पाप क्या है ? (चार्ल्स स्पर्जन प्रश्नोत्तरी-14)

पाप क्या है ?

उत्तर: पमेश्वर के कानून/व्यवस्था को न मानना या उसका उल्लंघन करना पाप है (1 यूहन्ना 3:4)।

साक्षी आयतें:

जो कोई पाप करता है, वह व्यवस्था का विरोध करता है; और पाप तो व्यवस्था का विरोध है।  (1 यूहन्ना 3:4)

इसलिये जो कोई भलाई करना जानता है और नहीं करता, उसके लिये यह पाप है। (याकूब 4:17)

व्याख्या:

परमेश्वर ने मनुष्यों को एक व्यवस्था दी है, जो बताती है कि हमें हमारे सृजनहार परमेश्वर और साथी मनुष्यों से कैसे व्यहवार करना है। जब हम उसकी इस व्यवस्था का उल्लंघन करते हैं तो उसे पाप कहा जाता है। परमेश्वर ने आदम को भले और बुरे का फल खाने से मना किया था, परन्तु उसने वो फल खा लिया। परमेश्वर के विरोध में किये ऐसे कोई से भी काम पाप कहलाते हैं । परमेश्वर ने मूसा को व्यवस्था दी, उस व्यवस्था का उल्लंघन पाप था। उस व्यवस्था में नैतिक क़ानून भी शामिल थे, जो कि आज भी हम पर लागु हैं। उन नैतिक कानूनों का उल्लंघन पाप है। ये नैतिक क़ानून सिर्फ मूसा को ही नहीं दिए गए। ये तो सदा से थे। ये क़ानून तो परमेश्वर ने हर व्यक्ति के विवेक में उकेर रखे हैं। इस क़ानून के उल्लंघन का एक उदाहरण हम कैन में देख सकते हैं। उसने हाबिल को मार कर इसी क़ानून का उल्लंघन किया था।  परमेश्वर ने पुराने नियम में उसकी आराधना करने का तरीका बताया था, नादाब और अबीहू ने जब गलत तरीके से आराधना की, तो परमेश्वर ने उन्हें मार डाला क्योंकि उन्होंने पाप किया था। नए नियम में मूसा की व्यवस्था नहीं है, पर परमेश्वर ने सच्चाई और आत्मा से और व्यवस्थित तरीके से   आराधना करने को कहा है, इसका उल्लंघन करना पाप है। परमेश्वर ने हमें दया के कार्य करने को कहा है और जरूरतमंद के साथ अपने साधनों को बाटने को कहा है, यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो यह पाप है।

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