पतन मनुष्य जाति को किस अवस्था में ले आया ? (चार्ल्स स्पर्जन प्रश्नोत्तरी-16)

पतन मनुष्य जाति को किस अवस्था में ले आया ?

उत्तर: पतन मनुष्य जाति  को पाप और दुर्गति की अवस्था में ले आया (रोमियों 5:18)।

साक्षी आयतें:

इसलिये जैसा एक अपराध सब मनुष्यों के लिये दण्ड की आज्ञा का कारण हुआ, वैसा ही एक धर्म का काम भी सब मनुष्यों के लिये जीवन के निमित्त धर्मी ठहराए जाने का कारण हुआ।  (रोमियों 5:18)

व्याख्या:

पतन मनुष्य जाति  को पाप और दुर्गति की अवस्था में ले आया। पतीत या गिरा हुआ मनुष्य पापी है, अर्थात उसका सम्पूर्ण अस्तित्व भ्रष्ट है या यूँ कहें कि जो कुछ भी परमेश्वर कि पवित्रता के मांगे हैं, पूरी तरह उनके विपरीत है। चूँकि परमेश्वर पवित्र है और मनुष्य पापी, तो मनुष्य परमेश्वर से दूर है। जीवन और हर भलाई के सोते से दूर होने के कारण मनुष्य दुर्गति की अवस्था में है अर्थात वह आज तरह तरह की पीड़ाओं से पीड़ित है और एक दिन मरेगा और फिर नरक में जाकर अनंत काल तक अपने पापों का दंड भोगेगा। निम्नलिखित शीर्षकों के द्वारा हम मनुष्य की अवस्था को और भी विस्तार से समझ सकते हैं :

  • पाप में मरे हुए, पाप के गुलाम और परमेश्वर को चाहने और खोजने में असमर्थ
  • परमेश्वर से अलग किए हुए, उसके दुश्मन और उसके क्रोध के पात्र
  • आशाहीन

पाप में मरे हुए, पाप के गुलाम और परमेश्वर को चाहने और खोजने में असमर्थ 

आदम ने जब पाप किया तो वह आत्मिक रूप से मर गया, जीवन के सोते से अलग हो गया, अपनी स्वतंत्र इच्छा को खो दिया, पाप का गुलाम अर्थात परमेश्वर को चाहने और खोजने में असमर्थ हो गया

जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे (इफिसियों 2:1)

परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो कि तुम जो पाप के दास थे (रोमियों 6:17)

जैसा लिखा है :
“कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं।
कोई समझदार नहीं;
कोई परमेश्वर का खोजनेवाला नहीं।
सब भटक गए हैं, सब के सब निकम्मे
बन गए हैं;
कोई भलाई करने वाला नहीं, एक भी
नहीं। (रोमियों 3:10-12)

 

परमेश्वर से अलग किए हुए, उसके दुश्मन और उसके क्रोध के पात्र 

जैसा हमने ऊपर देखा मनुष्य पाप के कारण परमेश्वर से दूर हो गया। उससे दूर होने के कारण सब भलाई से दूर हो गया और परमेश्वर का शत्रु बन गया और परमेश्वर के अनंत क्रोध को पीने के योग्य बन गया:

तुम जो पहले निकाले हुए थे और बुरे कामों के कारण मन से बैरी थे; (कुलुस्सियों 1:21)

इनमें हम भी सब के सब पहले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे, और शरीर और मन की इच्छाएँ पूरी करते थे, और अन्य लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे। ( (इफिसियों 2:3)

परन्तु डरपोकों, और अविश्वासियों, और घिनौनों, और हत्यारों और व्यभिचारियों, और टोन्हों, और मूर्तिपूजकों, और सब झूठों का भाग उस झील में मिलेगा जो आग और गन्धक से जलती रहती है : यह दूसरी मृत्यु है।” (प्रकाशितवाक्य 21:8)

आशाहीन 

जैसा की हमने ऊपर देखा मनुष्य परमेश्वर से अलग, शापित और नरक के मार्ग पर अग्रसर और पापों की क्षमा के लिए परमेश्वर को चाहने और खोजने में भी अक्षम है। इस तरह से वह आशाहीन रूप से खोया हुआ है।

तुम लोग उस समय मसीह से अलग, और इस्राएल की प्रजा के पद से अलग किए हुए, और प्रतिज्ञा की वाचाओं के भागी न थे, और आशाहीन और जगत में ईश्वररहित थे। (इफिसियों 2:12)

 

 

 

 

 

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