व्याख्या विज्ञान (HERMENEUTICS)


बाइबल के किसी भी सरल या कठिन पद को समझने के लिए हमें  व्याख्या विज्ञान का सहारा लेना चाहिए। व्याख्या विज्ञान के निम्नांकित नियम बाइबल के कठिन पदों की व्याख्या करने मे हमारी मदद करते हैं:

1. बाइबल , बाइबल का व्याख्यान करती है. सम्पूर्ण बाइबल मे सामंजस्य है। बाइबल अपनी ही बात का खंडन नहीं कर सकती।  हम जानते है की सम्पूर्ण बाइबल हमें यही कहती है की उद्धार केवल अनुग्रह के द्वारा होता है। यदि कोई आयत ऐसी आ जाये जो यह कहती सी लगती है की उद्धार बपतिस्मा या किसी और कर्म के द्वारा  होता है तो हमें उस आयत को समझने के लिए उसकी  शेष सम्पूर्ण बाइबल से तुलना करना चाहिए और सही सन्दर्भ मे मतलब निकलना चाहिए।

2. बाइबल हिंदी  या इंग्लिश मे नहीं लिखी गई थी. यह मूलतः इब्री, यूनानी और अरामी भाषा मे लिखी गई थी। इसके व्याख्यान के लिए हमें बाइबल की मूल भाषाओं का सहारा लेना चाहिए। मूल भाषाओं की व्याकरण सही अर्थ निकलने मे मदद करती है। यदि हमे मूल भाषाओँ का ज्ञान नहीं है तो हमें शब्दकोशों, टीकाओं, अध्ययन बाइबलों, और अन्य उपयोगी पुस्तकों का उपयोग करना चाहिए।

3. बाइबल को समझने के लिए  हमें उस समय के  ऐतिहासिक, सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को समझना ज़रूरी है। यहूदियों के इतिहास, और उनकी संस्कृति को जाने बिना हम इसको  ठीक से नहीं समझ पाएंगे।

4. किसी भी आयत की व्याख्या करते समय हमें वर्तमान पाठ के सन्दर्भ को जानना जरुरी हैं। कभी भी एक आयात को अलग से लेकर अर्थ निकलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बल्कि उस पुरे पाठ का अध्ययन करना चाहिए।

5. भाषा शैली भी हमें समझनी चाहिए। बाइबल के अधिकतर भाग अक्षरक्षः अर्थ देते हैं, परन्तु कुछ भागों मे मुहावरेदार, आलंकारिक  और प्रतीकात्मक शैलियां इस्तेमाल की गई हैं। अगर हम भाषा शैली को नहीं समझेंगे तो अर्थ का अनर्थ  कर देंगे। जब यीशु ने कहा की मेरे मांस को खाये बिना और मेरे लहू को पिए बिना कोई जीवन नहीं पा सकता ( यूहन्ना 6:56), तो वो हमें नरभक्षी बनने के लिए नहीं कह रहा था। वो वहां प्रतीकात्मक भाषा में बात कर रहा था।

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