ऐथनैश्यस का विश्वास वक्तव्य (Athanasian Creed)

ऐथनैश्यस चौथी शताब्दी में मिश्र के सिकन्दरिया में रहने वाला प्रभु का सच्चा सेवक था। उसका जन्म 296 ईसा पश्चात में हुआ था।  वह  ऐरियस नाम के झूठे शिक्षक और उसकी झूठी शिक्षाओं के खिलाफ था। ऐरियस त्रिएकता की शिक्षा को बिगाड़ चुका था। वह यीशु मसीह के परमेश्वरत्व में विश्वास नहीं करता था। वह कहता था की यीशु मसीह सिर्फ एक बनाया हुआ प्राणी था। वह और उसके समर्थक एक गीत गाया करते थे, “एक समय था, जब पुत्र नहीं था”।  ऐथनैश्यस ऐरियस की शिक्षाओं का खंडन करता था। उसके विद्रोही उसे “काला नाटा” कह कर पुकारते थे। मसीह के विषय में सच्चाई के लिए ऐथनैश्यस को पांच बार देश निकाला मिला।  लेकिन वह हर बार लौट कर सच्चाई का प्रचार करता था। सारी दुनिया के खिलाफ अदम्य साहस के साथ सच्चाई का प्रचार करने वाला प्रभु का यह सेवक 373 ईसा पश्चात में प्रभु में सो गया और उसकी कब्र के पत्थर पर लिखा गया: ” ऐथनैश्यस कॉन्ट्रा मुंडम,” यानी ” ऐथनैश्यस  दुनिया के खिलाफ ।”

मजे की बात तो यह है कि ऐथनैश्यस का विश्वास वचन ऐथनैश्यस ने लिखा ही नहीं।  ऐथनैश्यस तो यूनानी भाषा में लिखता था। ऐथनैश्यस का विश्वास वचन लैटिन भाषा में लिखा गया था। सत्रहवीं शताब्दी तक लोगों में यही भ्रान्ति थी कि ऐथनैश्यस का विश्वास वचन ऐथनैश्यस ने लिखा था। विद्वानों  का मत है कि ऐथनैश्यस का विश्वास वचन उसके मरने के सौ वर्षों बाद  विन्सेंट ऑफ़ लेरिंस द्वारा दक्षिण फ्रांस में लिखा गया था। ऐथनैश्यस ने ऐथनैश्यस का विश्वास वचन भले ही नहीं लिखा हो, लेकिन उसने इसमें लिखी त्रिएकता और मसीह के देहधारण की मूलभूत शिक्षाओं के लिए ही जीवन भर प्रभु के अच्छे सैनिक की तरह युद्ध लड़ा।  इस विश्वास वचन के द्वारा आपको अत्यंत आशीष मिलेगी।

ऐथनैश्यस का विश्वास वक्तव्य

प्रस्तावना

[1] जो कोई भी उद्धार पाना चाहता है, उसे सबसे बढ़कर सच्ची सार्वभौमिक कलीसिया के विश्वास को मानना चाहिए। [2] जो कोई उसे पूरी तरह से और अखंड रूप से न मानें, वह निश्चय ही सदा के लिये नाश हो जाएगा।

तीन व्यक्ति

[3] अब यह सच्ची सार्वभौमिक कलीसिया का विश्वास है: कि हम एक परमेश्वर की त्रिएकता में और त्रिएक परमेश्वर की एकता में आराधना करते हैं, [4] न तो तीनों व्यक्तियों को एक दूसरे में मिश्रित करते हैं और न ही उनके तत्व को विभाजित करते हैं। [5] क्योंकि पिता एक भिन्न व्यक्ति है, पुत्र दूसरा भिन्न व्यक्ति है, और पवित्र आत्मा तीसरा भिन्न व्यक्ति है। [6] परन्तु पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा का परमेश्वरत्व एक ही है, उनकी महिमा बराबर और उनका राजत्व सह अनादि-अनन्त है। [7] जैसा पिता है, वैसा पुत्र है, और वैसा ही पवित्र आत्मा है। [8] पिता अनुत्पन्न (uncreated) है, पुत्र अनुत्पन्न है, पवित्र आत्मा अनुत्पन्न है। [9] पिता असीमित है, पुत्र असीमित है, पवित्र आत्मा असीमित है। [10] पिता अनादि-अनन्त है, पुत्र अनादि-अनन्त है, पवित्र आत्मा अनादि-अनन्त है।

एक तत्त्व (Essence)

[11] और फिर भी तीन व्यक्ति तीन अलग-अलग अनादि-अनन्त अस्तित्व (being) नहीं हैं; लेकिन तीनों मिलकर केवल एक अनादि-अनन्त अस्तित्व है। [12] इसी प्रकार तीन अनुत्पन्न (uncreated) या असीमित अस्तित्व भी नहीं हैं; केवल एक अनुत्पन्न और असीमित अस्तित्व है। [13] इसी तरह, पिता सर्वशक्तिमान है, पुत्र सर्वशक्तिमान है, पवित्र आत्मा सर्वशक्तिमान है। [14] फिर भी तीन सर्वशक्तिमान अस्तित्व नहीं हैं; केवल एक ही सर्वशक्तिमान अस्तित्व है। [15] इस प्रकार, पिता परमेश्वर है, पुत्र परमेश्वर है, पवित्र आत्मा परमेश्वर है। [16] तौभी तीन ईश्वर नहीं हैं; केवल एक परमेश्वर है। [17] इस प्रकार, पिता प्रभु है, पुत्र प्रभु है, पवित्र आत्मा प्रभु है। [18] फिर भी तीन प्रभु नहीं हैं; केवल एक ही प्रभु है। [19] जिस प्रकार मसीही सत्य हमें प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर और प्रभु दोनों के रूप में अंगीकार करने के लिए बाध्य करता है, [20] उसी प्रकार सच्ची  सार्वभौमिक कलीसिया का धर्म हमें यह कहने से मना करता है कि तीन ईश्वर या प्रभु हैं।

पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की विशिष्टताएं (Personal Properties)

[21] पिता न तो किसी के द्वारा बनाया गया, न उत्पन्न किया गया और न ही किसी से जन्मा है। [22] पुत्र न तो बनाया गया, न ही उत्पन्न किया गया; वह सिर्फ पिता से (अनंत से) जन्मा। [23] पवित्र आत्मा न तो  बनाया गया, न उत्पन्न किया गया और न ही किसी से जन्मा; वह पिता और पुत्र से निकलता (proceeds) है। [24] तदनुसार (accordingly), एक पिता है, तीन पिता नहीं हैं; एक पुत्र है, तीन पुत्र नहीं हैं; एक पवित्र आत्मा है, तीन पवित्र आत्माएँ नहीं हैं।

तीनों व्यक्ति बराबर; उनमें कोई पदक्रम नहीं

[25] त्रिएकता में कोई भी पहले या बाद में नहीं है, कोई भी बड़ा या छोटा नहीं है; [26] अपनी संपूर्णता में तीन व्यक्ति एक दूसरे के साथ सह-अनादि-अनंत और सह-समान हैं। [27] इसलिए हर चीज में, जैसा कि पहले कहा गया था, त्रिएकता में एकता और एकता में त्रिएकता की आराधना की जानी चाहिए। [28] सो जो कोई उद्धार पाना चाहता है, वह त्रिएकता के विषय में ऐसा ही मत रखे।

प्रभु यीशु: एक व्यक्ति, दो स्वाभाव

[29] परन्तु अनन्त उद्धार के लिये यह भी आवश्यक है कि मनुष्य हमारे प्रभु यीशु मसीह के देहधारण पर भी वफ़ादारी से विश्वास करे। [30] अब सच्चा विश्वास यह है कि हम विश्वास करें और अंगीकार करें, कि हमारा प्रभु यीशु मसीह, परमेश्वर का पुत्र, समान रूप से परमेश्वर और मनुष्य दोनों है। [31] वह पिता के तत्त्व से परमेश्वर है, जो समय से पहले जन्मा; और वह अपनी माँ के तत्त्व से मनुष्य है, जो समय में पैदा हुआ; [32] पूरी तरह से परमेश्वर, एक बुद्धि संपन्न आत्मा और मानव-शरीर के साथ पूरी तरह से मनुष्य; [33] परमेश्वरत्व के संबंध में पिता के बराबर, मानवता के संबंध में पिता से कम। [34] यद्यपि वह परमेश्वर और मनुष्य है, तौभी मसीह दो नहीं, परन्तु एक है। [35] वह एक है, परन्तु, अपने परमेश्वरत्व को मनुष्यत्व  में बदलने के द्वारा नहीं, बल्कि परमेश्वर द्वारा मानवता को धारण करने के द्वारा। [36] वह एक है: निश्चित रूप से अपने तत्त्व के मिश्रण के द्वारा नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व की एकता के द्वारा। [37] क्योंकि जिस प्रकार एक मनुष्य बुद्धिसम्पन्न आत्मा और शरीर दोनों है, उसी प्रकार एक मसीह भी परमेश्वर और मनुष्य दोनों है।

प्रभु यीशु के कार्य

[38] उस ने हमारे उद्धार के लिए दुख उठाया; क्रूस पर हमारे बजाय का नरक सहा;  वह तीसरे दिन मरे हुओं में से जी उठा; [39] वह स्वर्ग पर चढ़ गया; वह पिता के दाहिने हाथ पर विराजमान है; [40] वहां से वह जीवतों और मरे हुओं का न्याय करने को आएगा। [41] उसके आने पर सब मनुष्य सदेह उठ खड़े होंगे [42] और अपने अपने कामों का लेखा देंगे। [43] जिन्होंने भलाई की है वे अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे, और जिन्होंने बुराई की है वे अनन्त आग में प्रवेश करेंगे।

निष्कर्ष

[44] यह सच्ची सार्वभौमिक कलीसिया का विश्वास है: कि इस पर दृढ़तापूर्वक और वफ़ादारी के साथ विश्वास किए बिना किसी का उद्धार नहीं हो सकता।

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