परमेश्वर ने मनुष्य की रचना कैसे की? (चार्ल्स स्पर्जन प्रश्नोत्तरी-10)

परमेश्वर ने मनुष्य की रचना कैसे की?

उत्तर: परमेश्वर ने मनुष्य की रचना अपने ही स्वरुप में  पुरुष और स्त्री करके (उत्पत्ति 1:27), ज्ञान, धार्मिकता, और पवित्रता से लैस करके (कुलुस्सियों 3:10; इफिसियों 4:24) और सृष्टि के ऊपर शासक के रूप में की (उत्पत्ति1:28)।

 

साक्षी आयतें:

तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया; नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की।  (उत्पत्ति 1:27) 

 और नए मनुष्यत्व को पहिन लिया है, जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप् करने के लिये नया बनता जाता है। (कुलुस्सियों  3:10)

और नये मनुष्यत्व को पहिन लो जो परमेश्वर के अनुरूप सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है।  (इफिसियों  4:24)

और परमेश्वर ने उनको आशीष दी, और उनसे कहा, “फूलोफलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो।“ (उत्पत्ति 1:28)

 

व्याख्या: 

हम इस प्रश्न के उत्त्तर की व्याख्या निम्न शीर्षकों के अंतर्गत करेंगे:

  • परमेश्वर ने मनुष्य की रचना
  • अपने ही स्वरुप में
  • पुरुष और स्त्री करके
  • ज्ञान, धार्मिकता, और पवित्रता से लैस करके
  • सृष्टि के ऊपर शासक के रूप में

परमेश्वर ने मनुष्य की रचना

इस वाक्यांश के द्वारा हम जानते हैं कि डार्विन का विकासवाद झूठा है। परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया। उसने मनुष्य को मनुष्य करके बनाया। उसने पहले पुरुष आदम को मिट्टी से बनाया और उसमें जीवन का श्वास फूंक दिया। इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य शरीर और आत्मा दो चीज़ों से मिलकर बना है। पहले पुरुष को बनाने के बाद परमेश्वर ने उसकी पसली ली और उसमे से उसकी जीवन साथी हव्वा बना दी।

तब यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा, और उसके नथनों में जीवन का श्‍वास फूँक दिया; और आदम जीवित प्राणी बन गया। (उत्पत्ति 2:7)

तब यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को भारी नींद में डाल दिया, और जब वह सो गया तब उसने उसकी एक पसली निकालकर उसकी जगह मांस भर दिया। और यहोवा परमेश्‍वर ने उस पसली को जो उसने आदम* में से निकाली थी, स्त्री बना दिया; और उसको आदम के पास ले आया। (उत्पत्ति 2:21-22)

पहले जोड़े को बनाने के बाद परमेश्वर अब और मनुष्यों को विवाहित जोड़ों के प्रजनन के द्वारा बनाता है:

मेरे मन का स्वामी तो तू है;
तू ने मुझे माता के गर्भ में रचा।
मैं तेरा धन्यवाद करूँगा, इसलिये कि मैं
भयानक और अद्भुत रीति से रचा गया हूँ।(भजन संहिता 139:13-14)

प्रशंसा हो परमेश्वर की हमें भयंकर और अद्भुत रीति से बनाने के लिए। क्या ही महान सृष्टिकार है वो !

 

अपने ही स्वरुप में 

तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया (उत्पत्ति 1:27)

परमेश्वर ने आदम और हव्वा को अपनी समानता और स्वरुप में बनाया। इसका तात्पर्य है कि वो परमेश्वर के सामान बनाए गए थे। लेकिन यह समानता सिर्फ एक सीमित अर्थ में ही है। परमेश्वर बुद्धिमान है और हम भी, लेकिन परमेश्वर अनंत बुद्धिमान है और हम सीमित रूप से बुद्धिमान है । परमेश्वर धर्मी और पवित्र है और आदम को भी धर्मी और पवित्र करके बनाया गया था। परन्तु परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता अनंत है और जो धार्मिकता और पवित्रता आदम को दी गई थी, वो सिद्ध तो थी, लेकिन फिर भी सीमित थी।

परमेश्वर का धन्यवाद कि उसने हमें अपनी समानता में बनाया। परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि जब मनुष्य ने पाप किया तो मनुष्य में पाया जाने वाला परमेश्वर का स्वरुप विकृत हो गया।

पुरुष और स्त्री करके

तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया; नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की। (उत्पत्ति 1:27)

परमेश्वर ने पुरुष और स्त्री करके मनुष्य को बनाया है। इसका अर्थ हुआ कि सिर्फ दो ही लिंग (genders) हैं: पुरुष लिंग और स्त्री लिंग। कोई तीसरा लिंग नहीं है। हाँ, पाप के कारण कुछ लोग नपुंसक होकर पैदा होते हैं, वैसे ही जैसे कुछ बच्चे मानसिक रूप से तो कुछ बच्चे शारीरिक रूप से निःशक्त पैदा होते हैं। परन्तु कुछ लोग पुरुष होकर भी स्त्री जैसा व्यहवार करते हैं और कुछ स्त्रियां पुरुष जैसा व्यहवार करती है। वो कहते हैं कि जैविक रूप से हम पुरुष हैं, पर हम अंदर से स्त्री जैसे हैं या जैविक रूप से हम स्त्रियां हैं, पर हम अंदर से पुरुष जैसी हैं। इस तरह के कुछ लोग तो हार्मोन ट्रीटमेंट लेते हैं और अपने प्रजनन अंग तक बदलवा लेते हैं। ये ट्रांसजेंडर कहलाते हैं। लेकिन यह करना सिर्फ स्वभाव के ही खिलाफ नहीं , यह परमेश्वर की योजना और व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह है, अकथनीय रूप से शर्मनाक पाप है।

परमेश्वर ने आज्ञा दी है की मनुष्य अपने स्वाभाव के साथ छेड़छाड़ ना करें। पुरुष पुरषों जैसा व्यहवार करें और स्त्रियां स्त्रियों जैसा। वे अपनी सीमाओं से बहार ना जाएं। पुरुष स्त्रियों के कपड़े ना पहने, उनका सा श्रृंगार ना करें; उनकी बॉडी लेंग्वेज ना इस्तेमाल करे। ऐसे ही स्त्रियां भी पुरुषों के कपड़े ना पहने और उनकी तरह व्यहवार ना करें। यदि कोई ऐसा करता है, तो वह परमेश्वर के खिलाफ घिनौना पाप करता है।

परमेश्वर ने आदम और हव्वा बनाई; उसने आदम और स्टीव नहीं बनाया; ना ही उसने हव्वा और एस्थर बनाई। कहने का अर्थ है कि विवाह सिर्फ एक पुरुष और स्त्री के बीच ही संभव है। कोई इसके विपरीत जाता है तो वो परमेश्वर के विरुद्ध बहुत बड़ा पाप करता है।

कोई स्त्री पुरुष का पहिरावा न पहिने, और न कोई पुरुष स्त्री का पहिरावा पहिने; क्योंकि ऐसे कामों के सब करनेवाले तेरे परमेश्‍वर यहोवा की दृष्‍टि में घृणित हैं। (व्यवस्थाविवरण 22:5)

यहाँ तक कि उनकी स्त्रियों ने भी स्वाभाविक व्यवहार को उससे जो स्वभाव के विरुद्ध है, बदल डाला। 27वैसे ही पुरुष भी स्त्रियों के साथ स्वाभाविक व्यवहार छोड़कर आपस में कामातुर होकर जलने लगे, और पुरुषों ने पुरुषों के साथ निर्लज्ज काम करके अपने भ्रम का ठीक फल पाया। (रोमियों 1:26-27)

 

ज्ञान, धार्मिकता, और पवित्रता से लैस करके 

आदम को परमेश्वर, उसकी इच्छा और उसके कामों और आज्ञाओं का ऐसा सिद्ध ज्ञान दिया गया था जिसके द्वारा वो परमेश्वर का आज्ञा पालन करने और सुख और अमरत्व की अवस्था में रहने में सक्षम था। उसे परमेश्वर ने भीतर से पवित्र और बहार से धर्मी या सदाचारी बनाया था। परन्तु जब आदम ने पाप किया तो हमने यह ज्ञान, पवित्रता और धार्मिकता खो दी। हम आदम के पाप और हमारे विद्रोही स्वाभाव के कारण ना तो परमेश्वर को जानते थे; ना खोजते थे, ना ही सच्ची पवित्रता और धार्मिकता को चाहते थे। हम परमेश्वर की महिमा से हीं हो गए थे। लेकिन परमेश्वर की महिमा और धन्यवाद हो हमारे उद्धारकर्ता और प्रभु यीशु मसीह के लिए जिसके द्वारा हमें परमेश्वर का ज्ञान फिर से प्राप्त हुआ और उसकी धार्मिकता और पवित्रता भी हमे दे दी गई:

और नए मनुष्यत्व को पहिन लिया है, जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान के द्वारा नया बनता जाता है। (कुलुस्सियों 3:10)

और नये मनुष्यत्व को पहिन लो जो परमेश्‍वर के अनुरूप सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है। (इफिसियों 4:24)

 

सृष्टि के ऊपर शासक के रूप में

परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी सम्पूर्ण सृष्टि पर उसके प्रतिनिधि के रूप में शासन करने के लिए बनाया था:

और परमेश्वर ने उनको आशीष दी, और उनसे कहा, “फूलो–फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो।“ (उत्पत्ति 1:28)

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