न्यू हैम्पशायर विश्वास अंगीकार (जॉन न्यूटन ब्राउन द्वारा)

न्यू हैम्पशायर विश्वास अंगीकार कैल्विनवादी है। लेकिन इसके कैल्विनवाद को नरम कैल्विनवाद कहा जाता है। कुछ लोग इसे एक संतुलित कैल्विनवादी अंगीकार मानते हैं, क्योंकि यह परमेश्वर की सम्प्रभुता के साथ-साथ मनुष्य की जिम्मेदारी पर भी जोर डालता है। मैं दो बिंदुओं के विषय में बात करना चाहता हूँ। बिंदु छः में मैं नरक जाने के लिए मनुष्य की जिम्मेदारी से पूरी तरह सहमत हूँ, पर मैं यह कहने के साथ साथ यहाँ एक पंक्ति जोड़ना चाहूंगा, जो कि परमेश्वर के द्वारा दुष्टों के संप्रभु भविष्यनिर्धारण के विषय में बात करे। तब यह बिंदु मेरे लिए और अन्य कई कैल्विनवादियों के लिए संतुलित हो जायेगा, क्योंकि परमेश्वर की सम्प्रभुता और मनुष्य की जिम्मेदारी हाथ में हाथ डाल कर चलती है। तथापि Founders Ministries की वेबसाइट पर टॉम नेटल्स ने कहा कि इस अंगीकार के लेखकों ने इसे बिंदु सात के द्वारा संतुलित कर दिया है। पर मेरा मानना है कि यदि लेखक ऐसा बिंदु छः में ही कर देता तो और भी ज्यादा मददगार होता। यदि कोई सिर्फ बिंदु छः को पढ़े तो शायद उसे यह लग सकता है कि लेखक आर्मिनवादी या स्वतंत्र इच्छावादी है।

दूसरा बिंदु जिस पर मैं बात करना चाहता हूँ, वह है बिंदु पंद्रह। अंगीकार के लेखक रविवार को मसीही सब्त मानते हैं। हम लोगोस चर्च रविवार को पवित्र और अलग किया दिन तो मानते हैं, जिस दिन कलीसिया को आराधना के लिए एकत्र होना ही चाहिए। परन्तु यदि कोई रविववार को चर्च के बाद में यात्रा कर रहा है या कोई चीज़ खरीद रहा है, तो उसे हम पाप नहीं मानते।

परमेश्वर आपको इस अंगीकार के पठन या अध्ययन के द्वारा सच्ची मसीहियत में और भी मजबूत करे।

न्यू हैम्पशायर विश्वास अंगीकार

(जॉन न्यूटन ब्राउन द्वारा)

1. पवित्रशास्त्र के विषय में

हम मानते हैं कि पवित्र बाइबल परमेश्वर द्वारा प्रेरित पुरुषों द्वारा लिखी गई थी और यह स्वर्गीय शिक्षा का सिद्ध खजाना है; इसका रचयिता परमेश्वर, इसका उद्देश्य उद्धार और इसका विषय बिना किसी त्रुटि के मिश्रण के सत्य है; यह उन सिद्धांतों को प्रकट करती है जिनके द्वारा परमेश्वर हमारा न्याय करेगा; और इसलिए सच्ची मसीही एकता का केंद्र और ऐसा सर्वोच्च मानक है और दुनिया के अंत तक रहेगा, जिसके द्वारा सभी मानव आचरण, विश्वास मतों, और मान्यताओं का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

(2तीमुथियुस 3:16-17; 2 तीमुथियुस 3:15; नीतिवचन 30:5-6; रोमियों 2:12; फिलिप्पियों 3:16; 1 यूहन्ना 4:1)

 

2 सच्चे परमेश्वर के विषय में

हम मानते हैं कि एक और केवल एक ही जीवित और सच्चा परमेश्वर है, जो कि अनंत बुद्धिमान आत्मा है, जिसका नाम यहोवा है, जो कि स्वर्ग और पृथ्वी का सृष्टिकर्ता और सर्वोच्च शासक है; जो कि पवित्रता में अवर्णनीय रूप से महिमावान, और हर संभव सम्मान, विश्वास और प्रेम के योग्य है; इस परमेश्वरत्व की एकता में तीन व्यक्ति हैं: पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा जो कि हर परमेश्वरीय सिद्धता/पूर्णता/गुण (divine perfection) में समान हैं और उद्धार के महान कार्य में भिन्न लेकिन सामंजस्यपूर्ण कार्यों को पूरा करते हैं।

(यूहन्ना 4:24; भजन संहिता 83:18; इब्रानियों 3:4; रोमियों 1:20; यिर्मयाह 10:10; निर्गमन15:11; भजन संहिता 147:5; यशायाह 6:3; 1 पतरस 1:15-16; प्रकाशितवाक्य 4:6-8; मरकुस 12:30; प्रकाशितवाक्य 4:11; मत्ती 10:37; यिर्मयाह 2:12-13; मत्ती .28:19; यूहन्ना 15:26; 1कुरिन्थियों12:4-6; 1 यूहन्ना 5:7; यूहन्ना 10:30; यूहन्ना 5:17; यूहन्ना 14:23; यूहन्ना 17:5&10; प्रेरितों  5:3-4; 1कुरिन्थियों 2:10-11; फिलिप्पियों  2:5-6; इफिसियों 2:18; 2 कुरिन्थियों 13:14; प्रकाशितवाक्य 1:4-5)

 

3. मनुष्य के पतन के विषय में

हम मानते हैं कि मनुष्य को पवित्र करके बनाया गया था और वह उसके सृष्टिकर्ता की व्यवस्था के अधीन था, लेकिन स्वेच्छा से पाप करके वह  उस पवित्र और सुखी अवस्था से गिर गया; जिसके परिणामस्वरूप सम्पूर्ण मानवजाति अब पापी है, यह मजबूरी में नहीं, पर स्वेच्छा से है; मनुष्य स्वभाव से  उस  पवित्रता से पूरी तरह से विहीन है जो परमेश्वर की व्यवस्था के द्वारा आदेशित है, वह सकारात्मक रूप से बुराई की ओर प्रवृत्त है; और इसलिए बिना किसी बचाव या बहाने के अनन्त विनाश के न्यायोचित दंड का भागी है ।

(उत्पत्ति 1:27; उत्पत्ति 1:31; सभोपदेशक 7:29; प्रेरितों के काम 17:26-29; उत्पत्ति 2:16-17; उत्पत्ति 3:6-24; रोमियों  5:12; रोमियों 5:15-19; भजन संहिता 51:5; रोमियों 8:7; यशायाह 53:6; उत्पत्ति 6:12; रोमियों 3:9-18; इफिसियों 2:1-3; रोमियों 1:18,32; रोमियों 2:1-16; गलातियों 3:10; मत्ती 20:15; यहेजकेल 18:19-20; रोमियों 1:20; रोमियों 3:19; गलातियों 3:22)

 

4. उद्धार के मार्ग के विषय में

हम मानते हैं कि पापियों का उद्धार पूर्ण रूप से अनुग्रह के द्वारा है; परमेश्वर के पुत्र के मध्यस्थ-सम्बन्धी कार्यों  के माध्यम से; जिसने पिता के द्वारा नियुक्त होकर स्वतंत्र रूप से हमारा स्वाभाव ले लिया, लेकिन फिर भी निष्पाप था; अपनी व्यक्तिगत आज्ञाकारिता के द्वारा परमेश्वर की व्यवस्था का सम्मान किया; अपनी  मृत्यु के द्वारा हमारे पापों का पूर्ण प्रायश्चित किया; मरे हुओं में से जी उठकर वह अब स्वर्ग में विराजमान है; और अपने अद्भुत व्यक्तित्व में कोमलतम सहानुभूतियों को परमेश्वरीय सिद्धताओं (divine perfections) में जोड़ दिया, वह हर तरह से एक उपयुक्त, दयालु और परम-पर्याप्त उद्धारकर्ता होने के योग्य है।

(इफिसियों 2:3, मत्ती 18:11, I यूहन्ना 4:10, 1कुरिन्थियों 3:5-7, प्रेरितों 15:11, यूहन्ना 3:16, यूहन्ना 1:1-14, इब्रानियों 4:14, इब्रानियों  12-24, फिलिप्पियों 2:9&14, 2 कुरिन्थियों 5:21, यशायाह  42:21, फिलिप्पियों 2:8, गलातियों 4:4-5, रोमियों 3:21, यशायाह 53:4-5, मत्ती 20:28, रोमियों 4:25, रोमियों 3:21-26, 1 यूहन्ना 2:3,  1कुरिन्थियों  15:1-3, इब्रानियों 9:13-15, इब्रानियों 1:8, इब्रानियों 1:3, कुलुस्सियों 3:1-4, इब्रानियों  7:25, कुलुस्सियों 2:18, इब्रानियों  7:26, भजन संहिता 89:19, भजन संहिता 34)

 

5 धर्मिकरण के विषय में

हम मानते हैं कि यीशु मसीह में विश्वास करने वालों के लिए उसने जो महान सुसमाचार प्रदत्त आशीष हासिल की है, वह है – धर्मिकरण; धर्मिकरण में धार्मिकता के सिद्धांतों के आधार पर पापों की क्षमा और अनन्त जीवन की प्रतिज्ञा सम्मिलित है; यह किन्ही कामों के बदले नहीं दी जाती, जो हमने आप किये हों, परन्तु केवल उद्धारकर्ता के लहू में विश्वास के माध्यम से; इस विश्वास के माध्यम से उसकी सिद्ध धार्मिकता परमेश्वर के द्वारा हम पर मुफ्त में आरोपित की जाती है; धर्मिकरण हमें परमेश्वर की परम-धन्य शांति और अनुग्रह की स्थिति में लाता है और इस समय और अनंत काल के लिए आवश्यक  हर आशीष को हमारे लिए सुरक्षित कर देता है।

(यूहन्ना 1:16, इफिसियों 3:8, प्रेरितों 13:39, यशायाह 53:11-12, रोमियों 5:1-2,  रोमियों 5:9, जकर्याह 13; 1,मत्ती 9:6, प्रेरितों 10:43,  रोमियों 5:17, तीतुस 3:5-7, I  पतरस 3:7, 1 यूहन्ना 2:25,  रोमियों 5:21,  रोमियों 4:4-5, रोमियों 6:23, फिलिप्पियों 3:7-9, रोमियों 5:19,  रोमियों 3:24-26,  रोमियों 4:23-25, I यूहन्ना 2:12,  रोमियों 5:3, रोमियों 5:11, 1  कुरिन्थियों 1:30-31, मत्ती  6:33, 1 तीमुथियुस 4:8)

 

6. उद्धार निशुल्क दिए जाने में विषय में

हम मानते हैं कि उद्धार की आशीषें सुसमाचार के द्वारा सभी के लिए निशुल्क उपलब्ध है; ह्रदय से पश्चातापी और आज्ञाकारी विश्वास के साथ उन्हें स्वीकार करना सभी का तात्कालिक कर्तव्य है; पृथ्वी के सबसे बड़े पापी के उद्धार को और कोई चीज़ नहीं, लेकिन उसकी अपनी अंतर्निहित भ्रष्टता और सुसमाचार की स्वैच्छिक अस्वीकृति रोकती है; ये अस्वीकृति उस पर और भी बड़ा दंड लेकर आती है।

(यशायाह 55:1, प्रकाशितवाक्य 22:17, रोमियों16:25-26, मरकुस 1:15, रोमियों 1:15-17, यूहन्ना 5:40, मत्ती 23:37, रोमियों 9:32, नीतिवचन 1:24, प्रेरितों 13:46, यूहन्ना 3:19, मत्ती 11:20, लूका 10:27, 2 थिस्सलुनीकियों 1:8)

 

7. नए जन्म में अनुग्रह के विषय में

हम मानते हैं कि उद्धार पाने के लिए पापियों को नया जन्म या फिर से जन्म पाने की आवश्यकता होती है; नया जन्म मन को एक पवित्र स्वभाव देने में निहित है; नया जन्म इस तरह से हमारी समझ से परे परमेश्वरीय सच्चाई को माध्यम बना कर पवित्र आत्मा की सामर्थ से दिया जाता है कि पापी स्वेच्छा से सुसमाचार के प्रति आज्ञाकारी बन जाता है, नए जन्म का सबूत पश्चाताप के पवित्र फलों, विश्वास  और जीवन की नवीनता में दिखता है।

(यूहन्ना 3:3, यूहन्ना 3:6-7, 1 कुरिन्थियों 3:14, प्रकाशितवाक्य  14:3, प्रकाशितवाक्य  21:27, 2 कुरिन्थियों 5;17, यहेजकेल 36:26, व्यवस्थाविवरण 30-6, रोमियों  2:28-29, रोमियों 5:5, 1 यूहन्ना 4:7, यूहन्ना 3:8, यूहन्ना 1:13, याकूब 1:16-18, 1 कुरिन्थियों 1:30, फिलिप्पियों  2:13, 1 पतरस 1:22-25, 1 यूहन्ना 5:1, इफिसियों 4:20-24, कुलुस्सियों 3:9-11, इफिसियों 5:9, रोमियों 8:90, गलातियों 5:16-23, इफिसियों 3:14-21, मत्ती 3:8-10, मत्ती 7:20, 1 यूहन्ना 5:4, 18)

 

8. पश्चाताप और विश्वास के विषय में

हम मानते हैं कि पश्चाताप और विश्वास पवित्र कर्तव्य हैं और अभिन्न अनुग्रह भी हैं, जो कि परमेश्वर के नया जन्म देने वाले आत्मा द्वारा हमारे आत्मा में किये जाते हैं; पवित्र आत्मा के इस कार्य के द्वारा हमारे पाप, खतरे और लाचारी के विषय में गंभीर रूप से कायल होकर और मसीह द्वारा उद्धार के मार्ग के विषय में पूरी तरह आश्वस्त होकर हम यीशु मसीह को हमारे नबी, याजक और राजा के रूप में हृदय से ग्रहण करते हुए और उस पर ही एकमात्र और सर्व-पर्याप्त उद्धारकर्ता के रूप में भरोसा करते हुए सच्चे पश्चाताप, अंगीकार और दया के लिए प्रार्थना के साथ परमेश्वर की ओर मुड़ते हैं।

(मरकुस 1:15, प्रेरितों 11:18, इफिसियों. 2:8, 1 यूहन्ना 5:1, यूहन्ना 16:8, प्रेरितों के काम 2:37-38, प्रेरितों के काम 16:30-31 लूका 18:13, लूका 15:18-21, याकूब 4:7-10, 2 कुरिन्थियों 7:11, तीमुथियुस  10:12-13, भजन संहिता 51, रोमियों 10:9-11, प्रेरितों के काम 3:22-23, इब्रानियों 4:14, भजन संहिता 2:6, इब्रानियों 1:8, इब्रानियों  7:25, 2  तीमुथियुस 1:12)

 

9. परमेश्वर के अनुग्रह के उद्देश्य के बारे में

हम मानते हैं कि चुनाव परमेश्वर का शाश्वत उद्देश्य है, जिसके अनुसार वह अनुग्रह करके पापियों को पुनर्जीवित करता है, पवित्र करता है और उद्धार करता है; जो पूरी तरह से मनुष्य की  स्वतंत्रता के साथ सुसंगत है, यह उद्देश्य (उद्धार) के लिए जरुरी सभी साधनों की जरुरत को मानता है;  यह परमेश्वर की संप्रभु भलाई का परम महिमावान प्रदर्शन है, यह असीम रूप से स्वतंत्र, बुद्धिमान, पवित्र और अपरिवर्तनीय; यह पूरी तरह से घमंड को हटा देता है और नम्रता, प्रेम, प्रार्थना, स्तुति, परमेश्वर में विश्वास और उसकी स्वतंत्र दया के सक्रिय अनुकरण को बढ़ावा देता है; यह साधनों के उपयोग को उच्चत्तम मात्रा में प्रोत्साहित करता है; सुसमाचार पर सच में विश्वास करने वालों में उत्पन्न इसके प्रभावों के द्वारा इसका पता लगाया जा सकता है; यह मसीही आश्वासन की नींव है; और यह हमारे अंदर पाया जाता है इसका पता लगाने के लिए हमें भरसक परिश्रम करना पड़ता है, जिसके यह योग्य है।

(2 तिमुथियस 1:8-9; इफिसियों 1:3-14; 1 पतरस 1:1-2; रोमियों  11:5-6; यूहन्ना 15;16; 1 यूहन्ना 4:19; 2 थिस्सलुनीकियों 2:13-14; प्रेरितों के काम 13:48; यूहन्ना 10:16;मत्ती  20:16; प्रेरितों के काम 15:14; निर्गमन  33:18-19; मत्ती 20:15; इफिसियों 1:11; रोमियों 9:23-24; यिर्मयाह  31:3; रोमियों 11:28-29; याकूब 1:17-18; 2 तीमुथियस 1:9; रोमियों 11:32-36; 1 कुरिन्थियों  1:26-31; रोमियों 3:27; रोमियों  4:16; कुलिस्सियों 3:12; 1 कुरिन्थियों  3:5-7; 1 कुरिन्थियों  15:10; 1 पतरस 5:10; प्रेरितों के काम 1:24; 1 थिस्सलुनीकियों   2:13; 1 पतरस 2:9; लूका 18:7; यूहन्ना 15:16; 1 थिस्सलुनीकियों  2:12; 2 तीमुथियुस  2:10; 1 कुरिन्थियों  9:22; रोमियों  8:28-30; यूहन्ना 6:37-40;1 थिस्सलुनीकियों 1:4-10; यशायाह 42:16; रोमियों 11:29; 2 पतरस 1:10-11; फिलिप्पियों  3:12; इब्रानियों 6:11)

 

10. पवित्रीकरण के विषय में

हम मानते हैं कि पवित्रीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हम उसकी पवित्रता के भागी बनाये जाते हैं; यह एक प्रगतिशील कार्य है; यह नए जन्म में शुरू होता है, यह मुहर और दिलासा देनेवाले  पवित्र आत्मा की उपस्थिति और सामर्थ द्वारा विश्वासियों के हृदयों में नियत साधनों, जिनमे विशेष रूप से परमेश्वर का वचन, आत्म-परीक्षा, आत्म-इंकार, चौकसी और प्रार्थना है,  के नित्य उपयोग के माध्यम से चलता रहता है।

(1 थिस्सलुनीकियों 4:3; 1 थिस्सलुनीकियों 5:23; 2 कुरिन्थियों 7:1; 2 कुरिन्थियों 13:10; फिलिप्पियों  3:12-16;1 यूहन्ना 2:29; रोमियों   8:5; इब्रानियों 1:4; नीतिवचन 4:18; 2 कुरिन्थियों 3:18; इब्रानियों 6:1; 2 पतरस 1:5-8; यूहन्ना 3:6; फिलिप्पियों 1:9-11; इफिसियों 1:13-14; फिलिप्पियों  2:12-13; इब्रानियों 4:11-12; 1 पतरस 2:2; 2 पतरस 3:18; 2 कुरिन्थियों 13:5; लूका 11:35; लूका 9:23; मत्ती 26:41; इफिसियों 6:18; इफिसियों 4:30)

 

11. संतों के अध्यवसाय के विषय में

हम मानते हैं कि केवल वही सच्चे विश्वासी हैं जो अंत तक बने रहते हैं: उनका दृतापूर्वक मसीह से चिपके रहना वह महान चिन्ह है जिसके द्वारा उनमे और सतही रूप से मानने वालों में अंतर किया जाता है; एक विशेष दिव्य विधान (a special providence) उनके कल्याण को सुनिश्चित करता है  और उद्धार के लिए विश्वास के माध्यम से परमेश्वर की सामर्थ के द्वारा उनकी रक्षा की जाती है।

(यूहन्ना 8:31; 1 यूहन्ना 2:27-28;1यूहन्ना 3:9; 1 यूहन्ना 5:18; 1यूहन्ना 2:19; यूहन्ना 13:18; मत्ती 13:20-21; यूहन्ना 6:66-69; अय्यूब 17:9; रोमियो 8:28; मत्ती 6:30-33;यिर्मयाह 32:40; भजन121:3;भजन91:11-12; फिलिप्पियों1:6; फिलिप्पियों 2:13; यहूदा 24:25; इब्रानियों1:14; 2 राजा 6:16; इब्रानियों 13:5; 1 यूहन्ना 4:4)

 

12. व्यवस्था और सुसमाचार के सामंजस्य के विषय में

हम मानते हैं कि परमेश्वर की व्यवस्था उसके नैतिक शासन का शाश्वत और अपरिवर्तनीय नियम है; यह पवित्र, न्यायोचित और भली है; और इसकी आज्ञाओं को पूरा करने की वह अक्षमता जो पवित्रशास्त्र कहता है कि मनुष्य के पास है वह पूरी तरह से पाप  के प्रति उनके प्रेम से ही उत्पन्न हुई है और उन्हें उनकी इस दुर्दशा से छुड़ाना और एक मध्यस्थ के द्वारा फिर से उन्हें  पवित्र व्यवस्था के प्रति सच्चा आज्ञाकारी बनाना सुसमाचार और दृश्यगत कलीसिया की स्थापना से सम्बंधित अनुग्रह के साधनों   का एक महान उद्देश्य है।

(रोमियों  3:31; मत्ती 5:17; लूका 16:17; रोमियों  3:20; रोमियों  4:15; रोमियों  7:12; रोमियों 7:7,14-22; गलातियों 3:21; भजन 119; रोमियों 8:7-8; यहोशू 24:19;यिर्मयाह13:23; यूहन्ना 6:44; यूहन्ना 5:44; रोमियों  8:2-4; रोमियों 10:4; 1 तीमुथियुस1:5; इब्रानियों 8:10; यहूदा 20 और 21)

 

13. सुसमाचार कलीसिया के विषय में

हम मानते हैं कि मसीह की दृश्य कलीसिया बपतिस्मा प्राप्त विश्वासियों की एक मण्डली है, जो कि सुसमाचार के विश्वास और संगति में वाचा के द्वारा जुड़े हुए हैं; मसीह की धार्मिक विधियों का पालन करते हैं; उसके कानूनों द्वारा शासित होते हैं; और उसके वचन के द्वारा उनमे निवेशित  दानों, अधिकारों और विशेष लाभों का प्रयोग करते हैं; इसके धर्मशास्त्र-सम्मत पदाधिकारी केवल अध्यक्ष या चरवाहे और डीकन (सेवक) हैं, जिनकी योग्यताएं, अधिकार और कर्तव्यों को तीमुथियुस और तीतुस के पत्रों में परिभाषित किया गया है।

(1 कुरिन्थियों 1:1-3; मत्ती 18:17; प्रेरितों के काम 5:11; प्रेरितों के काम 8:1; प्रेरितों के काम 11:21-23; 1 कुरिन्थियों 4:17; 1 कुरिन्थियों 14:23; ३ यूहन्ना 9; 1 तीमुथियुस 3:5; प्रेरितों के काम 2:41-42; 2 कुरिन्थियों 8:5; प्रेरितों के काम 2:47; 1 कुरिन्थियों 5:12-13; 1 कुरिन्थियों11:2; 2 थिस्सलुनीकियों 3:6; रोमियो16:17-20; 1 कुरिन्थियों11:23-24; मत्ती 18:15-20; 1 कुरिन्थियों 5:6; 2; 1 कुरिन्थियों 2:17; 1 कुरिन्थियों 4:17;मत्ती 28:20; यूहन्ना 14:15; यूहन्ना 15:12; 1 यूहन्ना 14:21; 1 थिस्सलुनीकियों 4:2; 2 यूहन्ना 6; गलातियों 6:2; इफिसियों 4:7; 1 कुरिन्थियों 14:12; फिलिप्पियों 1:1; प्रेरितों के काम 14:23; प्रेरितों के काम 15:22; 1 तीमुथियुस 3; तीतुस 1)

 

14. बपतिस्मा और प्रभु भोज के विषय में

हम मानते हैं कि मसीही बपतिस्मा एक विश्वासी की पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम में पानी में डुबकी है; यह क्रूस पर चढ़ाए गए, गाड़े गए और पुनरुत्थित उद्धारकर्ता में हमारे विश्वास का और उसके मरने, गाड़े जाने और जी उठने के प्रभाव अर्थात हमारा पाप के लिए मर जाने और नए जीवन के लिए जी उठने का गंभीर और सुंदर प्रतीकात्मक प्रदर्शन है; बपतिस्मा कलीसिया के सदस्य बनने से  मिलने वाले अधिकारों को पाने और प्रभु भोज के लिए जरुरी है; प्रभु भोज चर्च के सदस्यों का रोटी और दाखरस के पवित्र उपयोग के द्वारा  मसीह के जान देने वाले प्रेम का स्मरण करना है, जिसके पहले हमेशा स्वयं को गम्भीरतापूर्वक जांचा जाता है।

(प्रेरितों के काम 8:36-39; मत्ती 3:5-6; यूहन्ना 3:22-23; यूहन्ना 4:12;  मत्ती  28:19-20; मरकुस 16:16; प्रेरितों के काम 2:38; प्रेरितों के काम 8:12; प्रेरितों के काम 16:32-34; प्रेरितों के काम 18:8; प्रेरितों के काम 10:47-48; गलातियों 3:26-28; रोमियों 6:4; कुलुस्सियों 2:12; 1 पतरस 3:20-21; प्रेरितों के काम 22:16; प्रेरितों के काम 2:41-42; 1 कुरिन्थियों 11:26;  मत्ती  26:26-29; मरकुस 14:22-25; लूका 22:14-20; 1 कुरिन्थियों11:28; 1 कुरिन्थियों 5:1-8; 1 कुरिन्थियों 10:3-32; 1 कुरिन्थियों 11:17-32; यूहन्ना 6:26)

 

15. मसीही सब्त का दिन

हम मानते हैं कि सप्ताह का पहला दिन प्रभु का दिन या मसीही सब्त है; और इसे सभी सांसारिक श्रम और पापमय मनोरंजनो से दूर रहकर, निजी और सार्वजनिक दोनों तरह के अनुग्रह के सभी साधनों के निष्ठापूर्वक अनुपालन और परमेश्वर की प्रजा के लिथे शेष रह गए विश्राम के लिए तैयारी के द्वारा धार्मिक उद्देश्यों के लिए पवित्र रखा जाना चाहिए।

(प्रेरितों के काम 20:7; उत्पत्ति 2:3; कुलुस्सियों  2:16-17; मरकुस 2:27; यूहन्ना 20:19; 1कुरिन्थियों 16:1-2; निर्गमन 20:8; प्रकाशितवाक्य 1:10; भजन संहिता 118:15, 24; यशायाह 58:13-14; यशायाह 56:2-8;  इब्रानियों  10:24-25; प्रेरितों के काम 11:26; प्रेरितों के काम 13:44;लैव्यव्यवस्था 19:30; लूका 4:16; प्रेरितों के काम 17:2-3; भजन  26:8; भजन  87:3; इब्रानियों  4:3-11)

 

16. नागरिक सरकार के विषय में

हम मानते हैं कि नागरिक सरकार मानव समाज के हितों और उसकी अच्छी व्यवस्था करने के लिए परमेश्वर के द्वारा नियुक्त की जाती है और न्यायधीशों के लिए प्रार्थना की जानी चाहिए और विवेक के साथ सब बातों में उनका सम्मान और आज्ञापालन किया जाना चाहिए; केवल उन बातों को छोड़कर जो हमारे प्रभु यीशु मसीह की इच्छा के विरुद्ध हैं, जो विवेक का एकमात्र प्रभु और पृथ्वी के राजाओं का राजकुमार है।

(रोमियों 13:1-7; व्यवस्थाविवरण 16:18; 2 शमूएल 23:3; निर्गमन18:23; यिर्मयाह 30:21;मत्ती 22:21; तीतुस 3:1; 1 पतरस 2:13; 1 तीमुथियुस 1 2:1-4; प्रेरितों के काम 5:29; मत्ती 28; दानिय्येल  3:15-18; दानिय्येल 6:7-10; प्रेरितों के काम 4:18-20; मत्ती 23:10; रोमियों14:4; प्रकाशितवाक्य 19:16; भजन 72:11; भजन 2; रोमियों  14:9-13)

 

17. धर्मी और दुष्टों के विषय में

हम मानते हैं कि धर्मी और दुष्ट  के बीच मौलिक और आवश्यक अंतर है; प्रभु यीशु के नाम में विश्वास करने से धर्मी ठहराए जाने वाले और हमारे परमेश्वर के आत्मा द्वारा पवित्र किए जाने वाले ही उसकी नजरों में वास्तव में धर्मी हैं; जबकि जो पश्चाताप नहीं करते और अविश्वास में बने रहते हैं, वो उसकी नज़र में दुष्ट हैं और शाप के अधीन हैं; मनुष्यों के बीच में यह अंतर मृत्यु में और मृत्यु के बाद भी बना रहेगा।

(मलाकी  3:18; नीतिवचन 12:26; यशायाह 5:20; उत्पत्ति 18:23; यिर्मयाह 15:19; प्रेरितों के काम 10:34-35; रोमियों  6:16; रोमियों  1:17; रोमियों 7:6;1 यूहन्ना 2:29;1 यूहन्ना  3:7; 1 यूहन्ना  6:18,22; 1 कुरिन्थियों 11:32; नीतिवचन 11:31; 1 पतरस 4:17-18;1 यूहन्ना 5:19; गलातियों  3:10; यूहन्ना 3:36; यशायाह 57:21; भजन संहिता  10:4; यशायाह 55:6-7; नीतिवचन 14:32;लूका 16:25; यूहन्ना 8:21-24; नीतिवचन  10:24; लूका 12:4-5; लूका 9:23-26; सभोपदेशक 3:17; मत्ती 7:13-14)

 

18. आने वाली दुनिया के विषय में

हम मानते हैं कि दुनिया का अंत निकट है; अंतिम दिन मसीह स्वर्ग से उतरेगा और मरे हुओं को कब्र से अंतिम न्याय के लिए जिलाएगा; तब एक गंभीर पृथक्करण  होगा; दुष्टों को अनंत दण्ड दिया जाएगा और धर्मी को अनन्त आनन्द; और यह निर्णय धार्मिकता के सिद्धांतों के आधार पर स्वर्ग या नरक में मनुष्यों की अंतिम स्थिति को हमेशा के लिए पक्की कर देगा।

(1 पतरस 4:7; 1 कुरिन्थियों 7:29-31; इब्रानियों 1:10-12; मत्ती 24:35; 1 यूहन्ना 2:17; मत्ती 28:20; मत्ती 13:39-40; 2 पतरस 3:3-13; प्रेरितों के काम 1:11; प्रकाशितवाक्य 1:7; इब्रानियों 9:28; प्रेरितों के काम 3:21; 1 थिस्सलुनीकियों 4:13-18; 1 थिस्सलुनीकियों 5:1-11; प्रेरितों के काम 24:15; 1 कुरिन्थियों 15:12-58; लूका 14:14; दानिय्येल 12:2; यूहन्ना 5:28-29; यूहन्ना 6:40; यूहन्ना 11:25-26; 2 तीमुथियुस 1:10; प्रेरितों के काम 10:42; मत्ती 13:49; मत्ती 13:37-43; मत्ती 24:30-31; मत्ती 25:31-46; प्रकाशितवाक्य 22:11; 1 कुरिन्थियों 6:9-10; मरकुस 9:43-48; 2 पतरस 2:9; यहूदा 7; फिलिप्पियों 3:19; रोमियों 6:23; 2 कुरिन्थियों  5:10-11; यूहन्ना 4:36; 2 कुरिन्थियों  4:18; रोमियों  3:5-6; 2 थिस्सलुनीकियों 1:6-12; इब्रानियों 6:1-2; 1 कुरिन्थियों  4:5; प्रेरितों के काम 17:31; रोमियों 2:2-16; प्रकाशितवाक्य 20:11-12; 1 यूहन्ना 2:28; 1 यूहन्ना 4:17; 2 पतरस 3:11-12)

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