क्या फिलिप्पियों और इब्रानियों के लेखक यह सिखाते हैं कि आप अपना उद्धार खो सकते हैं ?

हम सम्पूर्ण बाइबल में से जानते हैं कि यदि हमने उद्धार पाया है तो उसे खो नहीं सकते। प्रभु यीशु मसीह ने स्पष्ट रूप से कहा कि सिर्फ उसके चुने हुए लोग ही अनंत जीवन पाते हैं और वे उसे कभी नहीं खो सकते:

मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं; और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ। वे कभी नष्‍ट न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा। मेरा पिता, जिसने उन्हें मुझ को दिया है, सबसे बड़ा है और कोई उन्हें पिता के हाथ से छीन नहीं सकता। (यूहन्ना 10:28-29)

जिनको परमेश्वर ने अनंत में ठहराया था उनको महिमा तक ले जाने का काम परमेश्वर स्वयं सुनिश्चित करता है :

क्योंकि जिन्हें उसने पहले से जान लिया है उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे। फिर जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया है; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी है। (रोमियों 8:29-30)

परन्तु झूठे या भ्रांत शिक्षक निम्नांकित बाइबल अंशों का दुरूपयोग करके कहते हैं कि हम अपना उद्धार खो सकते हैं:

(1. फिलिप्पियों 2:12)

इसलिये हे मेरे प्रियो, जिस प्रकार तुम सदा से आज्ञा मानते आए हो, वैसे ही अब भी न केवल मेरे साथ रहते हुए पर विशेष करके अब मेरे दूर रहने पर भी डरते और काँपते हुए अपने अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ; (फिलिप्पियों 2:12)

धोखेबाज शिक्षक फिलिप्पियों 2:12 का इस्तेमाल करके कहते हैं कि हमे स्वयं अपने उद्धार का काम पूरा करना है। ये झूठे शिक्षक फिलिप्पियों 2:12 तो दिखाते हैं, पर फिलिप्पियों 1:6 नहीं दिखाते:

जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा। (फिलिप्पियों 1:6)

उद्धार ना तो हमने शुरू किया है, ना ही हम पूरा कर सकते हैं। उद्धार पूरी तरह से अनुग्रह के द्वारा है; कर्मों का उसमे कोई योगदान नहीं। ये आयते देखिए :

यदि यह अनुग्रह से हुआ है, तो फिर कर्मों से नहीं; नहीं तो अनुग्रह फिर अनुग्रह नहीं रहा। (रोमियों 11:6)

क्योंकि विश्‍वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है; और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्‍वर का दान है, 9और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे। 10क्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिये सृजे गए जिन्हें परमेश्‍वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया। ( इफिसियों 2:8-10)

तो पौलुस फिलिप्पियों 2:12 में क्या कह रहा है? वो निश्चित रूप से अक्षरक्षः अपना उद्धार पूरा करने को नहीं कह रहा है। वह सिर्फ इतना कह रहा है कि जैसे तुम मेरी उपस्थिति में आज्ञा पालन करते आ रहे थे वैसे ही मेरी अनुपस्थिति में भी आज्ञापालन करते रहो (उद्धार का काम पूरा करते रहो)। झूठे शिक्षक आपको हमेशा आयत 12 ही दिखाते हैं, वे कभी भी आपको आयत 13 नहीं दिखाते, जिसमे लिखा है:

क्योंकि परमेश्‍वर ही है जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है।

हमारे मन में आज्ञापालन की इच्छा और आज्ञापालन के पीछे स्वयं परमेश्वर है। और हाँ, हमारा आज्ञापालन न तो हमारा उद्धार शुरू करता है; ना ही पूरा। यदि हम हमारे कामों पर भरोसा रखें तो हम शापित हैं:

10इसलिये जितने लोग व्यवस्था के कामों पर भरोसा रखते हैं, वे सब शाप के अधीन हैं, क्योंकि लिखा है, “जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह शापित है।”पर यह बात प्रगट है कि व्यवस्था के द्वारा परमेश्‍वर के यहाँ कोई धर्मी नहीं ठहरता, क्योंकि धर्मी जन विश्‍वास से जीवित रहेगा। (गलतियों 3:10-11)

लेकिन हाँ, हमारा आज्ञापालन यह जरूर सिद्ध करता है कि हमारा उद्धार हो चुका है।

(2. इब्रानियों 10:26-29)

26क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं। 27हाँ, दण्ड का एक भयानक बाट जोहना और आग का ज्वलन बाकी है जो विरोधियों को भस्म कर देगा।यशा 26:11 28जब मूसा की व्यवस्था का न माननेवाला, दो या तीन जनों की गवाही पर, बिना दया के मार डाला जाता है,व्य 17:6; 19:15 29तो सोच लो कि वह कितने और भी भारी दण्ड के योग्य ठहरेगा, जिसने परमेश्‍वर के पुत्र को पाँवों से रौंदा और वाचा के लहू को, जिसके द्वारा वह पवित्र ठहराया गया था, अपवित्र जाना है, और अनुग्रह के आत्मा का अपमान किया।  (इब्रानियों 10:26-29)

झूठे शिक्षक इस अंश को लेके बहुत उत्तेजित रहते हैं। वे कहते हैं देखो आप सच को जान कर भी लगातार पापों में जा सकते हैं और अपना उद्धार खो सकते हैं। लेकिन यहाँ सिर्फ बौद्धिक रूप से सच को जानने के विषय में लिखा है। ये उन लोगों के विषय में है जो मसीही कहलाते हैं और हैं नहीं। ये बौद्धिक रूप से तो वचन को जानते हैं पर इनकी आत्माओं में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। बाइबल साफ़ साफ़ कहती है कि परमेश्वर से जन्मा सच्चा उद्धार पाया व्यक्ति इस तरह पाप में नहीं बना रह सकता है :

जो कोई परमेश्‍वर से जन्मा है वह पाप का अभ्यास नहीं करता; क्योंकि उसका बीज उसमें बना रहता है, और वह पाप का अभ्यास कर ही नहीं सकता क्योंकि परमेश्‍वर से जन्मा है। इसी से परमेश्‍वर की सन्तान और शैतान की सन्तान जाने जाते हैं; जो कोई धर्म के कामों का अभ्यास नहीं करता, वह परमेश्‍वर से नहीं और न वह जो अपने भाई से प्रेम नहीं रखता। (1 यूहन्ना 3:9-10)

स्पष्ट है कि इब्रानियों 10 नकली विश्वासियों के विषय में लिखा है।

एक अंतिम अंश, जो कि झूठे शिक्षकों का फेवरेट है, पर हम बात करेंगे:

(3. इब्रानियों 6:4-8)

4क्योंकि जिन्होंने एक बार ज्योति पाई है, और जो स्वर्गीय वरदान का स्वाद चख चुके हैं और पवित्र आत्मा के भागी हो गए हैं, 5और परमेश्‍वर के उत्तम वचन का और आनेवाले युग की सामर्थ्य का स्वाद चख चुके हैं, 6यदि वे भटक जाएँ तो उन्हें मन फिराव के लिये फिर नया बनाना अनहोना है; क्योंकि वे परमेश्‍वर के पुत्र को अपने लिये फिर क्रूस पर चढ़ाते हैं और प्रगट में उस पर कलंक लगाते हैं। 7क्योंकि जो भूमि वर्षा के पानी को, जो उस पर बार–बार पड़ता है, पी पीकर जिन लोगों के लिये वह जोती–बोई जाती है उनके काम का साग–पात उपजाती है, वह परमेश्‍वर से आशीष पाती है। 8पर यदि वह झाड़ी और ऊँटकटारे उगाती है, तो निकम्मी और स्रापित होने पर है, और उसका अन्त जलाया जाना है। (इब्रानियों 6:4-8)

आयत 6 कहती है यदि वे भटक जाएँ तो उन्हें मन फिराव के लिये फिर नया बनाना असंभव है। सबसे पहले तो हम 1 यूहन्ना 2:19 देखेंगे जो साफ़ साफ़ कहता है कि जो जाते हैं वो इसलिए चले जाते हैं ताकि प्रकट हो जाए कि वो हमारे नहीं थे। यह आयत इस सच की भी घोषणा करती है कि यदि वे हमारे होते (उद्धार पाए होते) तो हमारे बीच बने रहते:

वे निकले तो हम ही में से, पर हम में के थे नहीं; क्योंकि यदि वे हम में के होते, तो हमारे साथ रहते; पर निकल इसलिये गए कि यह प्रगट हो कि वे सब हम में के नहीं हैं। (1 यहुन्ना 2:19)

यदि ये जो जाते हैं वे नकली थे और उन्होंने कभी उद्धार पाया ही नहीं था तो फिर क्यों लिखा है कि उन्होंने ज्योति पाई, स्वर्गीय वरदान का स्वाद चख लिया, पवित्र आत्मा के भागी हो गए। बहुत ही आसान है इसका उत्तर। ये लोग विश्वासियों की मंडली में होने के कारण बहुत सी आशीषों के भागी हो जाते हैं, लेकिन उद्धार नहीं पाते। हम पुराने नियम के शाऊल का उदहारण लेते हैं। वो इज़राइल में था, परमेश्वर की व्यवस्था उसके पास थी और वह इसे बौद्धिक रूप से जनता था (इस तरह से उसने ज्योति पाई थी), परमेश्वर ने उसे राजा होने के लिए अभिषेक दिया था (इस तरह से वह पवित्र आत्मा का भागी हुआ था )। परन्तु उसने उद्धार नहीं पाया था, इसी लिए वह जीवन शैली के रूप में पाप करता रहा और परमेश्वर ने उस पर दुष्टात्मा भी भेजा।

एक और उदाहरण लेते हैं। नए नियम में यहूदा इस्करियोती यीशु मसीह से वचन सुन रहा था (इस तरह से उसने ज्योति पाई थी) और चंगाई कर रहा था (इस तरह से वह पवित्र आत्मा का भागी हुआ था )। लेकिन उसका ह्रदय कभी नहीं बदला। उसका उद्धार कभी नहीं हुआ था। वो तो शुरू से चोर था (यूहन्ना 12:6), शैतान था (यूहन्ना 6:17) और विनाश की संतान था (यूहन्ना 17:12)।

तो हम यह जान लें कि इब्रानियों सिर्फ नकली विश्वासियों के विषय में बात कर रहा है, असली नहीं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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