधिपति निकलेगा, जो मेरी प्रजा इस्राएल की रखवाली करेगा।” (मत्ती 2:6)

 क्योंकि यहोवा हमारा न्यायी, यहोवा हमारा हाकिम, यहोवा हमारा राजा है, वही हमारा उद्धार करेगा। (यशायाह 33:22)

 क्योंकि जब तक वह अपने बैरियों को अपने पाँवों तले ले आए, तब तक उसका राज्य करना अवश्य है। (1 कुरुंथियों 15:25)

 

  1. मसीह की दीनता (Humiliation of Christ) किन-किन बातों में निहित है ?

उत्तर: मसीह के निम्न दशा में जन्माये जाने (लूका 2:7), व्यवस्था के अंतर्गत किये जाने  (गलातियों 4:4), इस जीवन के दुखों (यशायाह 53:3), परमेश्वर के क्रोध (मत्ती  27:46)  और क्रूस पर शापित मृत्यु को सहने (फिलिप्पियों 2:8), गाड़े जाने, और कुछ समय के लिए मृत्यु की शक्ति की अधीनता में रहने (मत्ती 12:40) में उसकी दीनता निहित है।

साक्षी आयतें:

और वह अपना पहिलौठा पुत्र जनी और उसे कपड़े में लपेटकर चरनी में रखा; क्योंकि उनके लिये सराय में जगह थी। (लूका 2:7)

 परन्तु जब समय पूरा हुआ, तो परमेश्‍वर ने अपने पुत्र को भेजा जो स्त्री से जन्मा, और व्यवस्था के अधीन उत्पन्न हुआ, (गलातियों 4:4)

 वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था; वह दु:खी पुरुष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी; और लोग उससे मुख फेर लेते थे। वह तुच्छ जाना गया, और हम ने उसका मूल्य जाना। (यशायाह 53:3)

 तीसरे पहर के निकट यीशु ने बड़े शब्द से पुकारकर कहा, “एली, एली, लमा शबक्‍तनी?” अर्थात्  “हे मेरे परमेश्‍वर, हे मेरे परमेश्‍वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती  27:46) 

 और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने

आप को दीन किया,

और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु,

हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली। (फिलिप्पियों 2:8)

 योना तीन रात दिन जल–जन्तु के पेट में रहा, वैसे ही मनुष्य का पुत्र तीन रात दिन पृथ्वी के भीतर  रहेगा । (मत्ती 12:40)

 

  1. मसीह का उन्नयन/महिमान्वित होना (Exaltation of Christ) किन-किन बातों में निहित है ?

उत्तर: मसीह का उन्नयन/ महिमान्वित  होना उसके तीसरे दिन मुर्दों में से जी उठने (1 कुरिन्थियों 15:4), उसके स्वर्ग पर चढ़ जाने और परमेश्वर पिता के दाहिने हाथ पर बैठ जाने (मरकुस 16:19) और अंतिम दिन संसार का न्याय करने के लिए आने  (प्रेरितों  17:31) में निहित है।

साक्षी आयतें:

और गाड़ा गया, और पवित्रशास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा  (1 कुरिन्थियों 15:4)

 प्रभु यीशु उनसे बातें करने के बाद स्वर्ग पर उठा लिया गया, और परमेश्‍वर की दाहिनी ओर बैठ गया। (मरकुस 16:19)

 क्योंकि उसने एक दिन ठहराया है, जिसमें वह उस मनुष्य के द्वारा धार्मिकता से जगत का न्याय करेगा, जिसे उसने ठहराया है, और उसे मरे हुओं में से जिलाकर यह बात सब पर प्रमाणित कर दी है।” (प्रेरितों  17:31)

 

  1. हम कैसे मसीह द्वारा ख़रीदे गए उद्धार के भागी बनाये जाते हैं ?

उत्तर: हम मसीह द्वारा ख़रीदे गए उद्धार के भागी पवित्र आत्मा द्वारा  (तीतुस 3:5-6) इस उद्धार को हम पर प्रभावशाली रूप से लागू कर देने  (यूहन्ना1:12) के द्वारा भागी बनाये जाते हैं।

साक्षी आयतें:

तो उसने हमारा उद्धार किया; और यह धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार नए जन्म के स्‍नान और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा हुआ। जिसे उसने हमारे उद्धारकर्ता यीशु मसीह के द्वारा हम पर अधिकाई से उंडेला। (तीतुस 3:5-6)

 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं।  (यूहन्ना 1:12)

 

  1. पवित्र आत्मा मसीह द्वारा ख़रीदे गए उद्धार को हम पर कैसे लागू करता है ?

उत्तर: पवित्र आत्मा  मसीह द्वारा ख़रीदे गए उद्धार को हम में विश्वास उत्पन्न करने (इफिसियों 2:8) और प्रभावशाली बुलाहट के द्वारा मसीह के साथ एक कर देने (इफिसियों 3:17; 1 कुरिन्थियों 1:9) के द्वारा लागू करता है।

साक्षी आयतें:

क्योंकि विश्‍वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है; और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्‍वर का दान है (इफिसियों 2:8)

 और विश्‍वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में बसे कि तुम प्रेम में जड़ पकड़कर और नेव डाल कर, (इफिसियों 3:17)

 परमेश्‍वर विश्‍वासयोग्य है, जिसने तुम को अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह की संगति में बुलाया है। (1 कुरिन्थियों 1:9)

 

  1. प्रभावशाली बुलाहट क्या है ?

उत्तर: प्रभावशाली बुलाहट परमेश्वर के आत्मा का वो काम है (2 तीमुथियस 1:9)  जिसके अंतर्गत वो हमे हमारे पाप और हमारी दुर्दशा के विषय में कायल करता है (प्रेरितों 2:37), हमारे दिलों को मसीह के ज्ञान के द्वारा प्रकाशित कर देता है (प्रेरितों 26:18), हमारी इच्छाओं को नयी बना देता है (यहेजकेल 36:26)  और सुसमाचार में बिना किसी कीमत के दिए गए यीशु मसीह  को ग्रहण करने के लिए हमें इच्छुक और समर्थ बना देता है (यूहन्ना 6:43-45)।

साक्षी आयतें:

जिसने हमारा उद्धार किया और पवित्र बुलाहट से बुलाया, और यह हमारे कामों के अनुसार नहीं; पर उसके उद्देश्य और उस अनुग्रह के अनुसार है जो मसीह यीशु में सनातन से हम पर हुआ है,  (2 तीमुथियस 1:9) 

 तब सुननेवालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, “हे भाइयो, हम क्या करें?” (प्रेरितों 2:37)

 कि तू उनकी आँखें खोले कि वे अंधकार से ज्योति की ओर, और शैतान के अधिकार से परमेश्‍वर की ओर फिरें; कि पापों की क्षमा और उन लोगों के साथ जो मुझ पर विश्‍वास करने से पवित्र किए गए हैं, मीरास पाएँ।’ (प्रेरितों 26:18)

 मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा, और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को मांस का हृदय दूँगा। (यहेजकेल 36:26) 

 यीशु ने उनको उत्तर दिया, “आपस में मत कुड़कुड़ाओ। कोई मेरे पास नहीं आ सकता जब तक पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले; और मैं उसे अंतिम दिन फिर जिला उठाऊँगा। भविष्यद्वक्‍ताओं के लेखों में यह लिखा है : ‘वे सब परमेश्‍वर की ओर से सिखाए हुए होंगे।‘ जिस किसी ने पिता से सुना और सीखा है, वह मेरे पास आता है। (यूहन्ना 6:43-45)

 

  1. जिनको प्रभावशाली रूप से बुलाया जाता है, वे इस जीवन में किन-किन लाभों के भागी होते हैं ?

उत्तर: जिनको प्रभावशाली रूप से बुलाया जाता है, वे इस जीवन में धर्मिकरण (रोमियों 8:30) , लेपालकपन (इफिसियों 1:5), पवित्रीकरण और इनके साथ आने वाले या इनमे से निकलने वाले विभिन्न लाभों के भागी होते हैं (1 कुरिन्थियों 1:30) ।

साक्षी आयतें:

फिर जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया है; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी है। (रोमियों  8:30)

 और अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार हमें अपने लिये पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों (इफिसियों 1:5)

 परन्तु उसी की ओर से तुम मसीह यीशु में हो, जो परमेश्‍वर की ओर से हमारे लिये ज्ञान ठहरा, अर्थात् धर्म, और पवित्रता, और छुटकारा  (1 कुरिन्थियों 1:30)

 

  1. धर्मिकरण क्या है ?

उत्तर: धर्मिकरण परमेश्वर के स्वतंत्र अनुग्रह का ऐसा कार्य है, जिसमें वह केवल मसीह की धार्मिकता जो हम पर आरोपित की गई है, (रोमियों 5:19) और जिसको हमने केवल विश्वास से प्राप्त किया है (गलातियों 2:16; फिलिप्पियों 3:9), के कारण हमारे सभी पापों को क्षमा करता है (रोमियों 3:24; इफिसियों 1:7) और हमें उसकी दृष्टि में धर्मी के रूप में स्वीकार करता है (2 कुरिन्थियों 5:21)।

साक्षी आयतें:

क्योंकि जैसा एक मनुष्य के आज्ञा न मानने से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक मनुष्य के आज्ञा मानने से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे। (रोमियों 5:19)

 तौभी यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, पर केवल यीशु मसीह पर विश्‍वास करने के द्वारा धर्मी ठहरता है, हम ने आप भी मसीह यीशु पर विश्‍वास किया कि हम व्यवस्था के कामों से नहीं, पर मसीह पर विश्‍वास करने से धर्मी ठहरें; इसलिये कि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी ठहरेगा। (गलतियों 2:16)

 और उसमें पाया जाऊँ; कि अपनी उस धार्मिकता के साथ, जो व्यवस्था से है, वरन् उस धार्मिकता के साथ जो मसीह पर विश्‍वास करने के कारण है और परमेश्‍वर की ओर से विश्‍वास करने पर मिलती है ( फिलिप्पियों 3:9)

 परन्तु उसके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं।  (रोमियों 3:24)

 हम को उसमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात् अपराधों की क्षमा, उसके उस अनुग्रह के धन के अनुसार मिला है ( इफिसियों 1:7)

 जो पाप से अज्ञात था, उसी को उसने हमारे लिये पाप ठहराया कि हम उसमें होकर परमेश्‍वर की धार्मिकता बन जाएँ। (2 कुरिन्थियों 5:21)

 

  1. लेपालकपन क्या होता है ?

उत्तर: लेपालकपन परमेश्वर के स्वतंत्र अनुग्रह का वह कार्य है (1 यूहन्ना 3:1) जिसके अंतर्गत हम परमेश्वर के पुत्रों की गिनती में स्वीकार किये जाते हैं और हमें परमेश्वर के पुत्रों के सभी लाभों पर अधिकार मिल जातें हैं (यूहन्ना 1:12; रोमियों 8:17)।

साक्षी आयतें:

देखो, पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है कि हम परमेश्‍वर की सन्तान कहलाएँ; और हम हैं भी। (1 यूहन्ना 3:1)

 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं। (यूहन्ना 1:12)

 और यदि सन्तान हैं तो वारिस भी, वरन् परमेश्‍वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, कि जब हम उसके साथ दु:ख उठाएँ तो उसके साथ महिमा भी पाएँ। (रोमियों 8:17)

 

  1. पवित्रीकरण क्या है?

उत्तर:  पवित्रीकरण परमेश्वर के आत्मा का कार्य है, (2 थिस्सलुनीकियों 2:13) जिसके द्वारा हम परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार सारे मनुष्यत्व में नए बन जातें हैं, (इफिसियों 4:24) और पाप के लिए अधिक से अधिक मरने, और धार्मिकता के लिए जीने में समर्थ बन जातें हैं (रोमियों 6:11) ।

साक्षी आयतें:

हे भाइयो, और प्रभु के प्रिय लोगो, चाहिये कि हम तुम्हारे विषय में सदा परमेश्‍वर का धन्यवाद करते रहें, क्योंकि परमेश्‍वर ने आदि से तुम्हें चुन लिया कि आत्मा के द्वारा पवित्र बनकर, और सत्य की प्रतीति करके उद्धार पाओ, (2 थिस्सलुनीकियों 2:13)

 और नये मनुष्यत्व को पहिन लो जो परमेश्‍वर के अनुरूप सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है। (इफिसियों 4:24)

 ऐसे ही तुम भी अपने आप को पाप के लिये तो मरा, परन्तु परमेश्‍वर के लिये मसीह यीशु में जीवित समझो। (रोमियों 6:11)

 

  1. कौन-कौनसे लाभ धर्मिकरण, लेपालकपन और पवित्रीकरण के साथ आतें हैं या इनमें से निकलते हैं?

उत्तर: परमेश्वर के प्रेम का आश्वासन, मन की शांति, पवित्र आत्मा में आनंद (रोमियों 14:17; (रोमियों 5:1-2, 5)), अनुग्रह की वृद्धि (नीतिवचन 4:18), और अंत तक इसमें बने रहने की क्षमता (1 यूहन्ना 5:13; 1 पतरस 1:5) धर्मिकरण, लेपालकपन और पवित्रीकरण के साथ आतें हैं या इनमें से निकलते हैं।

साक्षी आयतें:

क्योंकि परमेश्‍वर का राज्य खाना–पीना नहीं, परन्तु धर्म और मेलमिलाप और वह आनन्द है जो पवित्र आत्मा में होता है। (रोमियों 14:17)

 अत: जब हम विश्‍वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्‍वर के साथ मेल रखें, जिसके द्वारा विश्‍वास के कारण उस अनुग्रह तक जिसमें हम बने हैं, हमारी पहुँच भी हुई, और परमेश्‍वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें। (रोमियों 5:1-2)

 और आशा से लज्जा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है उसके द्वारा परमेश्‍वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है। (रोमियों 5: 5)

 परन्तु धर्मियों की चाल उस चमकती हुई

ज्योति के समान है,

जिसका प्रकाश दोपहर तक अधिक अधिक

बढ़ता रहता है। (नीतिवचन 4:18)

 मैं ने तुम्हें, जो परमेश्‍वर के पुत्र के नाम पर विश्‍वास करते हो, इसलिये लिखा है कि तुम जानो कि अनन्त जीवन तुम्हारा है। (1 यूहन्ना 5:13)

 जिनकी रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्‍वास के द्वारा उस उद्धार के लिये, जो आनेवाले समय में प्रगट होनेवाली है, की जाती है। (1 पतरस 1:5)

 

  1. विश्वासियों को उनकी मृत्यु पर मसीह से क्या लाभ प्राप्त होते हैं?

उत्तर: विश्वासियों के आत्मा उनकी मृत्यु पर पवित्रता में सिद्ध कर दिए जाते हैं (इब्रानियों12:23) और तुरंत महिमा में प्रवेश कर जातें हैं, (फिलिप्पियों 1:23; 2 कुरिन्थियों 5:8; लूका 23:43) और उनके शरीर, जो कि अभी भी मसीह से जुड़े हुए हैं, (1 थिस्सलुनीकियों 4:14) उनकी कब्रों में (यशायाह 57:2) पुनरुत्थान तक सोते हैं (अय्यूब 19:26)।

साक्षी आयतें:

और उन पहिलौठों की साधारण सभा और कलीसिया, जिनके नाम स्वर्ग में लिखे हुए हैं, और सब के न्यायी परमेश्‍वर के पास, और सिद्ध किए हुए धर्मियों की आत्माओं (इब्रानियों 12:23)

 क्योंकि मैं दोनों के बीच अधर में लटका हूँ; जी तो चाहता है कि कूच करके मसीह के पास जा रहूँ, क्योंकि यह बहुत ही अच्छा है, (फिलिप्पियों 1:23)

 इसलिये हम ढाढ़स बाँधे रहते हैं, और देह से अलग होकर प्रभु के साथ रहना और भी उत्तम समझते हैं। (2 कुरिन्थियों 5:8)

 उसने उससे कहा, “मैं तुझ से सच कहता हूँ कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।” (लूका 23:43)

 क्योंकि यदि हम विश्‍वास करते हैं कि यीशु मरा और जी भी उठा, तो वैसे ही परमेश्‍वर उन्हें भी जो यीशु में सो गए हैं, उसी के साथ ले आएगा। (1 थिस्सलुनीकियों 4:14)

 वह शान्ति को पहुँचता है; जो सीधी चाल चलता है वह अपनी खाट पर विश्राम करता है। (यशायाह 57:2)

 और अपनी खाल के इस प्रकार नष्‍ट हो जाने

के बाद भी,

मैं शरीर में होकर परमेश्‍वर का दर्शन पाऊँगा। (अय्यूब 19:26)

 

  1. पुनरुत्थान में विश्वासियों को मसीह से क्या लाभ प्राप्त होते हैं?

उत्तर: पुनरुत्थान में विश्वासियों को महिमा में जिलाया जायेगा, (1 कुरिन्थियों 15:43) न्याय के दिन खुले तौर पर स्वीकार किया जाएगा और निर्दोष घोषित जाएगा, (मत्ती 10:32) और परमेश्वर में अनंत काल तक सिद्ध रूप से आनंदित होने के लिए (1 यूहन्ना 3:2) आत्मा और शरीर दोनों में पूरी तरह से धन्य बनाया जाएगा (1 थिस्सलुनीकियों 4:17)।

साक्षी आयतें:

वह अनादर के साथ बोया जाता है, और तेज के साथ जी उठता है; निर्बलता के साथ बोया जाता है, और सामर्थ्य के साथ जी उठता है। (1 कुरिन्थियों 15:43)

 “जो कोई मनुष्यों के सामने मुझे मान लेगा, उसे मैं भी अपने स्वर्गीय पिता के सामने मान लूँगा।* (मत्ती 10:32)

 हे प्रियो, अब हम परमेश्‍वर की सन्तान हैं, और अभी तक यह प्रगट नहीं हुआ कि हम क्या कुछ होंगे! इतना जानते हैं कि जब वह प्रगट होगा तो हम उसके समान होंगे, क्योंकि उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है। (1 यूहन्ना 3:2)

 तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे उनके साथ बादलों पर उठा लिये जाएँगे कि हवा में प्रभु से मिलें; और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे। (1 थिस्सलुनीकियों 4:17)

 

  1. दुष्टों की मृत्यु पर उनके साथ क्या किया जाएगा?

उत्तर: दुष्टों के आत्मा उनकी मृत्यु पर नरक की पीड़ा में डाल दिए जाएंगे (लूका 16:22-24) और उनके शरीर पुनरुत्थान और महान दिन के न्याय तक उनकी कब्रों में पड़े रहेंगे (भजन 49:14)।

साक्षी आयतें:

ऐसा हुआ कि वह कंगाल मर गया, और स्वर्गदूतों ने उसे लेकर अब्राहम की गोद में पहुँचाया। वह धनवान भी मरा और गाड़ा गया, और अधोलोक में उसने पीड़ा में पड़े हुए अपनी आँखें उठाईं, और दूर से अब्राहम की गोद में लाजर को देखा। तब उसने पुकार कर कहा, ‘हे पिता अब्राहम, मुझ पर दया करके लाजर को भेज दे, ताकि वह अपनी उँगली का सिरा पानी में भिगोकर मेरी जीभ को ठंडी करे, क्योंकि मैं इस ज्वाला में तड़प रहा हूँ।’ (लूका 16:22-24)

 वे अधोलोक की मानो भेड़–बकरियाँ

ठहराए गए हैं;

मृत्यु उनका गड़ेरिया ठहरी;

और भोर को सीधे लोग उन पर प्रभुता करेंगे;

और उनका सुन्दर रूप अधोलोक का कौर

हो जाएगा और उनका कोई आधार न रहेगा। (भजन 49:14)

 

  1. न्याय के दिन दुष्टों के साथ क्या किया जाएगा?

उत्तर: न्याय के दिन दुष्टों के शरीर कब्रों में से जिलाये जायेंगे और उनको उनके आत्माओं समेत शैतान और उसके दूतों के साथ सदा के लिए बयान से बाहर यातनाओं का दंड दिया जाएगा।  (दानिय्येल 12:2; यूहन्ना 5:28, 29; 2 थिस्सलुनीकियों 1:9; मत्ती 25:41)

साक्षी आयतें:

जो भूमि के नीचे सोए रहेंगे उन में से बहुत से लोग जाग उठेंगे, कितने तो सदा के जीवन के लिये, और कितने अपनी नामधराई और सदा तक अत्यन्त घिनौने ठहरने के लिये। (दानिय्येल 12:2)

 इससे अचम्भा मत करो; क्योंकि वह समय आता है कि जितने कब्रों में हैं वे उसका शब्द सुनकर निकल आएँगे। 29जिन्होंने भलाई की है वे जीवन के पुनरुत्थान के लिये जी उठेंगे और जिन्होंने बुराई की है वे दण्ड के पुनरुत्थान के लिये जी उठेंगे। (यूहन्ना 5:28, 29)

 वे प्रभु के सामने से और उसकी शक्‍ति के तेज से दूर होकर अनन्त विनाश का दण्ड पाएँगे। (2 थिस्सलुनीकियों 1:9)

 “तब वह बाईं ओर वालों से कहेगा, ‘हे शापित लोगो, मेरे सामने से उस अनन्त आग में चले जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई (मत्ती 25:41)

 

  1. उसके आज्ञापालन के नियम के लिए परमेश्वर ने क्या प्रकट किया?

उत्तर: जिस नियम को परमेश्वर ने सबसे पहले मनुष्य को उसकी आज्ञाकारिता के लिए प्रकट किया, वह नैतिक नियम है, जो कि दस आज्ञाओं में सारांशित किया गया है (व्यवस्थाविवरण 10:4; मत्ती 19:17)।

साक्षी आयतें:

और जो दस वचन यहोवा ने सभा के दिन पर्वत पर अग्नि के मध्य में से तुम से कहे थे, वे ही उसने पहलों के समान उन पटियाओं पर लिखे, और उनको मुझे सौंप दिया। (व्यवस्थाविवरण 10:4)

 उसने उससे कहा, “तू मुझ से भलाई के विषय में क्यों पूछता है? भला तो एक ही है, पर यदि तू जीवन में प्रवेश करना चाहता है, तो आज्ञाओं को माना कर। (मत्ती 19:17)

 

  1. दस आज्ञाओं का सार क्या है?

उत्तर: दस आज्ञाओं का सार यह है कि हम अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे ह्रदय, सारे आत्मा,  सारी शक्ति, और सारी बुद्धि से प्रेम करे और अपने पड़ोसी से खुद के सामान प्रेम करें। (मत्ती 22:37-40)

साक्षी आयतें:

उसने उससे कहा, “तू परमेश्‍वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरी भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख। ये ही दो आज्ञाएँ सारी व्यवस्था और भविष्यद्वक्‍ताओं का आधार हैं।” (मत्ती 22:37-40)

 

  1. पहली आज्ञा कौन सी है?

उत्तर: पहली आज्ञा है, “तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्‍वर करके न मानना।”

 

  1. पहली आज्ञा में क्या आवश्यक है।

उत्तर: पहली आज्ञा में यह आवश्यक है कि हम यहोवा को एक मात्र सच्चे परमेश्वर और हमारे अपने परमेश्वर के रूप में जाने (1 इतिहास 28:9) और माने (व्यवस्थाविवरण 26:17) और इसी अनुसार उसकी आराधना और महिमा करें। (मत्ती 4:10)

साक्षी आयतें:

 “हे मेरे पुत्र सुलैमान! तू अपने पिता के परमेश्‍वर का ज्ञान रख, और खरे मन और प्रसन्न जीव से उसकी सेवा करता रह; क्योंकि यहोवा मन को जाँचता और विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है उसे समझता है। यदि तू उसकी खोज में रहे, तो वह तुझ को मिलेगा; परन्तु यदि तू उसको त्याग दे तो वह सदा के लिये तुझ को छोड़ देगा। (1 इतिहास 28:9)

 तू ने तो आज यहोवा को अपना परमेश्‍वर मानकर यह वचन दिया है, कि मैं तेरे बताए हुए मार्गों पर चलूँगा, और तेरी विधियों, आज्ञाओं, और नियमों को माना करूँगा, और तेरी सुना करूँगा। (व्यवस्थाविवरण 26:17)

 तब यीशु ने उससे कहा, “हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है:

‘तू प्रभु अपने परमेश्‍वर को प्रणाम कर,

और केवल उसी की उपासना कर।”’ (मत्ती 4:10)

 

  1. दूसरी आज्ञा क्या है?

उत्तर: दूसरी आज्ञा यह  है: “तू अपने लिये कोई मूर्ति खोदकर न बनाना, न किसी की प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, या पृथ्वी पर, या पृथ्वी के जल में है। तू उनको दण्डवत् न करना, और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मैं तेरा परमेश्‍वर यहोवा जलन रखने वाला परमेश्‍वर हूँ, और जो मुझ से बैर रखते हैं, उनके बेटों, पोतों, और परपोतों को भी पितरों का दण्ड दिया करता हूँ, और जो मुझ से प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं, उन हज़ारों पर करुणा किया करता हूँ।”

 

  1. दूसरी आज्ञा में क्या आवश्यक है ?

उत्तर: दूसरी आज्ञा में परमेश्वर के द्वारा वचन में निर्धारित धार्मिक आराधना और धार्मिक संस्कारों (ordinances) का सम्मान करना, उनका पालन करना (व्यवस्थाविवरण 32:46; मत्ती 28:20) और उन्हें शुद्ध और सुरक्षित (व्यवस्थाविवरण 12:32) रखना आवश्यक है।

साक्षी आयतें:

तब उसने उनसे कहा, “जितनी बातें मैं आज तुम से चिताकर कहता हूँ उन सब पर अपना अपना मन लगाओ, और उनके अर्थात् इस व्यवस्था की सारी बातों के मानने में चौकसी करने की आज्ञा अपने बच्‍चों को दो। (व्यवस्थाविवरण 32:46)

 और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ। (मत्ती 28:20)

 “जितनी बातों की मैं तुम को आज्ञा देता हूँ उनको चौकस होकर माना करना; और न तो कुछ उनमें बढ़ाना और न उनमें से कुछ घटाना। (व्यवस्थाविवरण 12:32)

 

  1. दूसरी आज्ञा में क्या मना है?

उत्तर: दूसरी आज्ञा में मूर्तियों के माध्यम से (व्यवस्थाविवरण 4:15-18) या कोई और तरीका जो उसके वचन में निर्धारित न किया गया हो के द्वारा परमेश्वर की आराधना करना मना है। (कुलुस्सियों2:18)

साक्षी आयतें:

“इसलिये तुम अपने विषय में बहुत सावधान रहना। क्योंकि जब यहोवा ने तुम से होरेब पर्वत पर आग के बीच में से बातें कीं तब तुम को कोई रूप न दिखाई पड़ा, कहीं ऐसा न हो कि तुम बिगड़कर चाहे पुरुष चाहे स्त्री के, चाहे पृथ्वी पर चलनेवाले किसी पशु, चाहे आकाश में उड़नेवाले किसी पक्षी के, चाहे भूमि पर रेंगनेवाले किसी जन्तु, चाहे पृथ्वी के जल में रहनेवाली किसी मछली के रूप की कोई मूर्ति खोदकर बना लो (व्यवस्थाविवरण 4:15-18)

 कोई मनुष्य आत्महीनता और स्वर्गदूतों की पूजा कराके तुम्हें दौड़ के प्रतिफल से वंचित न करे। ऐसा मनुष्य देखी हुई बातों में लगा रहता है और अपनी शारीरिक समझ पर व्यर्थ फूलता है, (कुलुस्सियों 2:18)

 

  1. तीसरी आज्ञा क्या है?

उत्तर: तीसरी आज्ञा यह है, “तू अपने परमेश्‍वर का नाम व्यर्थ न लेना; क्योंकि जो यहोवा का नाम व्यर्थ ले वह उसको निर्दोष न ठहराएगा।“

 

  1. तीसरी आज्ञा में क्या आवश्यक है ?

उत्तर: तीसरी आज्ञा में परमेश्वर के नामों (भजन 29:2), गुण-सूचक नामों (titles), गुणों (प्रकाशितवाक्य 15:3-4), नियमों (ordinances) (सभोपदेशक 5:1) और वचन का उपयोग (भजन 138:2) और कामों का जिक्र पवित्रता और सम्मान के साथ करना आवश्यक है (अय्यूब 36:24; व्यवस्थाविवरण 28:58-59)।

साक्षी आयतें:

यहोवा के नाम की महिमा करो;

पवित्रता से शोभायमान होकर यहोवा को

दण्डवत् करो। (भजन 29:2)

 

वे परमेश्‍वर के दास मूसा का गीत, और मेम्ने का गीत गा गाकर कहते थे,

“हे सर्वशक्‍तिमान प्रभु परमेश्‍वर,

तेरे कार्य महान् और अद्भुत हैं;

हे युग–युग के राजा,

तेरी चाल ठीक और सच्‍ची है”।

“हे प्रभु,

कौन तुझ से न डरेगा और तेरे नाम

की महिमा न करेगा?

क्योंकि केवल तू ही पवित्र है।

सारी जातियाँ आकर तेरे सामने

दण्डवत् करेंगी,

क्योंकि तेरे न्याय के काम

प्रगट हो गए हैं।“ (प्रकाशितवाक्य 15:3-4)

 

जब तू परमेश्‍वर के भवन में जाए, तब सावधानी से चलना5:1 मूल में, अपने पैर की रक्षा करना; सुनने के लिये समीप जाना मूर्खों के बलिदान चढ़ाने से उत्तम है; क्योंकि वे नहीं जानते कि बुरा करते हैं। (सभोपदेशक 5:1)

 

मैं तेरे पवित्र मन्दिर की ओर दण्डवत् करूँगा,

और तेरी करुणा और सच्‍चाई के कारण

तेरे नाम का धन्यवाद करूँगा,

क्योंकि तू ने अपने वचन को अपने बड़े नाम

से अधिक महत्त्व दिया है। (भजन 138:2)

 

उसके कामों की महिमा और प्रशंसा

करना स्मरण रख,

जिसकी प्रशंसा का गीत मनुष्य गाते चले

आए हैं। (अय्यूब 36:24)

 

यदि तू इन व्यवस्था के सारे वचनों का पालन करने में, जो इस पुस्तक में लिखे हैं, चौकसी करके उस आदरणीय और भययोग्य नाम का, जो यहोवा तेरे परमेश्‍वर का है भय न माने, तो यहोवा तुझ को और तेरे वंश को अनोखे अनोखे दण्ड देगा, वे दुष्‍ट और बहुत दिन रहनेवाले रोग और भारी भारी दण्ड होंगे। (व्यवस्थाविवरण 28:58-59)

 

  1. चौथी आज्ञा क्या है?

उत्तर: चौथी आज्ञा यह है, तू विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिये स्मरण रखना। : दिन तो तू परिश्रम करके अपना सब कामकाज करनापरन्तु सातवाँ दिन तेरे परमेश्वर यहोवा के लिये विश्रामदिन है। उसमें तो तू किसी भाँति का कामकाज करना, और तेरा बेटा, तेरी बेटी, तेरा दास, तेरी दासी, तेरे पशु, कोई परदेशी जो तेरे फाटकों के भीतर हो। क्योंकि : दिन में यहोवा ने आकाश, और पृथ्वी, और समुद्र, और जो कुछ उनमें हैं, सब को बनाया, और सातवें दिन विश्राम किया; इस कारण यहोवा ने विश्रामदिन को आशीष दी और उसको पवित्र ठहराया।“

 

  1. चौथी आज्ञा में क्या आवश्यक है?

उत्तर: परमेश्वर के द्वारा वचन में निर्धारित समयों, स्पष्ट रूप से सात में एक पूरे दिन को परमेश्वर के लिए पवित्र सबद मानना इस आज्ञा में आवश्यक है। (लैव्यव्यवस्था 19:30; व्यवस्थाविवरण 5:12)

साक्षी आयतें:

मेरे विश्रामदिन को माना करना, और मेरे पवित्रस्थान का भय निरन्तर मानना; मैं यहोवा हूँ। (लैव्यव्यवस्था 19:30)

 ‘तू विश्रामदिन को मानकर पवित्र रखना, जैसे तेरे परमेश्‍वर यहोवा ने तुझे आज्ञा ( व्यवस्थाविवरण 5:12)

 

  1. सब्त का दिन कैसे पवित्र माना जाए?

उत्तर: सब्त को पूरे दिन एक पवित्र विश्राम द्वारा पवित्र माना जाना है, यहां तक ​​कि ऐसे

सांसारिक रोजगार और मनोरंजन से भी विश्राम करना है, जो अन्य दिनों में वैध हैं, (लैव्यव्यवस्था 23:3) और परमेश्वर की सार्वजनिक और निजी आराधना के कार्यों में पूरा दिन बिताना है (भजन 92:1-2; यशायाह 58:13-14) और केवल आवश्यकता और दया के कार्यों के अलावा कुछ भी नहीं करना है (मत्ती 12:11-12) ।

साक्षी आयतें:

छ: दिन काम–काज किया जाए, पर सातवाँ दिन परमविश्राम का और पवित्र सभा का दिन है; उसमें किसी प्रकार का काम–काज न किया जाए; वह तुम्हारे सब घरों में यहोवा का विश्राम दिन ठहरे। (लैव्यव्यवस्था 23:3)

 यहोवा का धन्यवाद करना भला है,

हे परमप्रधान, तेरे नाम का भजन गाना;

प्रात:काल को तेरी करुणा,

और प्रति रात तेरी सच्‍चाई का प्रचार करना, (भजन 92:1-2)

 “यदि तू विश्रामदिन को अशुद्ध न करे अर्थात् मेरे उस पवित्र दिन में अपनी इच्छा पूरी करने का यत्न न करे, और विश्रामदिन को आनन्द का दिन और यहोवा का पवित्र किया हुआ दिन समझकर माने; यदि तू उसका सम्मान करके उस दिन अपने मार्ग पर न चले, अपनी इच्छा पूरी न करे, और अपनी ही बातें न बोले, तो तू यहोवा के कारण सुखी होगा, और मैं तुझे देश के ऊँचे स्थानों पर चलने दूँगा, मैं तेरे मूलपुरुष याकूब के भाग की उपज में से तुझे खिलाऊँगा, क्योंकि यहोवा ही के मुख से यह वचन निकला है।” (यशायाह 58:13,14)

 उसने उनसे कहा, “तुम में ऐसा कौन है जिसकी एक ही भेड़ हो, और वह सब्त के दिन गड़हे में गिर जाए, तो वह उसे पकड़कर न निकाले? भला, मनुष्य का मूल्य भेड़ से कितना बढ़कर है! इसलिये सब्त के दिन भलाई करना उचित है।” (मत्ती 12:11-12)

 

  1. पांचवी आज्ञा क्या है?

उत्तर: पांचवी आज्ञा यह है, तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना, जिससे जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उसमें तू बहुत दिन तक रहने पाए।“

 

  1. पांचवीं आज्ञा में क्या आवश्यक है?

उत्तर: पांचवीं आज्ञा में यह आवश्यक है कि बड़े (इफिसियों 5:21-22, 6:1, 5; रोमियों 13:1), छोटे (इफिसियों 6:9) और बराबर वालों का उनके विभिन्न स्थानों और रिश्तों के अनुसार सम्मान बनाये रखा जाये और उनके प्रति जो कर्त्तव्य हैं उन्हें पूरा किया जाये (रोमियों 12:10)।

साक्षी आयतें:

मसीह के भय से एक दूसरे के अधीन रहो।

हे पत्नियो, अपने अपने पति के ऐसे अधीन रहो जैसे प्रभु के। (इफिसियों 5:21-22)

 हे बालको, प्रभु में अपने माता–पिता के आज्ञाकारी बनो, क्योंकि यह उचित है। (इफिसियों 6:1)

 हे दासो, जो लोग इस संसार में तुम्हारे स्वामी हैं, अपने मन की सीधाई से डरते और काँपते हुए, जैसे मसीह की वैसे ही उनकी भी आज्ञा मानो। (इफिसियों 6:5)

 हर एक व्यक्‍ति शासकीय अधिकारियों के अधीन रहे, क्योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं जो परमेश्‍वर की ओर से न हो; और जो अधिकार हैं, वे परमेश्‍वर के ठहराए हुए हैं। (रोमियों 13:1)

 हे स्वामियो, तुम भी धमकियाँ देना छोड़कर उनके साथ वैसा ही व्यवहार करो; क्योंकि तुम जानते हो कि उन का और तुम्हारा दोनों का स्वामी स्वर्ग में है, और वह किसी का पक्ष नहीं करता। (इफिसियों 6:9)

 भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे से स्‍नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो। (रोमियों 12:10)

 

  1. पाँचवीं आज्ञा से जुड़ा कारण क्या है?

उत्तर: पाँचवीं आज्ञा से जुड़ा कारण इस आज्ञा को मानने वालों के लिए परमेश्वर का जितना उसकी महिमा के लिए और उनकी भलाई के लिए उपयोगी है उतना लम्बा जीवन और उतनी समृद्धि देने का वादा है। (इफिसियों 6:2-3)

साक्षी आयतें:

 “अपनी माता और पिता का आदर कर (यह पहली आज्ञा है जिसके साथ प्रतिज्ञा भी है) कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे।” (इफिसियों 6:2-3)

 

  1. छठी आज्ञा क्या है?

उत्तर: छठी आज्ञा यह है तू खून करना।“

 

  1. छठी आज्ञा में क्या मना है?

उत्तर: अपनी जान लेना (प्रेरितों के काम 16:28) या अन्यायपूर्वक अपने पडोसी की जान लेना (उत्पत्ति 9:6) या ऐसा कुछ भी करना, जिससे किसी की जान चली जाये (नीतिवचन 24:11-12)- छठी आज्ञा में मना है।

साक्षी आयतें:

परन्तु पौलुस ने ऊँचे शब्द से पुकारकर कहा, “अपने आप को कुछ हानि न पहुँचा, क्योंकि हम सब यहीं हैं।” (प्रेरितों के काम 16:28)

 जो कोई मनुष्य का लहू बहाएगा उसका लहू मनुष्य ही से बहाया जाएगा, क्योंकि परमेश्‍वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप के अनुसार बनाया है। (उत्पत्ति 9:6)

 जो मार डाले जाने के लिये घसीटे जाते हैं

उनको छुड़ा;

और जो घात किए जाने को हैं

उन्हें मत पकड़ा।

यदि तू कहे, कि देख मैं इसको जानता न था,

तो क्या मन का जाँचनेवाला

इसे नहीं समझता?

क्या तेरे प्राणों का रक्षक इसे नहीं जानता,

और क्या वह हर एक मनुष्य के काम का

फल उसे न देगा? (नीतिवचन 24:11-12)

 

  1. सातवीं आज्ञा क्या है?

उत्तर: सातवीं आज्ञा यह है, तू व्यभिचार करना।“

 

  1. सातवीं आज्ञा में क्या मना है?

उत्तर: सातवीं आज्ञा में सभी अपवित्र विचार (मत्ती 5:28), शब्द (इफिसियों 5:4; कुलुस्सियों 4:6) और कार्य (इफिसियों 5:3; 2 तीमुथियुस 2:22) मना है।

साक्षी आयतें:

परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्‍टि डाले वह अपने मन में उस से व्यभिचार कर चुका। (मत्ती 5:28)

 और न निर्लज्जता, न मूढ़ता की बातचीत की, न ठट्ठे की; क्योंकि ये बातें शोभा नहीं देतीं, वरन् धन्यवाद ही सुना जाए। (इफिसियों 5:4)

 तुम्हारा वचन सदा अनुग्रह सहित और सलोना हो कि तुम्हें हर मनुष्य को उचित रीति से उत्तर देना आ जाए। (कुलुस्सियों 4:6)

 जैसा पवित्र लोगों के योग्य है, वैसा तुम में व्यभिचार और किसी प्रकार के अशुद्ध काम या लोभ की चर्चा तक न हो; (इफिसियों 5:3)

जवानी की अभिलाषाओं से भाग, और जो शुद्ध मन से प्रभु का नाम लेते हैं उनके साथ धर्म, और विश्‍वास, और प्रेम, और मेलमिलाप का पीछा कर। (2 तीमुथियुस 2:22)

 

  1. आठवीं आज्ञा क्या है?

उत्तर: आठवीं आज्ञा यह है, तू चोरी करना।“

 

  1. आठवीं आज्ञा में क्या मना है?

उत्तर: जो कुछ स्वयं के (1 तीमुथियुस 5:8) या पड़ोसी के धन या भौतिक कल्याण को नुकसान पहुँचाता है या अन्यायपूर्वक नुकसान पहुँचा सकता है- वो सब इस आज्ञा में मना है। (नीतिवचन 28:19, 21:6; इफिसियों 4:28)

साक्षी आयतें:

पर यदि कोई अपनों की और निज करके अपने घराने की चिन्ता न करे, तो वह विश्‍वास से मुकर गया है और अविश्‍वासी से भी बुरा बन गया है। (1 तीमुथियुस 5:8)

 जो अपनी भूमि को जोता–बोया करता है,

उसका तो पेट भरता है,

परन्तु जो निकम्मे लोगों की संगति करता है

वह कंगालपन से घिरा रहता (नीतिवचन 28:19)

 जो धन झूठ के द्वारा प्राप्‍त हो,

वह वायु से उड़ जाने वाला कुहरा है,

उसके ढूँढ़नेवाले मृत्यु ही को ढूँढ़ते हैं। (नीतिवचन 21:6)

चोरी करनेवाला फिर चोरी न करे, वरन् भले काम करने में अपने हाथों से परिश्रम करे, इसलिये कि जिसे प्रयोजन हो उसे देने को उसके पास कुछ हो। (इफिसियों 4:28)

 

  1. नौवीं आज्ञा क्या है?

उत्तर: नौवीं आज्ञा यह है, तू किसी के विरुद्ध झूठी साक्षी देना।“

 

  1. नौवीं आज्ञा में क्या आवश्यक है?

उत्तर: नौवीं आज्ञा में यह आवश्यक है कि एक व्यक्ति और दूसरे व्यक्ति के बीच में (जकर्याह 8:16) सत्य को बनाये रखा जाए और स्वयं के (1 पतरस 3:16; प्रेरितों 25:10) और अपने पड़ोसी के सम्मान (3 यूहन्ना 1:12) को बनाये रखा जाए और बढ़ाया जाए, विशेषकर गवाही देते समय (नीतिवचन 14:5, 25)।

साक्षी आयतें:

जो जो काम तुम्हें करना चाहिये, वे ये हैं: एक दूसरे के साथ सत्य बोला करना, अपनी कचहरियों में सच्‍चाई का और मेलमिलाप की नीति का न्याय करना, (जकर्याह 8:16)

 और भी शुद्ध रखो, इसलिये कि जिन बातों के विषय में तुम्हारी बदनामी होती है उनके विषय में वे, जो मसीह में तुम्हारे अच्छे चालचलन का अपमान करते हैं, लज्जित हों। (1 पतरस 3:16)

 पौलुस ने कहा, “मैं कैसर के न्याय–आसन के सामने खड़ा हूँ; मेरे मुक़द्दमे का यहीं फैसला होना चाहिए। जैसा तू अच्छी तरह जानता है, यहूदियों का मैं ने कुछ अपराध नहीं किया। (प्रेरितों 25:10)

 दिमेत्रियुस के विषय में सब ने, वरन् सत्य ने भी आप ही गवाही दी; और हम भी गवाही देते हैं, और तू जानता है कि हमारी गवाही सच्‍ची है। (3 यूहन्ना 1:12)

 सच्‍चा साक्षी झूठ नहीं बोलता,

परन्तु झूठा साक्षी झूठी बातें उड़ाता है। (नीतिवचन 14:5)

 सच्‍चा साक्षी बहुतों के प्राण बचाता है,

परन्तु जो झूठी बातें उड़ाया करता है

उस से धोखा ही होता है। (नीतिवचन 14:25)

 

  1. दसवीं आज्ञा क्या है?

उत्तर: दसवीं आज्ञा यह है, तू किसी के घर का लालच करना; तो किसी की स्त्री का लालच करना, और किसी के दासदासी या बैलगदहे का, किसी की किसी वस्तु का लालच करना।

 

  1. दसवीं आज्ञा में क्या मना है?

उत्तर: अपनी स्थिति पर सब प्रकार का असंतोष (1 कुरिन्थियों 10:10), अपने पड़ोसी की भलाई से जलना या उस पर दुखी होना (गलातियों 5:26) और उसकी किसी भी चीज़ के प्रति अनियंत्रित भावनाएं और लालसाएं इस आज्ञा में मना है (कुलुस्सियों 3:5)।

साक्षी आयतें:

और न तुम कुड़कुड़ाओ, जिस रीति से उनमें से कितने कुड़कुड़ाए और नष्‍ट करनेवाले के द्वारा नष्‍ट किए गए। (1 कुरिन्थियों 10:10)

 हम घमण्डी होकर न एक दूसरे को छेड़ें, और न एक दूसरे से डाह करें। (गलातियों 5:26)

 इसलिये अपने उन अंगों को मार डालो जो पृथ्वी पर हैं, अर्थात् व्यभिचार, अशुद्धता, दुष्कामना, बुरी लालसा और लोभ को जो मूर्तिपूजा के बराबर है (कुलुस्सियों 3:5)

 

  1. क्या कोई मनुष्य पूरी तरह से परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम है?

उत्तर: पतन के बाद से कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में पूरी तरह से आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम नहीं है (सभोपदेशक 7:20), वरन वह प्रतिदिन उन्हें विचार (उत्पत्ति 8:21), वचन (याकूब 3:8) और कार्य (याकूब 3:2) में तोड़ता है.

साक्षी आयतें:

नि:सन्देह पृथ्वी पर कोई ऐसा धर्मी मनुष्य नहीं जो भलाई ही करे और जिस से पाप न हुआ हो। (सभोपदेशक 7:20)

 इस पर यहोवा ने सुखदायक सुगन्ध पाकर सोचा, “मनुष्य के कारण मैं फिर कभी भूमि को शाप न दूँगा, यद्यपि मनुष्य के मन में बचपन से जो कुछ उत्पन्न होता है वह बुरा ही होता है; तौभी जैसा मैं ने सब जीवों को अब मारा है, वैसा उनको फिर कभी न मारूँगा। (उत्पत्ति 8:21)

 पर जीभ को मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता; वह एक ऐसी बला है जो कभी रुकती ही नहीं, वह प्राणनाशक विष से भरी हुई है। (याकूब 3:8)

 इसलिये कि हम सब बहुत बार चूक जाते हैं; जो कोई वचन में नहीं चूकता वही तो सिद्ध मनुष्य है और सारी देह पर भी लगाम लगा सकता है। (याकूब 3:2)

 

  1. क्या व्यवस्था के सभी उल्लंघन समान रूप से जघन्य हैं?

उत्तर: कुछ पाप परमेश्वर की नजर में अपने आप में और विभिन्न प्रकार की हानि पहुँचाने के कारण बाकी पापो से अधिक जघन्य होते हैं। (यूहन्ना 19:11)

साक्षी आयतें:

यीशु ने उत्तर दिया, “यदि तुझे ऊपर से न दिया जाता, तो तेरा मुझ पर कुछ अधिकार न होता; इसलिये जिसने मुझे तेरे हाथ पकड़वाया है उसका पाप अधिक है।” (यूहन्ना 19:11)

 

  1. प्रत्येक पाप किस योग्य है?

उत्तर: प्रत्येक पाप इस जीवन और आने वाले जीवन- दोनों में परमेश्वर के क्रोध और शाप के योग्य है (इफिसियों 5:6; भजन संहिता 11:6)।

साक्षी आयतें:

कोई तुम्हें व्यर्थ बातों से धोखा न दे, क्योंकि इन ही कामों के कारण परमेश्‍वर का क्रोध आज्ञा न माननेवालों पर भड़कता है। (इफिसियों 5:6)

 वह दुष्‍टों पर वह दुष्‍टों पर फन्दे बरसाएगा;

आग और गन्धक और प्रचण्ड लूह उनके

कटोरों में बाँट दी जाएँगी।

बरसाएगा;

आग और गन्धक और प्रचण्ड लूह उनके

कटोरों में बाँट दी जाएँगी। (भजन संहिता 11:6)

 

  1. हम पाप के कारण उसके जिस क्रोध और शाप के योग्य हैं- उससे कैसे बच सकते हैं?

उत्तर: हम पाप के कारण उसके जिस क्रोध और शाप के योग्य हैं- उससे बचने के लिए हमें प्रभु यीशु मसीह के लहू और धार्मिकता पर निर्भर होते हुए उस पर विश्वास करना होगा (यूहन्ना 3:16)। इस विश्वास में अतीत के लिए पश्चाताप शामिल है (प्रेरितों के काम 20:21) और यह भविष्य में पवित्रता की ओर ले जाता है।

साक्षी आयतें:

 “क्योंकि परमेश्‍वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्‍वास करे वह नष्‍ट न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। (यूहन्ना 3:16)

 वरन् यहूदियों और यूनानियों के सामने गवाही देता रहा कि परमेश्‍वर की ओर मन फिराना और हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्‍वास करना चाहिए। (प्रेरितों के काम 20:21)

 

  1. यीशु मसीह में विश्वास क्या है ?

उत्तर: यीशु मसीह में विश्वास एक उद्धार करने वाला अनुग्रह है (इब्रानियों 10:39), जिसके द्वारा हम उद्धार के लिए केवल सुसमाचार में प्रकट मसीह को ग्रहण करते (यूहन्ना 1:12) और उस पर निर्भर हो जाते हैं (फिलिप्पियों 3:9; यशायाह 33:22)।

साक्षी आयतें:

पर हम हटनेवाले नहीं कि नाश हो जाएँ पर विश्‍वास करनेवाले हैं कि प्राणों को बचाएँ। (इब्रानियों 10:39)

 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं। (यूहन्ना 1:12)

 और उसमें पाया जाऊँ; न कि अपनी उस धार्मिकता के साथ, जो व्यवस्था से है, वरन् उस धार्मिकता के साथ जो मसीह पर विश्‍वास करने के कारण है और परमेश्‍वर की ओर से विश्‍वास करने पर मिलती है; (फिलिप्पियों 3:9)

 क्योंकि यहोवा हमारा न्यायी, यहोवा हमारा हाकिम, यहोवा हमारा राजा है, वही हमारा उद्धार करेगा। (यशायाह 33:22)

 

  1. जीवन के लिए पश्चाताप क्या है?

उत्तर: जीवन के लिए पश्चाताप एक बचाने वाला उद्धार करने वाला अनुग्रह है, (प्रेरितों 11:18) जिसके द्वारा एक पापी, उसके पापों की सच्ची समझ पाकर, (प्रेरितों के काम 2:37) और मसीह में परमेश्वर की दया को जानकर, (योएल 2:13) अपने पाप के प्रति शोक और घृणा के साथ इससे मुड़कर (यिर्मयाह 31:18-19) और नई आज्ञाकारिता के लिए प्रयास करने के पूरे उद्देश्य के साथ (भजन 119:59) परमेश्वर की ओर फिरता है, ।

साक्षी आयतें:

यह सुनकर वे चुप रहे, और परमेश्‍वर की बड़ाई करके कहने लगे, “तब तो परमेश्‍वर ने अन्यजातियों को भी जीवन के लिये मन फिराव का दान दिया है।” (प्रेरितों के काम 11:18)

 तब सुननेवालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, “हे भाइयो, हम क्या करें?” (प्रेरितों के काम 2:37)

 अपने वस्त्र नहीं, अपने मन ही को फाड़कर,” अपने परमेश्‍वर यहोवा की ओर फिरो; क्योंकि वह अनुग्रहकारी, दयालु, विलम्ब से क्रोध करनेवाला, करुणानिधान और दु:ख देकर पछतानेहारा है।  (योएल 2:13)

 निश्‍चय मैं ने एप्रैम को ये बातें कहकर विलाप करते सुना है, ‘तू ने मेरी ताड़ना की, और मेरी ताड़ना ऐसे बछड़े की सी हुई जो निकाला न गया हो; परन्तु अब तू मुझे फेर, तब मैं फिरूँगा, क्योंकि तू मेरा परमेश्‍वर है। भटक जाने के बाद मैं पछताया; और सिखाए जाने के बाद मैं ने छाती पीटी; पुराने पापों को स्मरण कर मैं लज्जित हुआ और मेरा मुँह काला हो गया।’ (यिर्मयाह 31:18-19)

 मैं ने अपनी चालचलन को सोचा,

और तेरी चितौनियों का मार्ग लिया। (भजन 119:59)

 

  1. वो बाह्य साधन क्या हैं जिनके द्वारा पवित्र आत्मा हमें उद्धार के लाभ प्रदान करता है?

उत्तर: बाह्य साधन जिनके द्वारा पवित्र आत्मा हमें उद्धार के लाभ प्रदान करता है वो हैं: वचन, जिसके द्वारा हमे आत्मिक जन्म दिया जाता है (याकूब 1:18) और बपतिस्मा, प्रभु-भोज, प्रार्थना और मनन (प्रेरितों 2:41, 42), जिसके द्वारा विश्वासियों को उनके परम पवित्र विश्वास में आगे बढ़ाया जाता है।

साक्षी आयतें:

अत: जिन्होंने उसका वचन ग्रहण किया उन्होंने बपतिस्मा लिया; और उसी दिन तीन हज़ार मनुष्यों के लगभग उनमें मिल गए। और वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने, और रोटी तोड़ने, और प्रार्थना करने में लौलीन रहे। (प्रेरितों 2:41, 42)

 उसने अपनी ही इच्छा से हमें सत्य के वचन के द्वारा उत्पन्न किया, ताकि हम उसकी सृष्‍टि की हुई वस्तुओं में से एक प्रकार के प्रथम फल हों। (याकूब 1:18)

 

  1. वचन को उद्धार के लिए कैसे प्रभावशाली बनाया जाता है?

उत्तर: परमेश्वर का आत्मा उद्धार के लिए विश्वास के माध्यम से (रोमियों 1:16) वचन के पठन और विशेषकर प्रचार को पापियों को कायल करने और उन्हें बदलने (भजन संहिता 19:7) और उन्हें पवित्रता और शांति में बढ़ाने (1 थिस्सलुनीकियों 1:6) के लिए एक प्रभावशाली साधन बनाता है ।

साक्षी आयतें:

यहोवा की व्यवस्था खरी है, वह प्राण को

बहाल कर देती है;

यहोवा के नियम विश्‍वासयोग्य हैं,

साधारण लोगों को बुद्धिमान बना देते हैं; (भजन संहिता 19:7)

 क्योंकि मैं सुसमाचार से नहीं लजाता, इसलिये कि वह हर एक विश्‍वास करनेवाले के लिये, पहले तो यहूदी फिर यूनानी के लिये, उद्धार के निमित्त परमेश्‍वर की सामर्थ्य है। (रोमियों 1:16)

 तुम बड़े क्लेश में, पवित्र आत्मा के आनन्द के साथ, वचन को मानकर हमारी और प्रभु की सी चाल चलने लगे। (1 थिस्सलुनीकियों 1:6)

 

  1. वचन को कैसे पढ़ा और सुना जाए कि वह उद्धार के लिए प्रभावी बन जाए?

उत्तर: वचन उद्धार के लिए प्रभावी बन सके, इसके लिए हमें  वचन के पास मेहनत (नीतिवचन 8:34), तैयारी (1 पतरस 2:1-2) और प्रार्थना (भजन संहिता 119:18) के साथ आना चाहिए; विश्वास (इब्रानियों 4:2) और प्रेम  (2 थिस्सलुनीकियों 2:10) के साथ इसे ग्रहण करना चाहिए; अपने दिलों को इससे भर लेना चाहिए (भजन 119:11) और अपने जीवनों में इस पर चलना चाइये (याकूब 1:25)।

साक्षी आयतें:

क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो मेरी सुनता,

वरन् मेरी डेवढ़ी पर प्रतिदिन खड़ा रहता,

और मेरे द्वारों के खंभों के पास दृष्‍टि

लगाए रहता है। (नीतिवचन 8:34)

 इसलिये सब प्रकार का बैरभाव और छल और कपट और डाह और निन्दा को दूर करके, 2नये जन्मे हुए बच्‍चों के समान निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो, ताकि उसके द्वारा उद्धार पाने के लिये बढ़ते जाओ, (1 पतरस 2:1-2)

 मेरी आँखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की

अद्भुत बातें देख सकूँ। (भजन संहिता 119:18)

 क्योंकि हमें उन्हीं की तरह सुसमाचार सुनाया गया है, पर सुने हुए वचन से उन्हें कुछ लाभ न हुआ; क्योंकि सुननेवालों के मन में विश्‍वास के साथ नहीं बैठा। (इब्रानियों 4:2)

 और नाश होनेवालों के लिये अधर्म के सब प्रकार के धोखे के साथ होगा; क्योंकि उन्होंने सत्य से प्रेम नहीं किया जिस से उनका उद्धार होता। (2 थिस्सलुनीकियों 2:10)

 मैं ने तेरे वचन को अपने हृदय में

रख छोड़ा है,

कि तेरे विरुद्ध पाप न करूँ। (भजन 119:11)

 पर जो व्यक्‍ति स्वतंत्रता की सिद्ध व्यवस्था पर ध्यान करता रहता है, वह अपने काम में इसलिये आशीष पाएगा कि सुनकर भूलता नहीं पर वैसा ही काम करता है। (याकूब 1:25)

 

  1. बपतिस्मा और प्रभु भोज कैसे आत्मिक रूप से लाभदायक बनते हैं?

उत्तर: बपतिस्मा और प्रभु भोज ना तो स्वयं के ना ही ये सेवाएं देने वाले किसी सेवक के गुण के कारण  (1 कुरिन्थियों 3:7; 1 पतरस 3:21), परन्तु विश्वास से उन्हें लेने वालों में केवल यीशु मसीह की आशीष (1 कुरिन्थियों 3:6) और आत्मा के कार्य के द्वारा (1 कुरिन्थियों 12:13) आत्मिक रूप से लाभदायक  बनते हैं।

साक्षी आयतें:

इसलिये न तो लगानेवाला कुछ है और न सींचनेवाला, परन्तु परमेश्‍वर ही सब कुछ है जो बढ़ानेवाला है। (1 कुरिन्थियों 3:7)

 उसी पानी का दृष्‍टान्त भी, अर्थात् बपतिस्मा, यीशु मसीह के जी उठने के द्वारा, अब तुम्हें बचाता है; इससे शरीर के मैल को दूर करने का अर्थ नहीं है, परन्तु शुद्ध विवेक से परमेश्‍वर के वश में हो जाने का अर्थ है। (1 पतरस 3:21)

 मैं ने लगाया, अपुल्‍लोस ने सींचा, परन्तु परमेश्‍वर ने बढ़ाया। (1 कुरिन्थियों 3:6)

 क्योंकि हम सब ने क्या यहूदी हो क्या यूनानी, क्या दास हो क्या स्वतंत्र, एक ही आत्मा के द्वारा एक देह होने के लिये बपतिस्मा लिया, और हम सब को एक ही आत्मा पिलाया गया। (1 कुरिन्थियों 12:13)

 

  1. बपतिस्मा क्या है?

उत्तर: बपतिस्मा यीशु मसीह द्वारा स्थापित नए नियम का एक धार्मिक संस्कार है, जो कि

(मत्ती 28:19) बपतिस्मा लेने वाले व्यक्ति के लिए मसीह के साथ उसकी मृत्यु, गाड़े जाने और पुनुरुत्थान में संगति (रोमियों 6:3; कुलुस्सियों 2:12), उसको मसीह में रोप दिए जाने (गलातियों 3:27), पापों की क्षमा (मरकुस 1:4; प्रेरितों 22:16), जीवन के नयेपन में जीने और चलने के लिए (रोमियों 6:4-5) मसीह यीशु के द्वारा परमेश्वर के सामने स्वयं का समर्पण कर देने का एक चिन्ह है।

साक्षी आयतें:

इसलिये तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओयशा 49:6; और उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो (मत्ती 28:19)

 क्या तुम नहीं जानते कि हम सब जिन्होंने मसीह यीशु का बपतिस्मा लिया, उसकी मृत्यु का बपतिस्मा लिया। (रोमियों 6:3)

 और उसी के साथ बपतिस्मा में गाड़े गए और उसी में परमेश्‍वर की सामर्थ्य पर विश्‍वास करके, जिसने उसको मरे हुओं में से जिलाया, उसके साथ जी भी उठे। (कुलुस्सियों 2:12)

 और तुम में से जितनों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है उन्होंने मसीह को पहिन लिया है। (गलातियों 3:27)

 यूहन्ना आया, जो जंगल में बपतिस्मा देता, और पापों की क्षमा के लिये मनफिराव के बपतिस्मा का प्रचार करता था। (मरकुस 1:4)

 ‘अब क्यों देर करता है? उठ, बपतिस्मा ले, और उसका नाम लेकर अपने पापों को धो डाल।’ (प्रेरितों 22:16)

 अत: उस मृत्यु का बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें। क्योंकि यदि हम उसकी मृत्यु की समानता में उसके साथ जुट गए हैं, तो निश्‍चय उसके जी उठने की समानता में भी जुट जाएँगे। (रोमियों 6:4-5)

 

  1. बपतिस्मा किसे दिया जाना चाहिए?

उत्तर: बपतिस्मा सिर्फ उन्ही को दिया जाना चाहिए जो वास्तव में परमेश्वर के प्रति पश्चाताप और हमारे प्रभु यीशु मसीह में विश्वास दिखाते हैं और किसी को भी नहीं। (प्रेरितों के काम 2:38; मत्ती 3:6; मरकुस 16:16; प्रेरितों 8:12, 36-37; 10:47-48)

साक्षी आयतें:

पतरस ने उनसे कहा, “मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे। (प्रेरितों 2:38)

 उन्होंने अपने–अपने पापों को मानकर यरदन नदी में उससे बपतिस्मा लिया। (मत्ती 3:6)

 जो विश्‍वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्‍वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा; (मरकुस 16:16)

 परन्तु जब उन्होंने फिलिप्पुस का विश्‍वास किया जो परमेश्‍वर के राज्य और यीशु के नाम का सुसमाचार सुनाता था तो लोग, क्या पुरुष, क्या स्त्री, बपतिस्मा लेने लगे। (प्रेरितों 8:12)

 मार्ग में चलते–चलते वे किसी जल की जगह पहुँचे। तब खोजे ने कहा, “देख यहाँ जल है, अब मुझे बपतिस्मा लेने में क्या रोक है।” फिलिप्पुस ने कहा, “यदि तू सारे मन से विश्‍वास करता है तो ले सकता है।” उसने उत्तर दिया, “मैं विश्‍वास करता हूँ कि यीशु मसीह परमेश्‍वर का पुत्र है।” (प्रेरितों  8:36-37)

 “क्या कोई जल की रोक कर सकता है कि ये बपतिस्मा न पाएँ, जिन्होंने हमारे समान पवित्र आत्मा पाया है?” और उसने आज्ञा दी कि उन्हें यीशु मसीह के नाम में बपतिस्मा दिया जाए। तब उन्होंने उससे विनती की कि वह कुछ दिन और उनके साथ रहे। (प्रेरितों 10:47-48)

 

  1. क्या विश्वास दिखाने वालों के शिशुओं को बपतिस्मा देना चाहिए ?

उत्तर: विश्वास दिखाने वालों के शिशुओं को बपतिस्मा नहीं देना चाहिए, क्योंकि पवित्र शास्त्र में उनके बपतिस्मे की न तो कोई आज्ञा है और न ही उदाहरण (नीतिवचन 30:6)।

साक्षी आयतें:

उसके वचनों में कुछ मत बढ़ा,

ऐसा न हो कि वह तुझे डाँटे और

तू झूठा ठहरे। (नीतिवचन 30:6)

 

  1. सही ढंग से कैसे बपतिस्मा दिया जाता है?

उत्तर: सही ढंग से बपतिस्मा पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से जैसा मसीह ने स्थापित किया और प्रेरितों ने अभ्यास किया (मत्ती 28:19-20)– उसके अनुसार व्यक्ति के पूरे शरीर को पानी में डुबोने के द्वारा (मत्ती 3:16; यूहन्ना 3:23) दिया जाता है, ना कि मनुष्यों कि रीति के अनुसार पानी छिड़कने या उंडेलने, या शरीर के किसी भाग को डुबोने के द्वारा। (यूहन्ना 4:1-2; प्रेरितों 8:38-39)

साक्षी आयतें:

इसलिये तुम जाओ, सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदा तुम्हारे संग हूँ। (मत्ती 28:19-20)

और यीशु बपतिस्मा लेकर तुरन्त पानी में से ऊपर आया, और देखो, उसके लिए आकाश खुल गया और उसने परमेश्‍वर के आत्मा को कबूतर के समान उतरते और अपने ऊपर आते देखा। (मत्ती 3:16)

यूहन्ना भी शालेम के निकट ऐनोन में बपतिस्मा देता था, क्योंकि वहाँ बहुत जल था, और लोग आकर बपतिस्मा लेते थे– (यूहन्ना 3:23)

फिर जब प्रभु को मालूम हुआ कि फरीसियों ने सुना है कि यीशु यूहन्ना से अधिक चेले बनाता और उन्हें बपतिस्मा देता है – यद्यपि यीशु स्वयं नहीं वरन् उसके चेले बपतिस्मा देते थे (यूहन्ना 4:1-2)

तब उसने रथ खड़ा करने की आज्ञा दी, और फिलिप्पुस और खोजा दोनों जल में उतर पड़े, और उसने खोजा को बपतिस्मा दिया। जब वे जल में से निकलकर ऊपर आए, तो प्रभु का आत्मा फिलिप्पुस को उठा ले गया, और खोजे ने उसे फिर न देखा, और वह आनन्द करता हुआ अपने मार्ग पर चला गया। (प्रेरितों 8:38-39)

 

  1. सही तरीके से बपतिस्मा लेने वाले लोगों का क्या कर्तव्य है?

उत्तर: सही तरीके से बपतिस्मा लेने वाले लोगों का यह कर्तव्य है कि वे यीशु मसीह के किसी विशेष और व्यवस्थित चर्च  में समर्पित सदस्य बन जाए (प्रेरितों 2:47; प्रेरितों 9:26; 1 पतरस 2:5), ताकि वे प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाओं और धार्मिक संस्कारों को निर्दोष रूप में पूरा कर सकें (लूका 1:6)।

साक्षी आयतें:

और परमेश्‍वर की स्तुति करते थे, और सब लोग उनसे प्रसन्न थे: और जो उद्धार पाते थे, उनको प्रभु प्रतिदिन उनमें मिला देता था। (प्रेरितों के काम 2:47)

 यरूशलेम में पहुँचकर उसने चेलों के साथ मिल जाने का प्रयत्न किया; परन्तु सब उससे डरते थे, क्योंकि उनको विश्‍वास न होता था, कि वह भी चेला है। (प्रेरितों 9:26)

 तुम भी आप जीवते पत्थरों के समान आत्मिक घर बनते जाते हो, जिससे याजकों का पवित्र समाज बनकर, ऐसे आत्मिक बलिदान चढ़ाओ जो यीशु मसीह के द्वारा परमेश्‍वर को ग्राह्य हैं। (1 पतरस 2:5)

 वे दोनों परमेश्‍वर के सामने धर्मी थे, और प्रभु की सारी आज्ञाओं और विधियों पर निर्दोष चलनेवाले थे। (लूका 1:6)

 

  1. प्रभु भोज क्या है?

उत्तर: प्रभु भोज नए नियम में यीशु मसीह द्वारा स्थापित एक धार्मिक संस्कार है, जिसमें, जैसा कि उसने नियुक्त किया, रोटी और दाखररस देने और लेने के द्वारा उसकी मृत्यु को प्रदर्शित करते हैं (1 कुरिन्थियों 11:23-26) और योग्य प्राप्तकर्ता, शारीरिक और सांसारिक तरीके से नहीं, बल्कि आत्मिक पोषण और अनुग्रह में वृद्धि के लिए विश्वास से उसके शरीर और लहू में और उसके सारे लाभों में भागी कर दिए जाते हैं (1 कुरिन्थियों 10:16)।

साक्षी आयतें:

क्योंकि यह बात मुझे प्रभु से पहुँची, और मैं ने तुम्हें भी पहुँचा दी कि प्रभु यीशु ने जिस रात वह पकड़वाया गया, रोटी ली, और धन्यवाद करके तोड़ी और कहा, “यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है : मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।” इसी रीति से उसने बियारी के पीछे कटोरा भी लिया और कहा, “यह कटोरा मेरे लहू में नई वाचा है : जब कभी पीओ, तो मेरे स्मरण के लिये यही किया करो। क्योंकि जब कभी तुम यह रोटी खाते और इस कटोरे में से पीते हो, तो प्रभु की मृत्यु को जब तक वह न आए, प्रचार करते हो। (1 कुरिन्थियों 11:23-26)

 वह धन्यवाद का कटोरा, जिस पर हम धन्यवाद करते हैं; क्या मसीह के लहू की सहभागिता नहीं? वह रोटी जिसे हम तोड़ते हैं, क्या वह मसीह की देह की सहभागिता नहीं? (1 कुरिन्थियों 10:16)

 

  1. प्रभु भोज को उचित रीति से लेने के लिए क्या आवश्यक है ?

उत्तर: प्रभु भोज को उचित रीति से लेने के लिए- अपने आप को प्रभु की देह  (1 कुरिन्थियों 11:28-29) को समझने के ज्ञान, मसीह में से खाने के विश्वास  (2 कुरिन्थियों 13:5), पश्चाताप (1 कुरिन्थियों 11:31), प्रेम (1 कुरिन्थियों 11:18-20)  और नए आज्ञापालन (1 कुरिन्थियों 5:8) के विषय में जांचे; कहीं ऐसा ना हो कि अनुचित रीति से खाने और पीने के द्वारा वे अपने ऊपर दंड ले आएं  (1 कुरिन्थियों 11:27-29)।

साक्षी आयतें:

अपने आप को परखो कि विश्‍वास में हो कि नहीं। अपने आप को जाँचो। क्या तुम अपने विषय में यह नहीं जानते कि यीशु मसीह तुम में है? नहीं तो तुम जाँच में निकम्मे निकले हो। (2 कुरिन्थियों 13:5)

 यदि हम अपने आप को जाँचते तो दण्ड न पाते। (1 कुरिन्थियों 11:31)

 क्योंकि पहले तो मैं यह सुनता हूँ, कि जब तुम कलीसिया में इकट्ठे होते हो तो तुम में फूट होती है, और मैं इस पर कुछ–कुछ विश्‍वास भी करता हूँ। क्योंकि दलबन्दी भी तुम में अवश्य होगी, इसलिये कि जो लोग तुम में खरे हैं वे प्रगट हो जाएँ। अत: तुम जो एक जगह में इकट्ठे होते हो तो यह प्रभु–भोज खाने के लिये नहीं, (1 कुरिन्थियों 11:18-20)

 इसलिये आओ, हम उत्सव में आनन्द मनावें, न तो पुराने खमीर से और न बुराई और दुष्‍टता के खमीर से, परन्तु सीधाई और सच्‍चाई की अखमीरी रोटी से। (1 कुरिन्थियों 5:8)

 इसलिये जो कोई अनुचित रीति से प्रभु की रोटी खाए या उसके कटोरे में से पीए, वह प्रभु की देह और लहू का अपराधी ठहरेगा। इसलिये मनुष्य अपने आप को जाँच ले और इसी रीति से इस रोटी में से खाए, और इस कटोरे में से पीए। क्योंकि जो खाते–पीते समय प्रभु की देह को न पहिचाने, वह इस खाने और पीने से अपने ऊपर दण्ड लाता है। (1 कुरिन्थियों 11:27-29)

 

  1. “जब तक वह न आए” शब्दों का क्या अर्थ है, जो कि प्रेरित पौलुस ने प्रभु भोज के के विषय में बात करते वक्त प्रयोग किए?

उत्तर: वे स्पष्ट रूप से हमें सिखाते हैं कि हमारा प्रभु यीशु मसीह दूसरी बार आएगा, जो सभी विश्वासियों की ख़ुशी और आशा है। (प्रेरितों 1:11; 1 थिस्सलुनीकियों 4:16)

साक्षी आयतें:

और उनसे कहा, “हे गलीली पुरुषो, तुम क्यों खड़े आकाश की ओर देख रहे हो? यही यीशु, जो तुम्हारे पास से स्वर्ग पर उठा लिया गया है, जिस रीति से तुम ने उसे स्वर्ग को जाते देखा है उसी रीति से वह फिर आएगा।” (प्रेरितों 1:11)

 क्योंकि प्रभु आप ही स्वर्ग से उतरेगा; उस समय ललकार, और प्रधान दूत का शब्द सुनाई देगा, और परमेश्‍वर की तुरही फूँकी जाएगी; और जो मसीह में मरे हैं, वे पहले जी उठेंगे। (1 थिस्सलुनीकियों 4:16)

 

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