क्या यीशु मसीह हमे धनवान बनाने के लिए मरा?


तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह जानते हो, कि वह धनी होकर भी तुम्हारे लिये कंगाल बन गया ताकि उसके कंगाल हो जाने से तुम धनी हो जाओ। (2 कुरिन्थिओ 8:9)

बैनी हिन्, क्रेफलो डॉलर, जोसफ प्रिंस, जॉयस मायर,पॉल दिनाकरन, अंकुर नरूला, पी जी वर्घिस आदि समृद्धि गॉस्पेल के प्रचारक इस आयत को लेके कहते है की देखो यीशु मसीह हमे अमीर बनाने के लिए कंगाल हुआ या मरा । आइये देखते है की इसका मतलब क्या है । इस आयत में हम निम्नांकित चीज़े देखते हैं:

1. यीशु मसीह स्वर्ग में धनवान था ।

2. वो पृथ्वी पर आके कंगाल हुआ ।

3. वो कंगाल इसलिए हुआ ताकि उसकी कंगाली से हम धनवान बन जाये ।

4. उसने हमारे खातिर जो खोया** है  वो हमे मिल जायेगा ।

अब प्रश्न उठता है वो स्वर्ग में किन चीज़ों का धनी था और उसने पृथ्वी पे आके क्या खोया । इस प्रश्न का उत्तर देना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि उसने जो खोया है वही तो हमे मिलेगा । क्या उसके पास स्वर्ग में बँगला, गाड़ी, बैंक बैलेंस, सोना-चांदी, वस्त्र और शारीरिक समृद्धि आदि थे? नहीं । क्योंकि परमेश्वर को इन सब चीज़ों की आवश्यकता नहीं. वह तो स्वयं-पर्याप्त (self sufficient ) है । सब कुछ उसी का है परन्तु उसे हमारी तरह जीने के लिए इस ब्रहम्माण्ड और इसमें की किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं । जब उसके पास स्वर्ग में ये सब चीज़े नहीं थी तो उसने पृथ्वी पे आके इनको नहीं खोया और जब पृथ्वी पे आके इनको नहीं खोया तो हमे इस आयत के अनुसार ये सब चीज़े देने का वादा नहीं है । क्योंकि जो चीज़े उसने हमारे लिए नहीं त्यागी वो चीज़े हमे देने का वादा कैसे इस आयत में हो सकता है? मैं ये नहीं कह रहा की परमेश्वर पृथ्वी पर हमारी आवश्यकताए पूरी नहीं करता । हाँ, वो आवश्यकताएं पूरी करता है लेकिन उसने कहीं भी हमे अमीर बनाने का या हमारी सारी इच्छाओं और लालच को पूरा करने का वादा नहीं किया ।

आइये देखते है उसने पृथ्वी पे आके क्या खोया. उसने बहुत कुछ खोया. जैसे सृष्टिकार परमेश्वर और इस दुनिया का मालिक होकर भी वह दास बन गया **** (फिलिप्पीओं 2:5-8) । लेकिन हम इस पर ध्यान केंद्रित नहीं करेंगे, क्योंकि यहाँ उसके और हमारे बीच में अदला बदली (एक्सचेंज) संभव नहीं । वह पृथ्वी पर दास बन गया का मतलब यह कभी नहीं हो सकता की हम परमेश्वर या इस ब्रहम्माण्ड के मालिक बन जायेंगे । लेकिन हम उन ही चीज़ों पर अभी अपना ध्यान केंद्रित करेंगे जिनका यीशु मसीह और हमारे बीच में अदला बदली (एक्सचेंज) हो सके ।

1. उसने स्वर्ग की महिमा को खोया । (फिलिप्पीओं 2:5-8)

2. उसने क्रूस पर पिता को खोया । (मत्ती 27:46)

3. धर्मी होकर भी क्रूस पर पाप बन गया (वह क्रूस पर पापी नहीं बना, पाप बना अर्थात उसने हमारे पाप उठा लिए और परमेश्वर पिता ने हमारा नरक उसे पिला दिया । ) (2 कोरिन्थिओ 5:21)

उसने ये चीज़े खोई तो हमे इस आयत के हिसाब से क्या मिलेगा:

1. उसने हमारे खातिर स्वर्ग की महिमा  खोई इसलिए हमे वह स्वर्ग की महिमा में ले जायेगा । (रोमियों 8:30)

2. उसने क्रूस पर पिता को खोया, इसलिए हमारा पिता से रिश्ता जुड़ गया । (इफिसियों  2:18)

3. वह धर्मी होकर भी क्रूस पर पाप बन गया इसलिए आज हम उसके द्वारा परमेश्वर की नज़रों में धर्मी ठहरे । (2 कोरिन्थिओ 5:21)

उसने स्वर्ग छोड़ कर गाडी, बँगला, और भौतिक समृद्धि नहीं खोई की हमे इस आयत के अनुसार ये सब मिल जायेगा. यह एक झूठी शिक्षा है । अमीर तो हमे शैतान भी बना सकता है । याद करें मत्ती 4:9 में शैतान ने यीशु मसीह को दुनिया की सारी संपत्ति देने का प्रलोभन दिया था यदि वो उसको दंडवत करे तो। आज कई झूठे शिक्षक बहुत अमीर है क्योंकि वो नाम तो यीशु मसीह का लेते है लेकिन सेवा अपने पिता शैतान की करते है । उनका पिता उन्हें इनाम में धन दौलत देता है । हमारा पिता तो हमे समय-समय पर दुःख देकर हमारा पवित्रीकरण करता है ।

अमीर और गरीब की बात आई तो याकूब ने हमे सिखाया की परमेश्वर ने गरीबों को विश्वास में धनी होने और परमेश्वर के राज्य के अधिकारी होने के लिए चुना:

हे मेरे प्रिय भाइयों सुनो; क्या परमेश्वर ने इस जगत के कंगालों को नहीं चुना कि विश्वास में धनी, और उस राज्य के अधिकारी हों, जिस की प्रतिज्ञा उस ने उन से की है जो उस से प्रेम रखते हैं  ।

  (याकूब – अध्याय  2:5)

अगर यीशु मसीह अमीर बनाने के लिए मरता तो याकूब की कलीसिया में सब अमीर होते. वहां वो झूंठे शिक्षकों की तरह ये नहीं कह रह था की अमीरी को क्लेम करो और पा लो । उसने कहा परमेश्वर ने गरीबों को विश्वास में अमीर होने के लिए चुना है ।

पौलुस 2 कुरिन्थिओ 8 अध्याय में सिखा रहा है की जैसे यीशु मसीह ने स्वर्ग छोड़ दिया अपने चुने हुए लोगों के लिए वैसे ही तुम भी अपनी बढ़ौतरी और घटी दोनों में से त्याग पूर्वक मसीह की देह के लिए दान देते रहो । ये ज़रूरी क्यों हैं, क्योंकि जो मसीह ने अपनी देह (कलीसिया) के लिए खोया वो यदि हमे मिल गया, तो हम भी उसी देह के लिए त्याग करके दान करेंगे । ये आयत झूठी समृद्धि गॉस्पेल प्रचारक जो सीखाते हैं ठीक उसका उल्टा बोल रही है ।

ये कह रही है की हमे मसीह की देह के लिए सब कुछ त्यागने और कंगाल होने के लिए भी तैयार होना चाहिए, जैसा की यीशु मसीह ने किया स्वर्ग त्याग कर । पौलुस ने भी ऐसा ही किया । वह फरीसी था, अमीर था, इज़्ज़तदार था, प्रसिद्ध था। लेकिन वो हमे फिलिप्पीओं  3:8-9  में कहता है की उसने अपने फरिसीपने, अपने पद, अपनी इज़्ज़त, शौहरत और अपने धन-दौलत सब को कूड़ा करकट समझा ताकि वो मसीह की धार्मिकता को पा जाये, उसके साथ दुःख उठाये और उसकी समानता में ढल जाये (फिलिप्पीओं 3:10-11).

मैं आप से पूछता हूँ क्या परमेश्वर ने पौलुस, पतरस, यूहन्ना और उसके किसी चेले को भौतिक सुख सुविधाएं या अमीरी दी? क्या उन्होंने कभी पॉल दिनाकरन, पॉल योंगे चु. जोसफ प्रिंस की तरह अपने साम्राज्य (एम्पायर) खड़े किये?  नहीं । पहली शताब्दी की कलीसिया में क्या अमीर बनाने की शिक्षा दी जा रही थी? नहीं । हम देखते है की वो लोग सब कुछ त्याग कर, अपनी संपत्ति को बेच कर पैसा लाकर प्रेरितों को दे रहे थे (प्रेरितों 4:34). ताकि वो आत्मिक रूप से बढ़े, भले ही भौतिक रूप से कमतर हो जाये । वो जानते थे की हमको पृथ्वी पर धन इकठ्ठा नहीं करना । परमेश्वर हमारी ज़रूरतों को पूरा करेगा । वो जानते थे की यीशु मसीह उन्हें  आत्मिक रूप से अमीर बनाने के लिए खुद क्रूस पर पाप बन गया । ये वो कर रहे थे जो उस अमीर जवान ने नहीं किया था जिसको यीशु मसीह ने कहा था की अपना धन गरीबों में बाँट दे, तुझे स्वर्ग में बड़ा धन मिलेगा ( मरकुस 10:21) ।

ये लोग स्वर्ग में अपना धन इकठ्ठा कर रहे थे (मति 6:20) सुसमाचार के प्रचार के लिए पृथ्वी पर अपना सारा धन लुटा कर । 2 कुरिन्थिओ 8:9 भी यही कह रही है जैसे मसीह ने सब त्याग दिया अपनी देह के लिए ऐसे ही तुम भी अपनी घटी में से देते रहो । उस धनी व्यक्ति जैसे लोग आज के पासवानों के पास आते है तो वो बड़ा दशमांश और बाकी तमाम तरह के अलग-अलग दान लेके नकली क्रिस्चियन बना लेते हैं । उसे अपना इंकार करना नहीं सिखाते । यीशु मसीह के लिए अपने आप का, अपने धन का, अपनी इज़्ज़त का, अपने लोगों का इंकार करना नहीं सिखाते ।

एक और प्रश्न पूछता हूँ । परमेश्वर की योजना पौलुस और 12 में से 11 चैलों के लिए कठिनाईया, बीमारियां (गलातियों 4:13), कमजोरिया, दुःख, कष्ट, भूखमरी , नंगापन , सताव, कारावास (2 कुरिन्थिओ 11:23-30), और सताने वालों के हाथों दर्दनाक मौत मरने की थी । आप को क्यों लगता है की परमेश्वर की योजना आपको इस दुनिया में अमीर, इज़्ज़तदार, प्रसिद्ध, शारीरिक  रूप से स्वस्थ बानाने की है? क्या आप नहीं जानते की परमेश्वर का अनुग्रह हमारे लिए काफी है (2 कुरिन्थिओ 12:9) चाहे वो हमारी बिमारी, गरीबी, दुखों  से छुड़ाने की प्रार्थना का उत्तर हाँ या नहीं में दे ( 1यूहन्ना 5:24) । अगर आप किसी भी आयत का संदर्भ से बहार अर्थ ना निकले तो कही भी आप को स्वास्थ्य और  अमीरी का वायदा नहीं किया गया है । बस ये है की वो हमारी ज़रूरतों को पूरा करेगा और हर दुःख में हमारे साथ रह कर हम को पवित्र करेगा । ध्यान रहे गॉस्पेल स्वयं पूर्ति (self-fulfillment) का नहीं, स्वयं का त्याग और इंकार करने  (self-denial) का है । प्रभु यीशु मसीह ने कहा है :

 यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप का इन्कार करे और अपना क्रूस उठाए, और मेरे पीछे हो ले। (मत्ती 16:24)

उपर्युक्त आयत में क्या लिखा है की आप यीशु मसीह के पास संसार की सारी चीज़े पाओगे? नहीं, यहाँ स्पष्ट लिखा है की हमको सारी अभिलाषाओं  का इंकार करना है, यीशु का क्रूस उठाना है और उसके पीछे चलना है । यीशु मसीह इतना योग्य है की उसके लिए सब कुछ छोड़ दिया जाये । अब मैं बताता हूँ की यीशु मसीह के अनुसार उसके पास आने वालों को इस दुनिया में क्या मिलेगा:

1.  पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे। ( 2 तीमुथियुस – अध्याय 3:12)

2. और तुम इसी के लिये बुलाए भी गए हो क्योंकि मसीह भी तुम्हारे लिये दुख उठा कर, तुम्हें एक आदर्श दे गया है, कि तुम भी उसके चिन्ह पर चलो। (1 पतरस – अध्याय 2:21)

3.  मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि तुम्हें मुझ में शान्ति मिले; संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बांधो, मैं ने संसार को जीन लिया है (यूहन्ना – अध्याय 16:33)

उपर्युक्त आयतों में हमने देखा है की हमे दुःख उठाने के लिए बुलाया गया है.

प्रेरितों क काम 9:23 में परमेश्वर कहता है की पौलुस को उसने अपने खातिर बहुत ही दुःख उठाने के लिए बुलाया है ।

यूहन्ना 21:18  में यीशु मसीह पतरस से कहता है की तुझे मेरे खातिर क्रूस पर मरना पड़ेगा ।

पौलुस 2 तीमुथियुस 2:3 में तीमुथी को दुःख उठाने के लिए प्रेरित करता है । वो ये नहीं कहता की सकारात्मक अंगीकार कर तुझे अमीरी, चंगाई, सेफ्टी मिलेगी ।

लेकिन झूंठे शिक्षक आप को ये सब नहीं बताएँगे क्योंकि वो मसीहियत को धन कमाने का साधन मानते है (1 तीमुथियुस – अध्याय 6:5)

परन्तु पौलुस 1 तीमुथियुस अध्याय 6 की इन आयतों में क्या बोलता है :

आयत 6 पर सन्तोष सहित भक्ति बड़ी कमाई है।

आयत 7 क्योंकि न हम जगत में कुछ लाए हैं और न कुछ ले जा सकते हैं।

आयत 8 और यदि हमारे पास खाने और पहिनने को हो, तो इन्हीं पर सन्तोष करना चाहिए।

आयत 9 पर जो धनी होना चाहते हैं, वे ऐसी परीक्षा, और फंदे और बहुतेरे व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं में फंसते हैं, जो मनुष्यों को बिगाड़ देती हैं और विनाश के समुद्र में डूबा देती हैं।

आयत 10 क्योंकि रूपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए कितनों ने विश्वास से भटक कर अपने आप को नाना प्रकार के दुखों से छलनी बना लिया है॥

आयत 11 पर हे परमेश्वर के जन, तू इन बातों से भाग; और धर्म, भक्ति, विश्वास, प्रेम, धीरज, और नम्रता का पीछा कर।

आपका उद्देश्य धनी बनना नहीं होना चाहिए लेकिन धर्मी बनाना होना चाहिए, क्योंकि स्वर्ग में परमेश्वर के अनुग्रह, महिमा और उसकी उपस्थिति का सर्वोत्तम  धन रखा है । मेने एक झूठे शिक्षक को ये कहते सुना, ” भाई, मैं स्वर्ग में धन का क्या करूँगा । मुझे तो यहाँ धन चाहिए , बहुत सपने पूरे करने है मुझे ।” ऐसे लोग नरक की और बढ़ रहें है, क्योंकि उनका ईश्वर धन है ।

यह सब कह कर मैं एक और बात बताना चाहता हूँ । धन अपने आप में बुरा नहीं है लेकिन जब हमारा फोकस मसीह और धार्मिकता से हट कर धन पर आ जाता है और हम लालच करने लग जाते हैं,  तो यह बुरा हो जाता है । परमेश्वर अपने कुछ लोगों को धन देता है. लेकिन क्यों? इकठ्ठा करने के लिए? अमीर बननेके लिए? शानो-शौकत से रहने के लिए? नहीं । वो कुछ लोगों को धन इसलिए देता है ताकि वह अपने  भाइयों और कलीसिया की ज़रूरत को पूरा करे ।

मैं यह भी कहना चाहता हूँ की बाइबिल कही भी यह नहीं कहती की हम अपने भविष्य की ज़रूरतों के लिए बचत नहीं कर सकते । नीतिवचन 13: 22 कहता है की भला मनुष्य अपने नाती- पोतों के लिये भाग (inheritance)छोड़ जाता । तो हम बचत कर सकते हैं, लेकिन हमे डरते और कांपते हुए ऐसा करना चाहिए । ज़रूरतों के लिए बचत करनी चाहिए: इच्छाओं  और भौतिक सुविधाओं के लिए नहीं । ज़रूरतों के लिए बचत करने में और भौतिकता के लिए बचत करने में बहुत बड़ा अंतर हैं ।

निष्कर्ष : यीशु मसीह के पास अमीर बनने, चंगाई पाने, कर्जे से निजात पाने आदि के लिए आना मूर्तिपूजा है । यीशु मसीह के पास यीशु मसीह के लिए आओ । वो इतना प्यारा, इतना खूबसूरत, इतना भला, इतना प्रेमी, इतना आनंददायी, इतना पवित्र, इतना धर्मी , इतना महान, इतना शाही, इतना न्यायी, इतना योग्य है की सारा ब्रहम्माण्ड और इसमें के समस्त प्राणी और धन और अपनी जान भी उसके लिए त्याग दिए जाए । यीशु मसीह ने यही तो सिखाया अपने दृष्टांतों में:

आयत 44 स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया॥

आयत 45 फिर स्वर्ग का राज्य एक व्यापारी के समान है जो अच्छे मोतियों की खोज में था।

आयत 46 जब उसे एक बहुमूल्य मोती मिला तो उस ने जाकर अपना सब कुछ बेच डाला और उसे मोल ले लिया॥ “ (मत्ती अध्याय 13:44-45)

यीशु मसीह उस धन या उस मोती के सामान है जिसे पाने के लिए सब कुछ खो दिया जाये । और उसके पाने के बाद किसी भी चीज़ की इच्छा ना रहे । धर्मियों का धन यीशु मसीह है । पापियों का धन दुनिया होती है ।

परमेश्वर आप को इस वचन के द्वारा आशीष दे ।

N. B. **यीशु मसीह ने खोया’ का मतलब यह नहीं की चीज़े उसके हाथ से चली गई या किसी ने उससे छीन ली । यीशु मसीह ने जो भी खोया वो इसलिए क्योंकि उसने उन्हें अपनी मर्जी से त्यागा। मेने ‘खोया’ शब्द अपनी बात को आसानी से समझाने के लिए उपयोग किया है ।

**** यीशु मसीह पृथ्वी पर दास बन गया इसका मतलब यह नहीं की उसने परमेश्वरत्व को त्याग दिया । ये असम्भव है । वो पृथ्वी पर भी उतना ही परमेश्वर था जितना स्वर्ग में । जब यीशु मसीह ने अवतार लिया तो उसने अपने परमेश्वरत्व में मनुष्यत्व भी जोड़ लिया । वो आज पूरी तरह से परमेश्वर भी है और पूरी तरह से मनुष्य भी ।

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