क्या परमेश्वर पछताता है और अपनी इच्छा बदलता है?

क्या परमेश्वर पछताता है और अपनी इच्छा बदलता है?

पहली बात तो ये प्रश्न पूछना ही गलत, अतार्किक है, मूर्खतापूर्ण है। ये प्रश्न पूछना ऐसा है जैसे कोई पूछे कि उजाला अँधेरा होता है क्या ? यदि कोई कहे कि परमेश्वर पछताता है या अपनी इच्छा बदल देता है, तो मुझे जोर से गुस्सा आता है। क्या परमेश्वर कोई मनुष्य है जो पछताए और अपनी इच्छा बदल दे। पछताता कौन है ? वो जिसने कोई गलती की हो। अपनी इच्छा कौन बदलता है ? वो जिसको भविष्य मालूम नहीं और कोई आईडिया ट्राई करता है, पर जब उसे लगता है कि इससे काम नहीं चलेगा, तो नया आईडिया ट्राई करता है। क्या परमेश्वर गलती कर सकता है ? क्या परमेश्वर भविष्य को नहीं जानता ? नहीं, परमेश्वर सबकुछ जानता है और कभी कोई गलती नहीं कर सकता। परन्तु खुले ईश्वरवादी (open theists), झूंठे शिक्षक और छिछले मसीही ऐसे ही ईश्वर में विशवास करते हैं, जो मनुष्यों जैसा सीमित, बुद्धिहीन, गलती करने वाला, पछताने वाला और अपनी इच्छा बदलने वाला है। हद तो वे तब कर देते हैं जब वे बाइबल कि आयतें देकर अपने इस झूंठे ईश्वर को बाइबल के संप्रभु परमेश्वर के सिंहासन पर बैठाने की कोशिश करते हैं। कुछ आयतें जो वो देते हैं, वो ये हैं :

“और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ।” (उत्पत्ति 6:6)

तब यहोवा का यह वचन शमूएल के पास पहुँचा, 11“मैं शाऊल को राजा बना के पछताता हूँ; क्योंकि उसने मेरे पीछे चलना छोड़ दिया, और मेरी आज्ञाओं का पालन नहीं किया।” (1 शमूएल 15:10-11)

तब यहोवा अपनी प्रजा की हानि करने से जो उसने कहा था पछताया। (निर्गमन 32:14)

जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया। (योना 3:10)

उन्होंने ये आयतें अपनी मूर्ती को सच्चा ईश्वर सिद्ध करने के लिए बाइबल में से छांट ली है। उनके दिल शुद्ध नहीं हैं और उनके इरादे नेक नहीं हैं। बाइबल में ऐसी बहुत सारी आयतें हैं जो ठीक ऊपर लिखी आयतों के विपरीत बात करती हैं, पर ये लोग उनको कभी इस्तेमाल नहीं करते, क्योंकि वो अपनी मूर्ती नहीं तोड़ना चाहते।

(A) उत्पत्ति 6:6 में लिखा है कि परमेश्वर मनुष्य को बनाने से पछताया और 1 शमूएल 15:10-11 में ये भी लिखा है कि शाऊल को राजा बना के पछताया, परन्तु 1 शमूएल 15 अध्याय में ही 29वीं आयत में लिखा है कि परमेश्वर मनुष्य नहीं की वो पछताए:

और जो इस्राएल का बलमूल है वह न तो झूठ बोलता और न पछताता है; क्योंकि वह मनुष्य नहीं है कि पछताए।” (1 शमूएल 15:29)

इस आयत से साफ़-साफ़ ये प्रकट है कि परमेश्वर पछताता नहीं। पछताना मनुष्य का काम है, क्योंकि वो भविष्य नहीं जानता और असिद्ध और पापमय है। वो गलती और पाप दोनों करता है और पछताता है। परन्तु परमेश्वर नहीं पछताता क्योंकि वो परमेश्वर है और भविष्य को जानता ही नहीं उसने उसे अपनी असीम बुद्धि में पूर्वनिर्धारित किया है और अपनी असीम सामर्थ के द्वारा पूरा करता है।

मैं तो अन्त की बात आदि से और प्राचीनकाल से उस बात को बताता आया हूँ जो अब तक नहीं हुई। मैं कहता हूँ, ‘मेरी युक्‍ति स्थिर रहेगी और मैं अपनी इच्छा को पूरी करूँगा।’ (यशायाह 46:10)

(B) निर्गमन 32:14 में लिखा है कि परमेश्वर अपनी प्रजा की हानि करने से जो उसने कहा था पछताया (अपनी इच्छा बदल दी) और योना 3:10 में लिखा है कि परमेश्वर ने नीनवेवासियों के पश्चाताप को देख कर अपनी इच्छा बदल दी, पर गिनती 23:19 को पढ़िए :

परमेश्वर मनुष्य नहीं कि झूठ बोले, और
न वह आदमी है कि अपनी इच्छा बदले।
क्या जो कुछ उसने कहा उसे न करे?
क्या वह वचन देकर उसे पूरा न करे? (गिनती 23:19)

यहाँ लिखा है कि परमेश्वर मनुष्य नहीं कि झूंठ-मूंठ में कुछ बोले और बाद में अपनी इच्छा बदल दे और जो कहा उसे ना करें। उसने जो ठाना है उसे पूरा करता है और जो कहा है वो पूरा करता है। आइये और आयतें देखते हैं :

यदि हम अविश्‍वासी भी हों,
तौभी वह विश्‍वासयोग्य बना रहता है,
क्योंकि वह आप अपना इन्कार नहीं कर
सकता। (2 तीमुथियुस 2:13)

क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है। (याकूब 1:17)

2 तीमुथियुस 2:13 के अनुसार परमेश्वर अपना इंकार नहीं कर सकता। वो नहीं बदल सकता। याकूब 1:17 के अनुसार परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, वो अपरिवर्तनशील है। दुनिया में जो अदल बदल अर्थात मनुष्यों और बाकी की सृष्टि में जो परिवर्तन होते हैं, उनसे परमेश्वर पर कोई छायां नहीं पड़ती, वो नहीं बदलता। क्यों? क्योंकि बदला इस दुनिया में और समय में जाता है। सृष्टि की हुई वस्तुएं ही बदलती है समय के अंदर। बदलने का अर्थ हुआ कि पिछले पल में यह था अब कुछ और हो गया। परन्तु परमेश्वर तो सृष्टि और समय से परे अनंत में है। वो कैसे बदले? उसके लिए बदलना असंभव है। परमेश्वर फिर से गर्जन के साथ कहता है :

मैं यहोवा बदलता नहीं। (मलाकी 3:6)

नृरूपरोपण और नृभावारोपण (Anthropomorphism and Anthropopathism) 

यदि आप मानते हैं या मान गए हैं कि परमेश्वर नहीं बदलता, वो नहीं पछताता और उसकी इच्छा नहीं बदलती, परन्तु फिर भी आपके मन में प्रश्न आ रहा है कि फिर क्यों लिखा है कुछ आयतों में कि वो पछताया या उसने अपनी इच्छा बदली, तो अब मैं आपके प्रश्न का आदर करूँगा। आपके प्रश्न का उत्तर देने के लिए मैं आपको नृरूपरोपण और नृभावारोपण नाम के दो अलंकार सीखाना चाहता हूँ।

नृरूपरोपण: निराकार परमेश्वर को मानवरूप में चित्रित कर देना नृरूपरोपण अलंकार है। उदहारण:

अपने धर्ममय दाहिने हाथ से मैं तुझे सम्भाले रहूँगा। (यशायाह 41:10)

यहोवा की आँखें धर्मियों पर लगी रहती हैं,
और उसके कान भी उनकी दोहाई की
ओर लगे रहते हैं। (भजन संहिता 34:15)

तब यहोवा परमेश्‍वर, जो दिन के ठंडे समय में वाटिका में फिरता था  (उत्पत्ति 3:8)

क्या परमेश्वर के हाथ-पैर, आँखें और कान होते हैं ? क्या वो ईडन गार्डन में घूम रहा था। नहीं वो तो आत्मा है। उसके हमारे जैसे हाथ पैर आदि नहीं होते। लेकिन उसको बाइबल में मानवरूप में चित्रित किया गया है ताकि हम समझ सकें।

नृभावारोपण: परमेश्वर को ऐसे चित्रित करना जैसे उसके पास मनुष्यों जैसे भाव या भावनाएं हैं, नृभावारोपण है।

“और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ।” (उत्पत्ति 6:6)

तब यहोवा का यह वचन शमूएल के पास पहुँचा, 11“मैं शाऊल को राजा बना के पछताता हूँ; क्योंकि उसने मेरे पीछे चलना छोड़ दिया, और मेरी आज्ञाओं का पालन नहीं किया।” (1 शमूएल 15:10-11)

तब यहोवा अपनी प्रजा की हानि करने से जो उसने कहा था पछताया। (निर्गमन ३32:14)

जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया। (योना 3:10)

इन आयतों में परमेश्वर को पछताते हुए, दुखी होते हुए और इच्छा बदलते हुए चित्रित किया गया है, परन्तु इसको अक्षरशः नहीं लिया जा सकता । उसने अपनी प्रजा कि हानि करने कि इच्छा नहीं बदली। उसकी इच्छा शुरू से यही थी कि वो अपना क्रोध प्रकट करेगा और मूसा पवित्र आत्मा, जो कि प्रार्थना का आत्मा है, के द्वारा परमेश्वर से विनती करेगा और परमेश्वर इज़राइलियों को छोड़ देगा। मानव जैसी भाषा से भ्रमित मत होइए।

जब नीनवे नगर के निवासियों ने पश्चाताप किया तो, परमेश्वर ने उन्हें नाश नहीं किया। उन्हें माफ़ कर दिया। यहाँ कौन बदला? परमेश्वर या मनुष्य ? किसने मन फिराया या मन बदला- परमेश्वर ने या मनुष्य ने ? अरे भाई मनुष्य बदला। पहले वो पाप में कठोर था और फिर पश्चाताप कर लिया। और हम जानते हैं कि परमेश्वर ही पश्चाताप का दान देता है (प्रेरितों 11:18) , तो इसका अर्थ हुआ कि परमेश्वर की संप्रभु इच्छा शुरू से नीनवे नगर को बचाने की ही थी। वो बदलता नहीं। वो मनुष्य नहीं कि अपनी इच्छा बदले। मानव जैसी भाषा से भ्रमित मत होइए।

जहाँ लिखा है कि परमेश्वर खेदित हुआ तो ये प्रेमी और दयालू परमश्वर के खिलाफ हमारे पाप की गंभीरता और पाप के प्रति उसकी असीम घृणा को हम पर प्रकट करने के लिए लिखा है। वो असल में दुखी नहीं हो सकता, वैसे ही जैसे उसके असल में हाथ पैर नहीं हैं। वो तो अनादि काल से अनंत काल तक सिद्ध आनंद में है:

यही परमधन्य (परम सुखी, अनंत आनंद के  धनी) परमेश्‍वर की महिमा के उस सुसमाचार के अनुसार है जो मुझे सौंपा गया है। (1 तीमुथियुस 11)

तो फिर से— मनुष्य जैसी भाषा से भ्रमित ना होएं। अलंकारों को अलंकारों की तरह लें, अक्षरशः नहीं। अनंत और वर्णनातीत परमेश्वर की कुछ बातों को हम सीमित मनुष्यों पर प्रकट करने के लिए इन अलंकारों का इस्तेमाल किया गया है। आइये, निम्नलिखित आयतों को ध्यान से जोर-जोर से पढ़कर इस लेख को ख़त्म करें :

मैं तो अन्त की बात आदि से और प्राचीनकाल से उस बात को बताता आया हूँ जो अब तक नहीं हुई। मैं कहता हूँ, ‘मेरी युक्‍ति स्थिर रहेगी और मैं अपनी इच्छा को पूरी करूँगा।’ (यशायाह 46:10)

और जो इस्राएल का बलमूल है वह न तो झूठ बोलता और न पछताता है; क्योंकि वह मनुष्य नहीं है कि पछताए।” (1 शमूएल 15:29)

परमेश्वर मनुष्य नहीं कि झूठ बोले, और
न वह आदमी है कि अपनी इच्छा बदले।
क्या जो कुछ उसने कहा उसे न करे?
क्या वह वचन देकर उसे पूरा न करे? (गिनती  23:19)

यदि हम अविश्‍वासी भी हों,
तौभी वह विश्‍वासयोग्य बना रहता है,
क्योंकि वह आप अपना इन्कार नहीं कर
सकता। (2 तीमुथियुस 2:13)

क्योंकि हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है, जिसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न अदल बदल के कारण उस पर छाया पड़ती है। (याकूब 1:17)

मैं यहोवा बदलता नहीं। (मलाकी 3:6)

यही परमधन्य (परम सुखी, अनंत आनंद में रहने वाले) परमेश्‍वर की महिमा के उस सुसमाचार के अनुसार है जो मुझे सौंपा गया है।  (1 तीमुथियुस 1:11)

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